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रक्त और तेल की स्याही से लिखी जा रही भारत की विदेश नीति की दास्तान

अमित चतुर्वेदी
(जयलोक)। 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के संयुक्त हमले ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली खामेनी को तेहरान में मार गिराया। यह एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि मध्य पूर्व में भयानक आग का नया तूफान था। ट्रंप ने इसे आतंकवाद का अंत बताया, लेकिन ईरान का पलटवार अप्रत्याशित और तेज़ रहा। मिसाइलें, ड्रोन, होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी और ऊर्जा सुविधाओं पर हमले लगातार जारी हैं, 15 दिन बाद भी ईरान की मारक क्षमता जरा भी कम नहीं कर हुई है।
ढ्ढक्रत्रष्ट के क्रांतिकारी गार्ड्स अभी भी जवाबी हमले कर रहे हैं। इस युद्ध ने वैश्विक तेल गैस बाजार को हिला कर रख दिया। तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल पार कर चुकी हैं, गैस आपूर्ति ठप है और दुनिया भर में महंगाई का साया छा गया है। इस संकट में भारत की स्थिति बेहद नाजुक है।भारत की तेल आयात और व्यापारिक मजबूरियां हमें हर कदम में एहतियात बरतना सिखाती हैं। भारत ईरान से सीधे तेल नहीं आयात कर रहा है क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह आयात लगभग शून्य हो चुका है। लेकिन असली समस्या होर्मुज जलडमरूमध्य में है। हमारा 60 प्रतिशत से ज्यादा तेल सऊदी, इराक, यूएई आदि से इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है, जिस पर ईरान का पूरा नियंत्रण है। अगर ईरान ने इसे पूरी तरह बंद कर दिया, तो भारत की अर्थव्यवस्था तुरंत हिल जाएगी। रूस से अतिरिक्त तेल मिल रहा है, लेकिन होर्मुज का ताला खुलना या बंद होना हमारी ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा सवाल है। दूसरी ओर अमेरिका से व्यापार, इजराइल से हथियार और यूरोप से तकनीक, ये सब हमारे अस्तित्व के सहारे हैं। जब दो ऐसी महाशक्तियां टकराती हैं जिनसे हमें काम पड़ता है, तो मामला दो नावों पर सवार होने जैसा हो जाता है। एक तरफ ऊर्जा संकट, दूसरी तरफ व्यापारिक और रक्षा संबंध, विदेश नीति यहां फूंक फूंक कर कदम रखने वाली कला बन जाती है।

खामनेई की हत्या की खबर आने के बाद भारत की पहली प्रतिक्रिया धीमी रही। विदेश मंत्रालय ने सिर्फ गहरी चिंता जताई और संयम, संवाद तथा डी एस्केलेशन की अपील की। विपक्ष ने इसे चुप्पी की नीति कहकर तीखी आलोचना की। कुछ विशेषज्ञों ने पूछा कि क्या हम अपने रणनीतिक साझेदारों के सामने झुक गए? यह शुरुआती हिचक समझ में आने वाली थी। अचानक ऐसे संकट में तुरंत पक्ष चुनना आसान नहीं होता, खासकर जब होर्मुज पर आपकी पूरी ऊर्जा निर्भर हो। लेकिन इस हिचक के बाद भारत की कूटनीति ने सही रास्ता पकड़ लिया। पर्दे के पीछे एससीओ, ब्रिक्स और द्विपक्षीय चैनलों के जरिए दोनों पक्षों से बात की गई। भारत ने खुलकर किसी की निंदा नहीं की, बल्कि संवाद का रास्ता सुझाया। इससे ईरान और अमेरिका इजराइल के बीच कुछ हद तक सामंजस्य बिठाने में मदद मिली। फिर भी आलोचना से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। अगर शुरुआत में भारत ने थोड़ी तेज प्रतिक्रिया दी होती, ख़ामनेई की हत्या पर रोष न सही शोक ही जता दिया होता तो शायद ईरान से संबंध और मजबूत रहते और ईरान हॉरम्यूज़ के रास्ते भारत की तेल आपूर्ति में ख़लल न डालता, लेकिन तब भारत को अमेरिका इजराइल से दूरी बढऩे का डर था। हालांकि यहाँ सरकार का कैलकुलेशन थोड़ा गड़बड़ा गया, भारत ने सोचा था कि ख़ामनेई की हत्या के बाद ईरान की सत्ता में तुरंत परिवर्तन हो जाएगा, और भारत रज़ा पहलवी के नेतृत्व बनने वाली संभावित नई ईरानी सरकार से भी दोस्ती बना लेगा और अमेरिका-इसराइल से संबंध मज़बूत बने रहेंगे। लेकिन यहाँ भारत की गणना और अनुमान ग़लत साबित हो गए, और भारत अमेरिका के पक्ष में एकतरफ़ा खड़ा नजऱ आया।

सोशल मीडिया पर भारत अमेरिका के सामने घुटने टेक गया जैसे ट्रेंड चल रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि विदेश नीति भावनाओं से नहीं, गणना से चलती है। मीडिया में लाखों बहसें हो रही हैं, लेकिन यह क्षेत्र इतना संवेदनशील है कि गलत कदम से पूरा संतुलन बिगड़ सकता है। आज 15 दिन बाद भी ईरान की मारक क्षमता बरकरार है। होर्मुज अभी भी बंदी की धमकी के तले है, तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन भारत ने नुकसान को काफी हद तक सीमित रखा है। वैकल्पिक आपूर्ति के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। पड़ोसी देशों में जहां पहले से हाहाकार मचा हुआ है, पाकिस्तान अफगानिस्तान में अस्थिरता बढ़ रही है, वहां भारत की स्थिति अभी भी नियंत्रण में है। हमारी अर्थव्यवस्था में दबाव है, लेकिन  स्थिति नियंत्रण के बाहर नहीं है।भारत जो कर रहा है, वह शुद्ध देशहित को ध्यान में रखकर कर रहा है। हर सरकार का पहला फर्ज अपने नागरिकों की सुरक्षा और विकास को सर्वोपरि रखना होता है। भावनात्मक फैसले यहां महंगे पड़ सकते हैं। हां, शुरुआती हिचक पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन बाद की सक्रिय डिप्लोमेसी ने उसे संभाल लिया। यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।

अगर युद्ध जल्दी थमता है और होर्मुज फिर खुलता है, तो तेल की कीमतें स्थिर हो सकती हैं। यह बात जगजाहिर है कि अमेरिका इसराइल का बेतहाशा फ़ेवर करता है और भारत के दोनों देशों से संबंध मित्रवत हैं। व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति ट्रम्प अपने आप में कैसे व्यक्ति है उस पर अलग से टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं लेकिन भारत ट्रम्प के बाद के अमेरिका को भी देख कर चल रहा है। भारत भले विश्व गुरु न बना हो, लेकिन अपनी बुद्धिमत्ता और संयम से एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। पड़ोस में आग लगी हुई है, फिर भी हमारा घर अभी सुरक्षित लग रहा है।यह युद्ध भारत के लिए कसौटी साबित हुआ। हमने दिखाया कि मजबूरियों को समझकर भी उन्हें अवसर में बदला जा सकता है। अपनी फूंक फूंक कर कदम रखने वाली नीति से हम एक स्मार्ट और संतुलित देश के रूप में खड़े हैं। तेल का तूफान थमे या न थमे, भारत का यह संतुलित रुख ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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