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नेताओं की तो नाक ही कटा दी बिहार के गन्ना मंत्री ने…

चैतन्य भट्ट
(जय लोक)। बिहार के ‘गन्ना मंत्री संजय कुमार’ ने तमाम राजनेताओं की नाक कटा दी अब नाक कैसे कटाई ये हम आपको बताना चाहते हैं। पूरे भारत के तमाम नेता जब अपनी संपत्ति की घोषणा करते हैं तो करोड़ से नीचे तो होती नहीं है, कोई पचास करोड़ का मालिक है तो कोई बीस करोड़ का तो कोई दस करोड़ का लेकिन बिहार के गन्ना मंत्री संजय कुमार ने अपनी संपत्ति का जो विवरण दिया है वो कुल जमा तेईस लाख है। अब आप ही बताओ कि देश राजनेताओं को कितना दुख नहीं पहुंचा होगा कि उनकी जमात का एक आदमी मंत्री होने के बावजूद कुल जमा तेईस लाख का मालिक है, शर्म से उन लोगों की आंखें गड़ गई होगी वे भी सोच रहे कि इस गन्ना मंत्री को अपनी जमात से कैसे बाहर किया जाए जो मंत्री होने के बाद भी करोड़ों का मालिक नहीं बन पाया  ऐसे मंत्री की जरूरत क्या है? आजकल तो राजनीति में वही आता है जो चुनाव जीतने के लिए  करोड़ों रुपया अपनी जेब में रखता हो लेकिन इस गन्ना मंत्री के पास कुल जमा तेईस लाख की संपत्ति के बावजूद लोगों ने इसे कैसे जिता दिया और वो मंत्री कैसे बन गया ये वास्तव में शोध का विषय हो सकता है। कम से कम इस गन्ना मंत्री को अपने ही प्रदेश के एक मंत्री अशोक चौधरी से कुछ तो शिक्षा लेनी चाहिए थी जिनकी संपत्ति चवालीस करोड़ रूपया है, इतना ना करते तो डिप्टी सीएम से ही कुछ शिक्षा ले लेते जिनकी संपत्ति आठ करोड़ से ज्यादा है लेकिन पता नहीं इस मंत्री को क्या हो गया है गन्ना जैसे प्रमुख विभाग का मंत्री होने के बावजूद वो तेईस लाख की संपत्ति जोड़ पाया। सोचो जरा आजकल तेईस लाख रुपए की औकात ही क्या है ‘वन बीएचके फ्लैट’ तक नहीं मिलेगा, लक्जरी कार लेने जाओगे तो शोरूम वाला बाहर से ही भगा देगा। नेताओं को छोड़ो, मंत्रियों को छोड़ो, अपने तक को शर्म आ रही है कि एक मंत्री बेचारा तेईस लाख की संपत्ति लेकर अपनी रोजी-रोटी चला रहा है। राजनीति में आने के बाद यदि आप करोड़पति नहीं बने तो क्या किया इससे बेहतर है कि सरकारी नौकरी कर लेते तो अभी तक इससे ज्यादा संपत्ति इक_ी हो जाती है लेकिन गन्ना मंत्री की किस्मत में लगता है पैसा है नहीं, लक्ष्मी उनसे नाराज है वरना वे भी करोड़पति मंत्रियों की श्रेणी में शामिल हो जाते। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है के ऐसे नेता को राजनीति में रहने का कोई हक नहीं है। बेवजह दूसरे मंत्रियों को बदनाम होना पड़ रहा है अपनी तो  संजय कुमार को एक ही सलाह है कि भैया यदि आपने ऐसा ही ‘सादा जीवन उच्च विचार’ अपना लिया है तो काहे को राजनीति में अपना टाइम बर्बाद कर रहे हैं। साधु बन जाओ कम से कम किसी और नेता को मंत्री बनने का मौका मिलेगा और वो करोड़पति तो बन ही जाएगा।

