
अमित चतुर्वेदी
(जयलोक)। जब कोई फिल्म हज़ारों करोड़ की कमाई कर लेती है, तो उसकी सफलता सिफऱ् संख्याओं में नहीं, बल्कि दिलों में बस जाती है। धुरंधर सीरीज़ की प्रीक्वेल और सीक्वल ने यही कर दिखाया है। निर्माता जियो स्टूडियोज़ और बी62 स्टूडियोज़, निर्देशक आदित्य धर, अभिनेता रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, संजय दत्त, अर्जुन रामपाल, राकेश बेदी समेत पूरी टीम को – हर क्रू मेंबर, टेक्नीशियन, लाइटमैन, सेट डिज़ाइनर, वीएफएक्स आर्टिस्ट, म्यूजि़शियन और उन अनगिनत हाथों को, जिन्होंने रात-दिन एक करके ये दो विशालकाय पार्ट तैयार किए – हार्दिक बधाई! चार-चार घंटे के ये दोनों हिस्से शुरू से अंत तक दर्शकों को सीट से बांधे रखते हैं। पटकथा का कसाव, डायलॉग्स की धार, एक्शन की रियलिज़्म और भावनाओं की गहराई – ये सब आदित्य धर की निर्देशन और लेखन की सबसे बड़ी जीत है। तकनीकी रूप से फिल्म इतनी साउंड है कि हर फ्रेम में देश का गौरव झलकता है।

नेट से जुटाए गए सही आंकड़ों के मुताबिक, प्रीक्वेल ‘धुरंधर’ (दिसंबर 2025) ने विश्व स्तर पर लगभग 1,307 करोड़ की कमाई की (भारत में ग्रॉस ?1,007.85 करोड़, विदेश में 299.50 करोड़)। सीक्वल ‘धुरंधर: द रिवेंज’ (19 मार्च 2026 रिलीज) ने अब तक छह-आठ दिनों में ?900 करोड़ से ज़्यादा (कुछ रिपोर्ट्स में 937 करोड़ तक) जमा कर लिया है, जिसमें भारत में नेट 500 करोड़ प्लस और विदेशी बाज़ार से अच्छा-खासा योगदान है। दोनों फिल्मों की संयुक्त कमाई अभी 2,200 करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है और सीक्वल अभी दौड़ रही है। ये आंकड़े सिफऱ् पैसे नहीं, बल्कि दर्शकों के विश्वास के हैं – कि एक ऐसी कहानी पर भरोसा किया जा सकता है जो देश की रीढ़ की हड्डी को छूती है।
लेकिन सवाल उठता है – क्या ये प्रोपेगंडा फिल्म सीरीज़ है या भारत के सीक्रेट एजेंट्स की सच्ची वीर गाथा? मेरे हिसाब से ये दूसरा वाला सच है। फिल्म में दिखाए गए गुप्त अभियान, दुश्मन की सरज़मीन पर छिपकर मातृभूमि की रक्षा, बिना नाम-श्रेय के बलिदान – ये सब प्रचार नहीं, बल्कि उन गुमनाम योद्धाओं की झलक है जिन्हें हम कभी नाम से नहीं जान पाएंगे। गुप्तचरों का इतिहास मानव सभ्यता जितना पुराना है। प्राचीन काल से लेकर आज तक, जासूसों ने सिहरन पैदा करने वाले कारनामे किए हैं। वे दुश्मन की छावनी में घुसकर, परिवार से दूर, बिना किसी पदक या पेंशन के अपनी जान दांव पर लगाते हैं। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि अगर वे पकड़े गए या शहीद हुए, तो उनका अपना देश भी उन्हें पहचानने से इनकार कर देता है। हम नहीं जानते ऐसे किसी एजेंट को – ये एक लाइन उनके पूरे जीवन की मेहनत को धूल में मिला देती है। सोचिए, कितना कष्ट होगा उस एजेंट को, जो पाकिस्तान की किसी गली में, नकली पहचान में रहकर, हर पल मृत्यु का सामना करता है। उसके बच्चे स्कूल में पापा क्या करते हैं? पूछें तो जवाब बाहर नौकरी करते हैं जैसे झूठ का बोझ। पत्नी रात को अकेली रोए, लेकिन फोन पर भी सब ठीक है कहना पड़े। फिर भी वो चुपचाप आगे बढ़ता है। इससे बड़ा बलिदान क्या हो सकता है? ये नहीं कि वो वेतन या प्रमोशन के लिए करता है। ये देश के प्रति निश्छल प्रेम है। फिल्म इस भावना को इतनी मार्मिकता से पकड़ती है कि दर्शक थिएटर से निकलते हुए अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों पर सोचने लगते हैं, क्या मैं भी ईमानदारी से अपना काम कर रहा हूं?फिर भी, मैं सिफऱ् एक आशंका जता रहा हूं। निर्माता-निर्देशक को दोष नहीं दे रहा। शायद उन्होंने इस बात पर गहराई से विचार नहीं किया होगा कि सिनेमैटिक लिबर्टी के नाम पर एजेंट्स के काम करने के तरीकों को इतना खुलकर दिखाना, पाकिस्तान में आज भी गोपनीय रूप से तैनात भारतीय एजेंट्स को खतरे में डाल सकता है। फिल्म रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर तमाम वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें देखा जा सकता है कि पाकिस्तानी पुलिस और आर्मी भारतीय जासूसों को पकडऩे के लिए स्पेशल सर्च अभियान चला रही हैं।ये वीडियो देखकर मन में चिंता पैदा होती है। क्या ये अनजाने में की गई भूल है? या सिनेमैटिक स्वतंत्रता की सीमा पार हो गई?

