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मिशन 2028 की तैयारी में जुटी भाजपा

भाजपा का शंखनाद अबकी बार 200 पार
भोपाल (जयलोक)। 2023 के विधानसभा चुनाव में 163 सीट और 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी 29 सीटें जीतने के बाद मप्र में भाजपा का उत्साह चरम पर है। इसको देखते हुए भाजपा ने 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर दी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, मिशन 2028 के लिए पार्टी ने अबकी बार 200 पार का लक्ष्य बनाया है। इसके मद्देनजर पार्टी दो साल पहले से ही चुनावी मोड में आ गई है। पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने विधानसभावार बैठकें शुरू कर दी है। हालांकि भाजपा की सक्रियता की एक बड़ी वजह यह भी है कि प्रदेश में अगले तीन साल में छह चुनाव होंगे। 2026 में सहकारिता, मंडी और जल उपभोक्ता समिति के चुनाव कराने की तैयारी है। वहीं, 2027 में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायतराज संस्थाओं के चुनाव प्रस्तावित हैं। 2028 के अंत में विधानसभा के चुनाव होंगे। भाजपा इसकी तैयारियों में जुट गई है।
मप्र में 2028 के विधानसभा चुनाव भले ही दूर हों, लेकिन सत्ता दल भाजपा ने अभी से अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। संगठन ने इसे अर्ली स्टार्ट रणनीति के तहत लिया है, ताकि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत किया जा सके और सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसी क्रम में भाजपा ने प्रदेशभर में विधानसभावार बैठकों का सिलसिला शुरू कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश प्रभारी, संगठन महामंत्री और अन्य वरिष्ठ नेता अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के साथ सीधे संवाद कर रहे हैं। इन बैठकों में बूथ, मंडल और शक्ति केंद्र स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। प्रारंभिक तौर पर पार्टी ने राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आरक्षित 47 विधानसभा सीटों पर फोकस किया है। असकी वजह यह है कि लंबे समय से ये सीटें सत्ता के समीकरण तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। भाजपा प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं से संवाद भी चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश हेमत खंडेलवाल की मंशा के मुताबिक भाजपा प्रदेश कार्यालय में मंत्री रोजाना दो घंटे बैठ रहे हैं। यहां कार्यकर्ताओं की समस्याओं को सुना जा रहा है और उनसे क्षेत्र का फीडबैक भी लिया जा रहा है। इस संवाद के माध्यम से कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जा रहा है। साथ ही उनको यह भी संदेश दिया जा रहा है कि सत्ता और संगठन दोनों ही भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए पूरी तरह से समर्पित है। उनकी मेहनत को किसी भी स्तर पर नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
संगठनात्मक फीडबैक भी लिया जा रहा
सूत्रों के अनुसार, विधानसभावार बैठकों के दौरान संगठनात्मक फीडबैक भी लिया जा रहा है। किस क्षेत्र में संगठन मजबूत है और कहां कमजोरी है, इसका आकलन कर सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। कमजोर बूथों की पहचान कर वहां अतिरिक्त कार्यकर्ताओं की तैनाती और कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाने की योजना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह कदम आने वाले चुनावों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भाजपा नेतृत्व का फोकस साफ है संगठन, सरकार और कार्यकर्ता के बीच मजबूत समन्वय स्थापित कर चुनावी मैदान में बढ़त हासिल करना। कुल मिलाकर, भाजपा ने यह संकेत दे दिया है कि 2028 के विधानसभा चुनाव उसके लिए दूर की लड़ाई नहीं, बल्कि अभी से शुरू हो चुकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। संगठन का स्पष्ट संदेश है कि आगामी दो वर्षों में पार्टी की मौजूदगी हर गली-मोहल्ले तक दिखाई देनी चाहिए। बैठकों में कार्यकर्ताओं को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी जा रही है। विशेष रूप से लाड़ली बहना योजना, किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्वला योजना, आयुष्मान भारत और अन्य जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।
इन सीटों से तह होता है सत्ता का रास्ता
मप्र में आदिवासी सीटें, जिस राजनीतिक दल के हिस्से में गई, उसके हाथ में सत्ता रही। यही कारण है कि दोनों राजनीतिक दल आदिवासी सीटों पर फोकस कर रहे हैं। भाजपा इसकी तैयारी में अभी से जुट गई। भाजपा इस वर्ग के कल्याण के लिए तमाम योजनाएं चला रही है। पिछले तीन चुनाव में राज्य की 230 विधानसभा सीटों में से आदिवासी वर्ग वाली सीटों का प्रभाव रहा। इन सीटों की हार-जीत राज्य की सियासत में बड़ा बदलाव ला देती है, जिस भी राजनीतिक दल को इन सीटों में से ज्यादा पर जीत हासिल हुई, उसे सत्ता नसीब हुई है। इतना ही नहीं लगभग हर चुनाव में यहां मतदाताओं का रूख भी बदलता नजर आता है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों में से 30 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी और सत्ता में आ गई थी। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा के हाथ में 31 सीटें आई थी। समूह चर्चा में ये कहा गया कि प्रदेश में 47 विधानसभा सीटें आदिवासी और 35 विधानसभाएं अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। लेकिन, 36 सीटें ऐसी हैं जो आरक्षित नहीं हैं लेकिन, एससी वर्ग के वोटर निर्णायक हैं। इसी तरह 9 सामान्य सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी वोटर निर्णायक हैं। जो सीटें सामान्य हैं लेकिन, एससी, एसटी वोटर महत्वपूर्ण भूमिका में हैं उन सीटों के विधायकों को प्रभावशाली वोटर्स के बीच जाकर बातचीत करना चाहिए।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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