बाबाजी का ठुल्लू और घंटा

मालवा के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले नेता ‘कैलाश विजयवर्गीय’ ने एक पत्रकार को ‘घंटा’ क्या कह दिया लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया। अरे भाई घंटा कोई बुरा शब्द थोड़ी है, अपन जब स्कूल में पढ़ा करते थे तब छुट्टी के लिए घंटा बजता था, मंदिर में जाओ तो घंटा बजाना पड़ता है, पूरी दुनिया में समय सेकंड मिनट और घंटा के दम पर ही चल रहा है, यदि घंटा न होता तो कैसे पता चलता है कि फिल्म का शो तीन घंटे का है, यदि घंटा ना होता तो यह कैसे पता चलता कि आसपास कहीं मंदिर है या स्कूल है बच्चे क्लास में जरूर रहते हैं लेकिन उनका पूरा ध्यान घंटा पर लगा रहता है कि कब घंटा बजे और वे बस्ता उठा कर दौड़ लगा दें आप खुद सोचो कि घंटा का कितना महत्व है जीवन में। अब ऐसे में अगर कैलाश जी ने किसी को घंटा कह दिया तो ऐसा क्या कह दिया जो इस पर इतना शोरगुल हो रहा है टीवी चैनल्स पर डिबेट हो रही हैं सोशल मीडिया पर घंटा के अलावा कुछ पढऩे नहीं मिल रहा है मशहूर फिल्म निर्माता राजकपूर के महत्वाकांक्षी फिल्म मेरा नाम जोकर में भी घंटा का महत्व समझाया गया था जिसके एक गीत के बोल थे ‘पहला घंटा बचपन है दूसरा जवानी तीसरा बुढ़ापा’ कुछ समय पहले तक अपन को स्टैंड अप कॉमेडियन कपिल शर्मा के बाबा जी के ठुल्लू के बारे में जानकारी थी अब ठुल्लू के बाद कैलाश जी का घंटा सामने आ गया है अब देखना यह है कि और दूसरा कौन सा नेता कौन सा शब्द किसी पत्रकार के लिए उपयोग में लाता है। लेकिन एक बात जरूर है की घंटा शब्द को लेकर किसी को इतना बुरा नहीं मानना चाहिए और फिर कैलाश जी के बारे में तो मशहूर है कि वे कब क्या कह दें कोई नहीं जानता। वैसे उन्होंने बाद में खेद भी व्यक्त कर दिया था कि मीडिया के एक साथी के बारे में उनके मुंह से एक गलत शब्द निकल गया था लेकिन इससे क्या होता है जुबान से निकला शब्द और कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं आता। अपने को तो लगता है कि जितनी छीछालेदर इस शब्द को लेकर मंत्री जी की हुई है वे अपनी डिक्शनरी से घंटा शब्द ही हटा देंगे ‘ना रहेगा घंटा ना बनेगा फंडा’।

उमा भारती उवाच

प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ‘उमा भारती’ इन दिनों अपने पूरे फॉर्म में हैं जो कुछ बोल रही हैं सच ही बोल रही हैं ये बात अलग है कि उनके मुखारविंद से जो कुछ भी निकल रहा है वो राजनेताओं को खल रहा है, अब देखो ना उन्होंने साफ -साफ  कह दिया कि राजनेताओं का दो नंबर का पैसा खर्चीली शादियों में खर्च होता है बड़े-बड़े रिसोर्ट में, मैरिज गार्डन में राजनेता अपने बेटे बेटियों की शादी ब्याह करते हैं उसमें उनका दो नंबर का पैसा खप जाता है अब उमा जी को कौन समझाए कि आजकल का जमाना शो बाजी का है यदि राजनेता अपने बेटे बेटियों की शादी मंदिर में करने लगे, धर्मशाला से करने लगे, अपने घर के बाहर की गली में टेंट लगाकर करने लगे तो धिक्कार है ऐसे राजनेता होने का। अरे भाई राजनेता हैं हजारों लोग उनके परिचित होते हैं सबको शादी ब्याह में बुलाना पड़ता है और फिर यह भी बताना पड़ता है कि बड़े बड़े नेता, व्यापारी, उद्योगपति, अफसर उनकी बेटी बेटियों की शादी में आए थे, पैसे देकर अभिनेताओं को बुलाया जाता है जो वहां जाकर डांस भी करते हैं। फाइव स्टार होटल में बारातियों को ठहराना पड़ता है। दो ढाई हजार रुपए प्लेट का खाना भी रहता है और फिर जब कमाई है तो फिर खर्च करने में पीछे क्यों रहे यह भी तो आपको सोचना चाहिए। इधर दूसरी तरफ इंदौर के महापौर के बारे में भी उन्होंने साफ -साफ कह दिया कि अगर अफसर आपकी नहीं सुन रहे तो आपको पद रहने का क्या हक है? वैसे भी अफसर तो अफसर होता है वो अगर किसी की सुनने लगा तो फिर काहे के अफसर। उनको मालूम है कि नेता तो आते जाते रहते हैं अपन तो तीस पैंतीस साल तक नौकरी करेंगे इसलिए वे किसी को तवज्जो नहीं देते। उनको ये भी मालूम है कि सारा काम तो उन्हीं को करना होता है। नेताओं को जैसा समझा दो वैसा भी समझ जाते हैं इसलिए अकेले इंदौर के महापौर को पद छोडऩे के लिए काहे को आप कह रही हैं। किसी भी मंत्री से पूछ लो कि उनके डिपार्टमेंट के सचिव उनकी कितनी सुनते हैं ना उनकी आंखों में आंसू आ जाए तो कहना।

सुपर हिट ऑफ  द वीक

श्रीमती जी को खुश करने के लिए श्रीमान जी ने सुबह उठ कर फ्रिज से दूध का बर्तन निकाल कर पकने के लिए गैस पर रख दिया
दस मिनट के बाद श्रीमती जी ने आकर देखा और चिल्ला कर बोली
‘दो पैसे की भी अकल नहीं है तुममें वो दूध नहीं इडली का घोल है’।

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Author: Jai Lok

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