भूल, ग़लती और अपराध में अंतर होता है। भूल वो है जो बिना सोचे-समझे हो जाए – जैसे कोई गाड़ी चलाते हुए मोबाइल देख लेना। ग़लती वो है जो अच्छे इरादे से की जाए लेकिन परिणाम बुरा हो। अपराध वो है जिसमें जान-बूझकर नुकसान पहुंचाने का इरादा हो।

सिनेमैटिक लिबर्टी के नाम पर एजेंट्स के असली तरीकों को जाहिर करना शायद अनजाने में की गई भूल हो सकती है। लेकिन ग़लती का सबसे बड़ा उदाहरण हमारे इतिहास में मौजूद है – मोरारजी देसाई की वो ग़लती, जिसके चलते पाकिस्तान न्यूक्लियर स्टेट बन पाया।रॉ के पहले चीफ रामनाथ काओ असली धुरंधर थे। उनके एजेंट्स ने पता लगाया कि पाकिस्तान कहूटा में बेहद गोपनीय तरीके से न्यूक्लियर प्लांट बना रहा है। भारत का एक सीक्रेट एजेंट नाई बनकर उस प्लांट के पास की बस्ती में सलून खोलकर बैठ गया। प्लांट में काम करने वाले साइंटिस्ट्स के बाल काटकर उनके सैंपल भारत भेजे। उनमें यूरेनियम की पुष्टि हुई। रॉ ने ये पुख्ता सबूत प्रधानमंत्री तक पहुंचाया। इजऱाइल की मोसाद ने भी यही जानकारी जुटा ली थी। इजऱाइल ने भारत से कहा – हम प्लांट उड़ा देंगे, बस रिफ्यूलिंग के लिए अपना एयरबेस दे दो। लेकिन मोरारजी देसाई ने इनकार कर दिया। वो अत्यंत सज्जन, खाँटी गांधीवादी थे। शायद शांति का संदेश देना चाहते थे।
उन्होंने अपने काउंटरपार्ट पाकिस्तान के जनरल जिया-उल-हक को फोन किया और कहा, जिया, तुमने हाल में रिलीज हुई फिल्म शोले देखी है? जैसे हरिराम नाई ने जेल में सुरंग की खबर पता लगा ली थी, वैसे ही हमारे आदमियों ने तुम्हारे कहूटा वाले न्यूक्लियर प्लांट की जानकारी जुटा ली है। सिर्फ जानकारी नहीं, सबूत भी है हमारे पास। हमारा नाई हरिराम से भी तेज है। तुम ये प्लांट बनाना बंद कर दो। इस बार तो मैंने इजऱाइल को मना कर दिया है, लेकिन अगली बार क्या होगा, मुझे नहीं पता।
मोरारजी देसाई तो सज्जन थे, लेकिन जिया-उल-हक पाकिस्तानी शासक थे। उन्होंने ये बात आईएसआई से साझा कर दी। फिर आईएसआई ने ढूंढ-ढूंढकर भारतीय एजेंट्स को खौफनाक मौत दी। ये काम ग़लती की श्रेणी में आएगा या अपराध की? ये फैसला जनता ही कर सकती है। लेकिन एक बात साफ है, अच्छे इरादे भी कभी-कभी देश को भारी पड़ जाते हैं।गुप्तचरों के कारनामे हमें सिहरन देते हैं, रोमांचित करते हैं। उनका अदम्य साहस, बिना श्रेय की चिंता के सर्वस्व दांव पर लगाना, हर भारतीय के मन में सम्मान जगाता है। दुर्भाग्य से हम उनके नाम कभी नहीं जान पाएंगे, न जान पाएंगे। लेकिन उनकी शौर्य गाथाएं हमें प्रेरित जरूर करती हैं – कि देश के प्रति छोटे-छोटे कर्तव्य भी ईमानदारी से निभाएं।इसीलिए प्रोपेगंडा वाली बातों को दरकिनार करते हुए मेरा मानना है कि धुरंधर प्रीक्वेल और सीक्वल उन अनजान, गुमनाम एजेंट्स के लिए श्रद्धा बढ़ाने वाली फिल्म है। ये उन योद्धाओं को सलाम है जो चुपचाप लड़ रहे हैं, जिनकी कहानी कभी स्क्रीन पर नहीं आएगी, लेकिन जिनके बलिदान पर हमारा भारत खड़ा है। फिल्म ने हमें याद दिलाया है कि सच्चा हीरो वो नहीं जो तालियां बटोरता है, बल्कि वो जो बिना तालियों के भी लड़ता रहता है। धुरंधर सीरीज़ ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड बनाए, लेकिन असली जीत तो उन गुमनाम एजेंट्स की है जिन्हें फिल्म ने सम्मान दिया।
(लेखक स्वतंत्र विचारक हैं। )
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Author: Jai Lok







