
सेवाराम त्रिपाठी
परिचय
नाम: सेवाराम त्रिपाठी, जन्म : 22-07-1951 को जि़ला सतना (म.प्र.) के ग्राम जमुनिहाई में।वर्ष 1972 से मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग में शिक्षण कार्य शुरू करके 31जुलाई 2016 में सेवानिवृत्त। इस दरम्यान दो वर्ष तक मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल में संचालक पद का दायित्व भी सँभाला। वर्ष 1970 से ‘पहल’, ‘वसुधा’, ‘वागर्थ’, ‘परिकथा’, ‘अक्षरपर्व’, ‘सापेक्ष’, ‘व्यंग्य-विविधा’, ‘कृति ओर’, ‘साक्षात्कार’, ‘कलावार्ता’, बनास जन‘अभिव्यंजना’, ‘रचना’,सृजन सरोकार’, विपाशा , , समकालीन अभिव्यक्ति,रंग संवाद ,व्यंग्य यात्रा ,‘साहित्य विकल्प’, ‘देशज,मड़ई’, ‘उत्तरप्रदेश’, मुक्तांचल, सबरंग, संवेद, उपनयन, प्रेरणा, लोकचेतना वार्ता, इसलिए, सृजन पथ, शीराजा, पाठ, प्रयाग पथ, शब्दार्थ, यात्रा, मंच, शोधसृजन, सबलोग, समय के साखी,‘ संवदिया ,जनसत्ता’, ‘जनयुग’, ‘देशबंधु’, ‘नई दुनिया’, ‘दैनिक भास्कर’ ‘चौमासा’, ,‘अनुगुंजन’, ‘आकंठ’अभिव्यक्ति,आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं वैचारिक आलेख सतत प्रकाशित। इस दौर में समय, समाज, मीडिया, और हिन्दी आलोचना जगत का एक प्रतिष्ठित नाम। कृतित्व विपुल है अपितु। प्रमुख रचनाएँ- 1. अंधेरे के खि़लाफ़ (1983) कविता संग्रह 2.ख़ुशबू बाँटती हवा (2016) कविता संग्रह 3.मुक्तिबोध; सर्जक और विचारक (2001) आलोचना दूसरा संस्करण (2019)4. बघेली; अंतरंग और बहिरंग (2016) शोधपरक पुस्तक 5.हर समय एक सपना जागता है (2019) आलोचना 6.समय के सुलगते सरोकार (समय,समाज और मीडिया पर प्रश्नांकन) आलोचना (2019) 7.हाँ, हम राजनीति नहीं कर रहे! (व्यंग्य संग्रह) 2020 8 सेवाराम त्रिपाठी चयनित व्यंग्य रचनाएं (2025) 9 व्यंग्य: कितने दूर, कितने पास (2025) 10. हरिशंकर परसाई: पुनर्पाठ और पुनर्विचार (2025)संपादन- 1. प्रगतिशील वसुधा प्रो0 कमला प्रसाद के साथ(अंक 23से 47तक)2.रचना (स्वतंत्र संपादन)3.कमला प्रसाद: व्यक्ति और सर्जक (संयुक्त संपादन)19984.सोन और रेवा के स्वर (संयुक्त संपादन)20035.काशी पर कहन (संयुक्त संपादन)6. महापण्डित राहुल सांकृत्यायन (संयुक्त संपादन)7. समकालीन कहानियाँ (संयुक्त संपादन)8. अजनबी नहीं फज़़ल ताबिश (संयुक्त संपादन)9.समकालीन कविता(संयुक्त संपादन)10.युगसाक्षी हरिशंकर परसाई (संयुक्त संपादन)11.स्मरण में आज जीवन (एकल संपादन)2005 प्रकाशनाधीन- तीन निबंध संग्रह शीघ्र प्रकाश्य/एक कविता संग्रह, एक व्यंग्य संग्रह/ प्राचीन एवं मध्ययुगीन कविताओं पर एक कि़ताब प्राय: पूर्ण, आधुनिक काल की कविताओं पर दो पुस्तकें पूर्ण, एक कि़ताब । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में चार सौ से ज़्यादा आलेख प्रकाशित। सम्मान- मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी पुरस्कारए प्रो कमला प्रसाद स्मृति आलोचना सम्मान।
-प्रस्तुति-रमेश सैनी

आज के इस दौर में हर आदमी इस बात को बखूबी समझ गया है कि छोटा बनना ठीक नहीं। छोटा बनने में नुकसान ही नुकसान हैं। छोटा बनना खतरे से खाली नहीं। छोटे के ऊपर बड़े हमेशा धौंस जमाते रहते हैं। उसका भरपूर-शोषण किया जाता है। छोटे हमेशा ठुँक रहे हैं, पिट रहे हैं। उनकी झोपडिय़ाँ धूं-धूं कर जलाई जा रही हैं, यही नहीं उनकी इज़्ज़त भी लूटी जा रही है। सच तो यह है कि समूचे नगाड़े उन्हीं पर बज रहे हैं। इस कार्यवाही में बड़ों की आत्माएं खिलखिला रही हैं। संघर्ष और द्वन्?द्व चौतरफा बढ़ रहे हैं। इसलिए हर आदमी बड़ा बनने की इच्छा रखता है। इसमें कोई ग़लत बात भी नहीं है। मैं स्वयं कहता हूँ कि बड़ा बनने की इच्छा रखो, उसी तरह के प्रयास करो, फिर तुम्हें कोई बड़ा बनने से रोक ही नहीं सकता।

