
ज्योतिष पीठ एवं द्वारका शारदा पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के निजी सचिव ब्रम्हचारी सुबध्दानंद जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे शुरू से ही एक साथ कई मोर्चों पर काम करते आ रहे हैं। स्वामी स्वरूपानंद जी जब शंकराचार्य नहीं बने थे और वह दंडी स्वामी थे तब किशोर अवस्था से ही ब्रम्हचारी सुबुध्दानंंद जी ने अपना जीवन अपने गुरु को समर्पित कर दिया।
ब्रम्हचारी सुबुध्दानंद जी ने अपने गुरु की सेवा में ऐसे ऐसे कार्य किये कि गुरु जी ने उन्हें अपना निजी सचिव बनाना आवश्यक समझा। अपने गुरु के सेवा कार्यों में निजी सचिव के रूप में ब्रम्हचारी सुबुध्दानंद जी अपेक्षाओं के अनुरूप खरे उतरे। ब्रम्हचारी जी हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि अपने गुरुजी को किसी भी तरह का कष्ट ना हो और उनकी सेवा के लिए जो भी आवश्यकता होती उन्हें पूरा करने की दिशा में हमेशा तत्पर रहते। अपने गुरु के लिए यदि हेलीकॉप्टर की आवश्यकता हो या चार्टर प्लेन की आवश्यकता हो या फिर ट्रेन में पूरे सेलून की आवश्यकता हो उसे ब्रम्हचारी जी हमेशा उसकी व्यवस्था कराते रहे। स्वामी स्वरूपानंद जी शंकराचार्य बने तो उसके पहले भी वे शंकराचार्य की तरह ही पूजित होते थे। स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती जब ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य बने तो उन्हें शंकराचार्य के रूप में सिर्फ संघर्ष ही विरासत में मिले उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसका उपयोग वे शंकराचार्य के रूप में कर पाते। स्वामी स्वरूपानंद जी ने ज्योतिष पीठ के क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विराट भूभाग में नए संकल्पों के अनुरूप कई बड़ी परियोजनाओं को संचालित किया और बड़े-बड़े निर्माण कार्य भी उनके द्वारा कराने की शुरुआत की गई। इन सब कामों में ब्रम्हचारी सुबुध्दानंद जी की भूमिका महत्वपूर्ण हुआ करती रही। बद्रीनाथ केदारनाथ जैसे दुर्गम क्षेत्र में विशाल निर्माण कार्य कराने की चुनौती ब्रम्हचारी सुबुध्दानंद जी ही उठाते रहे हैं। यहां जो निर्माण कार्य हुए और प्रतिमाओं की स्थापना हुई उन्हें जरूरत पडऩे पर हेलीकॉप्टर से भी पहुंचाने की व्यवस्था ब्रम्हचारी जी करते रहे और यदि किसी सामग्री को ले जाने के लिए 100 लोगों के समूह की आवश्यकता होती तो उसे भी वह पूरा करते। जोशीमठ में शंकराचार्य जी का विशाल आश्रम निर्मित हुआ वहीं कई और नए-नए मठ और मंदिर भी निर्मित हुए, धर्मशालाएं भी निर्मित हुई। शंकराचार्य जी जो भी कार्य हाथ में लेते चाहे उसमें लाखों करोड़ों रुपए खर्च होना हो उन कामों को भी शुरू कराने और उन्हें पूरा कराने का जिम्मा प्रमुख रूप से ब्रम्हचारी सुबुध्दानंद जी ही उठाते रहे हैं। ब्रम्हचारी जी ने समाज के हर वर्ग के लोगों को गुरु जी से जोडऩे के सतत प्रयास किये । समाज के गरीब वर्ग के लोग हों या फिर देश के अमीर लोगों हों ब्रम्हचारी जी उनसे अपने पारिवारिक संबंध बना लिया करते हैं। इनमें से किसको किस तरह की सेवा कार्य के लिए कहना है इसका आभास उन्हें बखूबी है। ब्रम्हचारी जी की विशेषता है कि एक बार जिससे जुड़ जाते हैं तो उसे वे कभी भूलते नहीं है और उसके परिवार के हर सदस्य के बारे में व्यक्तिगत रूप से जानकारी भी रखते हैं यह उनका सबसे बड़ा गुण है जिससे वह हर परिवार से जुड़े रहते हैं और सुख दुख में हमेशा शामिल रहते हैं । यदि किसी को किसी तरह की परेशानी है तो उसकी मदद करने में भी ब्रम्हचारी जी हमेशा तत्पर रहते हैं। ब्रम्हचारी जी की यह विशेषता है कि आज भी जिससे जो भी सेवा का कार्य बताते हैं वह कार्य पूरा होता है। स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने देशभर में 70 से अधिक मठ, मंदिरों एवं धर्मशालाओं का निर्माण भी कराया। इन निर्माण कार्यों में ब्रम्हचारी सुबुध्दानंद जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और आज भी यह निर्माण कार्य चल रहे हैं। ब्रम्हचारी जी को निर्माण कार्यों को लेकर ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त है कि वह जबलपुर में बैठकर भी बद्रीनाथ केदारनाथ हो या फिर रायपुर, भोपाल के शंकराचार्य आश्रम हों उन में जो भी कार्य हो रहे हैं उस पर वे अपने निगरानी बनाकर रखते हैं। यदि हम अपने जबलपुर की ही बात करें तो सिविक सेंटर में बगलामुखी देवी के भव्य मंदिर का निर्माण और इस परिसर में शंकराचार्य मठ का निर्माण ब्रम्हचारी जी के प्रयासों से ही संभव हुआ है। तिलवारा घाट में नर्मदेश्वर मंदिर और लक्ष्मी नारायण के मंदिर के निर्माण में भी ब्रम्हचारी जी की महत्वपूर्ण भूमिका है। 50 वर्षों से अधिक का ब्रम्हचारी जी के साथ संपर्क है स्मृतियों की भरमार है। आज उनके पावन जन्म दिवस पर उनके चरणों में सादर नमन और उनके स्वस्थ रहने और शतायु होने की कामना है।
Author: Jai Lok







