
जबलपुर (जय लोक)। शहर की जीसीएफ फैक्ट्री में बनी स्वदेशी 105 एमएम लाइट फील्ड गन ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर 21 तोपों की सलामी देकर देश का मान बढ़ाया है। दुर्गम इलाकों और पहाड़ों के लिए उपयोगी इस गन की मांग ऑपरेशन सिंदूर के बाद और बढ़ गई है। यह पहली स्वदेशी तोप है जिसका निर्माण 1978 से जीसीएफ फैक्ट्री में किया जा रहा है। लेकिन अब इस गन को आधुनिक तरीके से और मजबूत बनाया जा रहा है।
इस गन की खास बात यह है कि यह बहुत हल्की होती है इसे हेलीकॉप्टर से आसानी से पहाड़ों और कठिन सीमाओं तक पहुंचाया जा सकता है। इसे सिर्फ दो जवान मिलकर चला सकते हैं। यह एक मिनट में छह गोले दाग सकती है। कारगिल युद्ध से लेकर हालिया सैन्य अभियानों में इस गन ने अपनी जबरदस्त ताकत साबित की है। सेना की माँग पर जीसीएफ में इसके नए ऑर्डर्स पर तेजी से काम हो रहा है।

सेना की जरूरत के हिसाब से किया जा रहा तैयार
जीसीएफ फैक्ट्री में 105 एमएम लाइट फील्ड गन के आधुनिकीकरण का बड़ा काम शुरु किया है। लगभग 5 दशक पुरानी इस प्रतिष्ठित स्वदेशी तोप को अब अत्याधुनिक डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम और नई संचार तकनीक से पूरी तरह लैस किया जा रहा है। सेना की नई जरुरतों को ध्यान में रखते हुए जीसीएफ को इसके व्यापक निर्माण और तकनीकी सुधार का विशेष लक्ष्य मिला है। हल्के वजन और जबरदस्त मारक क्षमता के कारण यह तोप सेना के अग्रिम दस्तों का मुख्य आधार रही है। अब फैक्टरी के विशेषज्ञ वैज्ञानिक और तकनीकी दल इसे भविष्य के युद्धक्षेत्र की आधुनिक चुनौतियों के पूरी तरह अनुकूल बनाने में जुटे हैं, जिससे सैन्य मोर्चों पर जमीनी पकड़ पहले से ज्यादा अभेद और प्रभावी हो सकेगी।

मारक क्षमता होगी 24 किमी तक
इस तोप की मारक क्षमता में इजाफा किया जा रहा है। वर्तमान समय में इसकी रेंज 17 से 20 किलोमीटर तक सीमित है, जिसे उन्नत प्रणाली के जरिए बढ़ाकर सीधे 24 किलोमीटर तक पहुंचाया जाएगा। इस क्षमता विस्तार से सीमा पार बैठे दुश्मनों के ठिकानों पर अचूक निशाना साधना संभव होगा। नए संस्करण में एकीकृत होने वाले कंप्यूटर आधारित सेंसर और लक्ष्य साधने वाले उपकरण इसकी सटीकता को कई गुना बढ़ा देंगे।


Author: Jai Lok