लेकिन आदमी के मात्र इच्छा करने से तो कोई बड़ा नहीं हो जाता। बड़ा बनने के लिए उसे उन सभी साधनों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे उसके हौसले बढ़ें। तभी कोई सचमुच बड़ा बन पाता है। कुछ सज्जन इसी में अकड़े-अकड़े फिरते हैं कि वे नामी-खानदानी है, बड़े बाप के बेटे हैं। लेकिन काम उनके इतने खोटे होते हैं कि उन पर सब कोई थूकते हैं। बड़ा वह होता है जो अपने कर्मो के द्वारा सबका प्यारा हो जाए। समाज के गाढ़े वक़्त में काम आए। हमारे गाँव के पास एक सेठ जी थे और उनका पेट काफी बढ़ गया था- उनका चलना-फिरना मुश्किल था जो लोग उन्हें देखते थे, उनकी चुभती निगाहें उनको डराती थी।बड़ा बनना बड़ी साधना, तपस्या और त्याग का काम है, बड़ा वही है जो जमाने के आँसू पोंछे, गरीबों एवं शोषितों के घावों में मरहम लगाएं। उन्हें ऊपर उठाएं उनके अंदर की शक्ति को पहचाने। उन्हें हिमालय की तरह ऊँचा उठाएं इस विकट जीवन संग्राम में लडऩे के लिए उन्हें खड़ा करे। लेकिन आजकल लोग हवा में बड़े बन रहे हैं। कुछ लोग बड़ा बनने के लिए अपने प्रचार-प्रसार के निजी और सार्वजनिक माध्यमों का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। तरह-तरह के दंद-फंद और हद दर्जे की टुच्चई वे निरंतर करते फिरते हैं, लिहाजा वे बड़ा बनने के बजाय निरन्तर छोटे और क्षुद्र बनते चले जाते हैं। सो क्या कहें बनने की बीमारी कुछ महात्माओं को घुन की तरह लगी हैं। वे देखते-देखते बड़े बन जाते हैं और होता कुछ ऐसा है कि उन्हें ऐसी पटखनी लगती है कि कांखते-कराहते हुए अपने स्थान पर आ जाते हैं। बड़ा बनना आदमी से क्या-क्या कराता है और पता नहीं उनसे क्या करा सकता है?मेरे एक परिचित हैं राम सुमिरन। अच्छी खासी अफसरी करते हैं। दिन-रात चाँदी काटते हैं और रुपयों की गड्डी से खेलते हैं। लेकिन इधर कुछ दिनों से उनके मन में बड़ा बनने की तमन्ना समुद्र की तरह हिलोरे मारने लगी है, इसलिए वे येन-केन-प्रकारेण बड़ा बनने की जबर्दस्त धुन में घूम रहे हैं। धुन आदमी से चाहे जो कराए। उनके कर्तव्यों का यहाँ शंखनाद हो रहा है। उन्होंने अपने कुछ चंगू-मंगू पाल रखे हैं- जो उनका प्रचार-प्रसार करने में तन-मन-धन से जुटे हैं।

उनकी इच्छा का विस्तार जोर-शोर से किया जा रहा हैं। यूं तो मेरे परिचित पूरी तरह से सैद्धांतिक हैे। वे सिद्धांतों के लिए ही जीते मरते हैं। व्यावहारिकता से उन्हें सख़्त चिढ़ है, इसलिए व्यावहारिक धरातल पर वे हमेशा असफल हो जाते हैं, कभी-कभी फिसल भी जाते हैं, यहाँ तक कि कोई तालमेल नहीं बिठा पाते। पारिवारिक, सामाजिक जीवन में उन्हें कभी सफलता हासिल नहीं हो पाती। इस कारण वे निरन्तर झींकते रहते हैं। मैंने उन्हें ज़्यादातर अनमना और घुन्ना देखा है यानी चुपचाप रहने वाला।वे अपनी भड़ास निकालते हैं, दूसरों पर दोषारोपण करके। इधर उन्हें भाषण देने की धुन चढ़ी है। भाषण देने की उन्होंने नई तजऱ् पाल ली है। वे भाषणों के बल पर बड़ा बनना चाहते हैं। वे पढ़ते-लिखते हैं, लेकिन उसमें कोई तालमेल नहीं। वे भाषण देते हैं कुछ, और वह हो कुछ और जाता है। वे बोलते हैं; लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि वे क्या बोल रहे हैं और ऐसा क्यों बोल रहे हैं और उन्हें क्या बोलना चाहिए, सही गलत उन्हें समझ में नहीं आता, उन्हें बोलने से मतलब, क्या इसे मुँह की खुजली कहा जाए। फिर भी उन्हें बोलना अच्छा लगता है इसलिए तो वे निरंतर बोलते चले जा रहे हैं। उनका बोलना किसी के भी खिलाफ़ जा सकता है। स्वयं अपने ख़?िलाफ़ भी। बड़ा बनने की इच्छा चाहे जो कराएं, वे किसी को भी पटक सकते हैं। उनके लिए दूसरों की छीछालेदर करना बांये हाथ का खेल है।
