
जय लोक @राजेन्द्र चंद्रकांत राय
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– सच्चिदान्द शेकटकर , संपादक जयलोक


(जयलोक)। दीवानगी, कला का दाय है। कला, शौक से उत्पन्न होती है, परंतु परवान तभी चढ़ती है, जब शौक जुनून में तब्दील हो जाता है। कला की दुनिया ने उन्हें ही याद रखा, जो उसके इश्क में पडक़र दीवाने हो गए। पागल कहलाए। समाज ने उन्हें गैरदुनियादार का खिताब अता किया। उपेक्षा की। पर यादों की किताब में ऐसे लोग ही अमर बनकर बसे रहे, जबकि नोन-तेल-लकड़ी का हिसाब-किताब रखने में ही जिंदगी बिता देने वालों का नाम-ओ-निशां न रहा। जबलपुर में फोटो-पत्रकारिता के जनक महेंद्र चौधरी की गणना ऐसे ही कला-साधक के रूप में की जायेगी। उनका जन्म 18 अक्टूबर, 1936 को भगतलाल सुरखीचंद चौधरी के यहाँ हुआ था। वे उनके नवासे थे। अपने जमाने के उच्च शिक्षित सेठ कंछेदीलाल चौधरी उनके पिता थे। पत्नी की असमय मृत्यु ने सेठ कंछेदीलाल चौधरी को गहरा सदमा पहुँचाया था। वे दीन-दुनिया से बेखबर हो गए थे और एकांतवास उनका ठिकाना बन गया था। इस तरह महेंद्र बाबू का बचपन सूना पड़ गया था। वात्सल्य और विपदाओं में संरक्षण देने वाली वट-छाया से वे वंचित हो गए थे। ऐसी वंचना अक्सर आवारगी की तरफ ले जाया करती है। महेंद्र चौधरी को भी ले गई, पर वह निरर्थक आवारगी न होकर कलामय यायावरी बन गई थी। उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले छाया चित्र लुभाने लगे थे। एक सजीव मनुष्य, अपनी फोटो में अचल काया लेकर कैसा अनोखा दिखने लगता है, यह विचार उन्हें उद्वेलित करने लगा था। सिनेमा में यही छाया चित्र बोलते-बतियाते, चलते-फिरते और दुख-सुख में आते-जाते दिखाई देते थे। सब कुछ चमत्कारी ही लगता था। उसके पीछे का विज्ञान उन्हें अपने लपेटे में लिए जा रहा था। उनके अंदर उसके रहस्य को जान लेने के लिए बेचैनी पैदा हो गयी थी। ऐसे में राय फोटो स्टूडियो के स्वामी कल्लन राय से उनकी मुलाकात हुई। यह मुलाकात दो व्यक्तियों की मुलाकात भर न थी, एक स्वप्नदर्शी की अपने सपने के साथ होने वाली मुलाकात थी। कल्लन राय फोटोग्राफी कला में निष्णात कलाविद् थे और महेंद्र जी उस कला की चौखट पर कदम रखने को आतुर पदातिक। उन्होंने एक-दूसरे को ग्रहण कर लिया। वे परस्परता में आबद्ध हो गए। महेंद्र जी का पैतृक-परिवार समृद्धि के आसमान पर हुआ करता था। कोई अभाव न था। महेंद्र भाई ने आसानी से अठारह रुपये जुटा लिए और एक कैमरा खरीद लिया। उनके हाथों में आकर कैमरा, कैमरा न रहा, जादू की छड़ी हो गया। वे उसके जरिये अपनी कल्पनाओं और लालसाओं को रूप प्रदान करने के लिए उतावले हो गए। उन्हें जल्दी ही एक बड़ा और ऐतिहासिक मौका भी हासिल हो गया। देश के उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की मृत्यु हो गई थी और उनकी अस्थियों का एक अंश नर्मदा में विसर्जित किए जाने के लिए, जबलपुर लाया गया था। उन्होंने अपने कंधे पर कैमरा टांगा, अपनी सायकल सम्हाली और