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त्रिविष्टपेश्वर महादेव : वह दिव्य शिवलिंग जिसके दर्शन को देवता भी तरसे…, इंद्र ने छोड़ा स्वर्ग, क्योंकि महाकाल वन में छिपा था सृष्टि का रहस्य

डॉ. नवीन आनंद जोशी
उज्जैन—भारत की प्राचीन आध्यात्मिक राजधानी। यह वह भूमि है जहाँ समय थमता नहीं, परंतु इतिहास शाश्वत हो जाता है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पावन परिधि में एक ऐसा अद्भुत, विलक्षण और रहस्यमय स्थल स्थित है, जिसके दर्शन मात्र से स्वर्गफल की प्राप्ति मानी गई है— त्रिविष्टपेश्वर महादेव।चौरासी महादेवों की पवित्र परंपरा में यह सातवाँ और अत्यंत गूढ़ स्थान है, जिसकी स्थापना किसी मानव हस्त से नहीं, बल्कि स्वयं इंद्र सहित देवताओं ने की।
त्रिविष्टपेश्वर — नाम में ही समाहित दिव्यता ,‘त्रिविष्टप’ संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है स्वर्ग लोक, और ‘ईश्वर’ अर्थात् समस्त सृष्टि का परम स्वामी—भगवान शिव।अर्थात वह शिवलिंग जो देवताओं के स्वर्गीय आदेश पर, देवों के हाथों से स्थापित हुआ।
मान्यता है कि यहाँ एक क्षण का दर्शन भी जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति प्रदान करता है, और स्वर्ग प्राप्ति का पुण्य सुनिश्चित होता है।
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि एक बार देवर्षि नारद, इंद्रलोक पहुँचे। इंद्र ने उनसे उत्सुकता से पूछा हे देवर्षि, महाकाल वन का वास्तविक महत्व क्या है?
क्या यह सच है कि वहाँ शिव साक्षात् निवास करते हैं ? नारद मुनि ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया देवेंद्र, महाकाल वन सामान्य तीर्थ नहीं। वहाँ साठ करोड़ अदृश्य शिवलिंग विद्यमान हैं,और नौ करोड़ शक्तियाँ उनकी रक्षा में सदा जागृत रहती हैं। वहाँ का तेज ब्रह्मलोक और विष्णुलोक से भी अधिक है। उसे देखने का सौभाग्य देवताओं को भी दुर्लभ है।नारद के वचनों ने देवताओं के अंत:करण में तीव्र जिज्ञासा जगा दी और समस्त देवता इंद्र के नेतृत्व में महाकाल वन के लिए प्रस्थान कर गए। परंतु वहाँ पहुँचकर वे गुप्त शिवलिंगों के दर्शन नहीं कर पाए। उनके हृदय में निराशा भर गई।उसी क्षण दिव्य आकाशवाणी हुई हे देवगण, पूर्व में कर्कोटक और दक्षिण में महामाया के मध्य एक दिव्य शिवलिंग की स्थापना करो।वही तुम्हारे लिए त्रिविष्टप प्रवेश का द्वार बनेगा।
देवताओं ने विधि-विधान से उस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की और उसे नाम दिया त्रिविष्टपेश्वर महादेव,तभी से यह स्थान देवताओं द्वारा रचित स्वर्ग का द्वार माना जाता है।यह कथा दर्शाती है कि सृष्टि का प्रत्येक तत्व, यहाँ तक कि देवता भी, शिव की अनुकंपा पर आधारित हैं।शिव—जो समय हैं, संहारक हैं, और करुणा के महासागर भी।त्रिविष्टपेश्वर महादेव की पूजा के बारे में कहा गया है केवल दर्शन मात्र से पाप नष्ट होते हैं,और आत्मा प्रकाशित होकर मुक्तिपथ पर अग्रसर होती है।अत्यंत विनम्रता से किए गए जप, ध्यान और अभिषेक से मन की अशांति दूर होती है,जीवन में संतुलन और आध्यात्मिक जागरण प्राप्त होता है। यह दिव्य स्थान महाकालेश्वर मंदिर परिसर के भीतर, श्री ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे एक छोटी पवित्र गुफा में स्थित है।यह स्थल अत्यंत शांत, रहस्यमयी और शक्तिमय अनुभव कराता है। विशेष पूजन दिवस अष्टमी,चतुर्दशी,संक्रांति इन तिथियों पर यहाँ की गई पूजा अत्यंत फलदायी मानी गई है। त्रिविष्टपेश्वर महादेव केवल एक मंदिर नहीं,यह देवत्व और मानवता के संगम का केंद्र है। वह स्थान जहाँ देवता भी शिवत्व की अनुभूति के लिए आए, और जहाँ आज भी भक्त उसी दिव्य ऊर्जा को अनुभव करते हैं।यह कथा हमें स्मरण कराती है शिव ही अनंत हैं, शिव ही आदि हैं,और शिव ही मोक्ष के द्वार हैं।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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