भाषण देने का उन्हें इतना शौक है कि अकेले कमरे में शीशे के सामने खड़े होकर घण्टों भाषण देते रहते हैं। वे दूसरों को नीचा दिखाने के लिए किसी के भी पापड़ बेल सकते हैं। निम्न से निम्न स्तर का हथकण्डा रच सकते हैं। वे अपने मिसफिटपने को छिपाने के लिए कहीं भी फिट हो सकते हैं। लोगों की आम धारणा हैं कि दस बीस माइक इक_ा लगवाकर उनके भाषणों का प्रसारण करवा दिया जाए ताकि उनकी भड़ास निकल जाए। हर हालत में उनकी भाषणबाजी निखरनी चाहिए ताकि वे चैन से जी सकेें। एक दूसरे महापुरुष हैं। वे दिन-रात घूमते हैं और अपने को हर जगह बड़ा बनाने के प्रयत्न में मशगूल रहते हैं। उन्होंने अपना एक ‘ठलुआ क्लब‘ बना रखा है, जिसके वे पदेन मुखिया हैं। हर स्थिति में वे मुखिया ही रहना चाहते हैं। मेरे एक अभिन्न परिचित हैं। वे स्वयंभू आदमी हैं। अखिल भारतीय बहनोई संघ के पदेन अध्यक्ष। इसे वे बड़ी निराली शान से बताते हैं और बेहद खुश रहते हैं। बड़ा बनने की तमन्ना ने उन्हें खुश होने की चाबी सौंपी हैं। उनकी आत्मा हमेशा बेचैन रहती है। इस बेचैनी को दूर करने के लिए वे प्रत्येक दिन सांध्य क्रिया करते हैं। यानी सुरापान करते हैं यदि यह न कहें तो उसे आप रसरंजन कह सकते हैं। वे अपनी आत्मा को स्नान इसी तरह कराते हैं। जब तक वे आत्मा को भरपूर स्नान नहीं करा देते हैं, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता। इस दैनिक क्रिया को पूरा करने के पश्चात वे हर जगह अपने आपको बड़ा बनाते फिरते हैं। दूसरों का छिद्रान्वेषण करना उनका बहुत प्यारा धंधा है। इसी बलबूते वे अपने को बड़ा बना लेते हैं। दिन को वे अपनी मांद में सोये पड़े रहते हैं। केवल कुछ ठोस और द्रव का उत्पादन करते हैं। उन्हें इसके अलावा कुछ करना नहीं पड़ता । अपने आपको बड़ा बनाने की क्रियाएं अनंत हैं। उनके प्रयोग भी अनंत हैं। जिनको जहाँ से सरकना है वहाँ से सरक जाएं और ताड़ की तरह बड़े हो जाएं। कोई क्या कर सकता है? लोगों का अंदाज़ है कि उनकी संध्या ठीक से बीतेगी। जाहिर है कि उनकी आत्मा पूरी तरह से सांध्य क्रिया में डूब जाएगी।
वे कुछ दिन बाद वाकई बड़े बन जाएंगे। लोगों का मानना है कि अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए इस तरह की क्रियाएं अत्यंत सार्थक होती हैं। शायद यही बड़े बनने की सफलता की कुंजी है।
इधर गाली और गोली की सभ्यता का जमकर विकास हुआ है। ये सभ्यता घर, परिवार, प्रांत, और देश से उठकर समूची दुनिया में कायदे से प्रचारित हो रही है। अमरीका ने बड़ा बनने के लिए कई तरह के षड्यंत्र और शिगूफे छोड़ रखे हैं। वह छोटे-छोटे देशों को निरन्तर धमकाता रहता है और खुश होता है। यदि लोग बड़ा बनने की प्रबल इच्छापूर्ति के लिए अनुसंधान कर रहे हैं तो आखिर बुराई क्या है?
आतंकवादी दिन दूने और रात चैगुने बड़े हो रहे हैं और उनको चैलेंज करने वाले, अवरोध खड़ा करने वाले निरन्तर घट रहे हैं। आतंकवादी बड़ा बनने की इच्छा में हर दिन दस पांच लोगों को गोली का निशाना बना रहे हैं। सरकार पूरी तरह उन्हें पकडऩे का प्रयास कर रही है। पकड़ तो पाती नहीं लेकिन उनका कद निरन्तर ऊँचा हो रहा है। आतंकवाद का उत्पादन और व्यापार पूरी दुनिया में लार्जस्केल पर हो रहा है। आतंकवादी दिन-रात ऊँचाइयों की फसलें लहलहा रहे हैं।
Author: Jai Lok