फिर पैडल पर पैर चले, मन में उत्साह की हिलोरें कि वे उस अप्रतिम क्षण को अपने कैमरे में कैद करने वाले हैं, जो फिर कभी दोबारा नहीं आयेगा। सायकल भाग रही थी, उससे भी तेज गति से महेंद्र भाई के मन में उमड़-घुमड़ रहे विचारों के बादल भागे जा रहे थे। महेंद्र जी ने कई कोणो से फोटो लिये। उसी गति से नगर लौटे और श्री ब्लाक्स वर्क्स, जो कृष्णा टाकीज परिसर में हुआ करता था, में फोटो का ब्लाक बनने डाला। उन दिनों लैटर प्रेस होते थे और उनमें फोटो छापने के लिए पहले फोटो का ब्लाक बनवाना पड़ता था। ब्लाक बनवाना एक नया खर्च होता था, लिहाजा समाचार पत्र कभी-कभार ही किसी बहुत महत्ता वाली फोटो का ही ब्लाक बनवाते थे, अन्यथा अखबार फोटोविहीन ही छपा करते थे।
फोटो पत्रकारिता के संसार में एक उक्ति बहुत लोकप्रिय है, जो बात एक हजार शब्दों में कहना पड़ती है, उसे एक ही फोटो के जरिये कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से कहा जा सकता है। यही सच है, इसीलिए आज हम समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को फोटो से भरा हुआ पाते हैं। आप भी खबरों से पहले फोटो को ही निहारते हैं।
उन दिनों जबलपुर से ‘जयहिंद’ नामक समाचार पत्र निकला करता था, कालिकाप्रसाद दीक्षित ‘कुसुमाकर’ उसके संपादक हुआ करते थे। महेंद्र चौधरी जी का वह फोटो जयहिंद में छपा। दूसरे दिन उन्होंने अपने फोटो को छपा हुआ देखा, तो वे दिली खुशी से झूम उठे। मन का मयूर नाच उठा। साध पूरी हुई। पहला कारनामा प्रकट हुआ। उत्फुल्लता ने अपने झमाके में ले रखा था। वे अखबार लेकर कल्लन राय के पास पहुँचे। उन्हें दिखाया। उन्होंने पीठ ठोंकी। उत्साह बढ़ाया। दोस्तों ने बधाइयाँ दीं। पर दादा सुरखीचंद नाराज हो गए। उन्हें यह बात जरा भी गवारा न थी, कि एक अमीर घराने का लडक़ा कैमरे को कंधे पर टांगकर घूमता फिरे और चौधरी खानदान की इज्जत पर बट्टा लगाया करे।
दादा के पास उन दिनों बेबी आस्टिन कार हुआ करती थी, जो चंद लोगों के लिए भी दुर्लभ ही थी। कमानिया गेट के पास चौधरी पेपर मार्ट नाम की दूकान थी। जेके पेपर्स, ओरिएंट पेपर सहित सभी प्रमुख पेपर कंपनियों की पूरे सीपी एंड बरार क्षेत्र के लिए एजेंसी थी। खासी आमदनी थी। उसी आमदनी से उन्होंने मंदिर और हस्पताल बनवाए थे। अपनी 35 किलोग्राम वजन वाली बहु को बीस किलोग्राम गहनों से लादकर सिवनी से जबलपुर विदा कराकर लाये थे। ऐसे अमीराना खानदान के एकल संतानों वाली परंपरा के इस उत्तराधिकारी नवासे के तौर-तरीके देखकर वे निराश रहने लगे थे। उन्हें उम्मीद थी कि महेंद्र बाबू उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने के काम में लगेंगे, पर वे तो कैमरा लटकाए जबलपुर की गलियों-सडक़ों की धूल फाँकते रहते थे। नवासा बेराह हो गया तो क्या, उसके प्रति प्रेम भी तो पूरा ही था। लिहाजा उन्होंने गुस्सा उस पर निकालने की बजाय, दूकान पर निकाला। पेपर मार्ट पर ताला ल्रगा दिया, कि अब हम कमाएं भी तो किसके लिए कमाएं?
इस पर भी महेंद्र चौधरी के जुनून पर कोई सिकन न आयी। उधर आमदनी के रास्ते बंद होते जा रहे थे, इधर खर्चे थे कि बढ़ते जा रहे थे। हालात ये हुए कि कर्ज लिया जाने लगा। सूद और सूदखारों के अपने गणित के चलते घर बिकने लगे। दुर्दिनों ने डेरा डाल लिया। हनुमानताल वाला घर ही बचा रह सका। महेंद्र बाबू अपने कला-प्रेम में डूबे रहे। उनके चित्रों को ख्याति मिल रही थी। जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, संडे मेल, इंडिया टुडे, रविवार, धर्मयुग, अमृत बाजार पत्रिका, जागरण, अमर उजाला और इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया में उनके फोटो लगातार छप रहे थे। जबलपुर के जयहिंद, नवभारत, नवीन दुनिया, युगधर्म, देशबंधु, स्वदेश , दैनिक भास्कर, हिंदी एक्सप्रेस, जयलोक और जबलपुर एक्सप्रेस जैसे अखबारों में भी उन्हें महत्ता मिल रही थी। नाम हो रहा था। कीर्ति फैल रही थी। उन्हें जबलपुर में फोटो पत्रकारिता का जनक माना जाने लगा था।
वे प्रगतिवादी और सकारात्मक पत्रकारिता पर विश्वास करते थे। उनके जीवन में घटी एक अनोखी घटना का खास महत्व है। वह 1992 का साल था। आडवानी जी की रथयात्रा और बाबरी मस्जिद ध्वंस का साल। देश का सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ गया था। ऐसे में जबलपुर के एक समाचार पत्र ने झूठी खबर छाप दी कि पुरानी खेरमाई मंदिर को गिरा दिया गया है। अफवाहें फैल चलीं। नगर दहशत में आ गया। प्रशासन परीक्षा की आग में जा पड़ा। ऐसे में महेंद्र चौधरी ने ठाना कि वे कर्फ्यु के दौरान भी अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए जाएंगे। उन्होंने अपना स्कूटर उठाया और निकल पड़े। उन्होंने पाया कि सभी मंदिर सुरक्षित हैं। कोई नहीं टूटा है। उन्होंने फोटो लिए और अगले दिन उन्हें नवीन दुनिया ने छाप दिया। मंदिरों को पूरे नगर ने सही सलामत देखा। उत्तेजना और तनाव काफुर हुए। चैन आया। एक बुरी घड़ी देहरी तक आकर लौट गई। महेंद्र चौधरी को उनके इस जिम्मेदार, जांबाज और अनोखे कलाकर्म के लिए विभिन्न संस्थाओं के द्वारा सम्मानित किया गया। मौलाना साहब ने अपने हाथ से उर्दू में खत लिख कर दिया। मप्र सरकार ने सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने के लिए स्थापित किया गया कबीर सम्मान उनके लिए घोषित किया।
जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्हें कैंसर ने अपना शिकार बना लिया था। 22 फरवरी, 1996 को वे इस असार संसार से विदा हो गए। प्रदेश सरकार ने उनके नाम पर ‘महेंद्र चौधरी स्मृति फोटो पत्रकारिता पुरस्कार’ की स्थापना की है। उनकी याद में पिछले पच्चीस सालों से ‘महेंद्र चौधरी स्मृति चित्रांजलि प्रतियोगिता’ आयोजित होती आ रही है। अब इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली, पश्चिम मध्य सांस्कृतिक केंद्र ने भी इस प्रतियोगिता को आरंभ कर दिया है। थीम फेस्टिवल ऑफ जबलपुर भी अब आगे बढक़र थीम फेस्टिवल ऑफ इंडिया हो गया है। इसके लिए एक लाख, पचास हजार और पच्चीस हजार राशि वाले तीन पुरस्कार प्रतियोगी छायाकारों को दिए जाते हैं।

धन्य हैं महेंद्र चौधरी और उनका कलाकर्म।
प्रणाम महेंद्र चौधरी!
प्रणाम जबलपुर!!
Author: Jai Lok







