
(जय लोक)। टीवी चैनलों की बहसों और रियलिटी शोज में रोने धोने का ड्रामा अब सरकारी सेवाओं में भी पैर पसारने लगा है। उत्तर प्रदेश में अयोध्या से डिप्टी जीएसटी कमिश्नर प्रशांत कुमार ने सरकार के समर्थन में अपनी सरकारी नौकरी से स्तीफा दे दिया है। हिलक हिलक कर आंसू बहाते हुए उनका एक वीडियो वायरल है। संदर्भ व्यक्तिगत परेशानी, जातिगत भेदभाव या नौकरी में पक्षपात का नहीं है। बकौल प्रशांत कुमार यह कदम उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयान के कारण उठाया है। उनका कहना है कि वह इन नेताओं पर अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा लगाए गए आरोपों से बेहद आहत है और इसलिए राज्य सरकार के समर्थन में सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे रहे हैं।
इस्तीफे के बाद प्रशांत कुमार पर उनके सगे बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह ने फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाने का आरोप लगाया है। उनके मुताबिक, प्रशांत कुमार को फर्जी विकलांग सर्टिफिकेट के जरिए सरकारी नौकरी मिली थी। इस संबंध में वर्ष 2021 में दर्ज शिकायत के बाद मंडलीय चिकित्सा परिषद ने प्रशांत सिंह को मेडिकल बोर्ड के सामने जांच के लिए बुलाया, लेकिन वे पेश नहीं हुए। प्रशांत कुमार प्रशासनिक अधिकारी बनने से पहले राजनीतिक पारी भी खेल चुके हैं। वर्ष 2011 में वह अमर सिंह की पार्टी लोकमंच के जिलाध्यक्ष थे। कभी अमर सिंह के करीबी माने जाने वाले प्रशांत कुमार 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट के लिए भी प्रयासरत रहे, हालांकि सफलता नहीं मिली।

इसके पहले यूपी पीसीएस 2019 बैच के अधिकारी और बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री भी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद को ब्राह्मणों के अपमान से जोड़ते हुए नौकरी से इस्तीफा देकर राजनैतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा चुके हैं। यूजीसी की नई गाइडलाइन की तुलना रालेट एक्ट से करते हुए उसे भी अपने इस्तीफे का कारण बताया है। अग्निहोत्री के अनुसार उनका इस्तीफा पद और प्रतिष्ठा से ऊपर स्वधर्म और स्वाभिमान है व्यक्तिगत लाभ या हानि नहीं, बल्कि समाज के प्रति उनकी जवाबदेही और अंतरात्मा की आवाज से प्रेरित है। अग्निहोत्री ने सवर्ण वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था बनाने का राग भी अलापा है। नवीनतम जानकारी के अनुसार अग्निहोत्री को इस इस्तीफा प्रकरण में तत्काल निलंबन रूपी तथाकथित दंड दिया गया है।
सरकारी सेवकों द्वारा राजनीतिक दल या विचार धारा विशेष के प्रति पूर्वाग्रह का मामला नया नहीं है। नागरिक होने के नाते किसी भी व्यक्ति की अपनी राजनीतिक विचारधारा और दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन कार्यपालिका पदाधिकारी के रूप में, उनसे निष्पक्ष रूप से व्यापक देश और जनहित में काम करने की अपेक्षा रहती है। सरकारी सेवा के लिए निर्धारित आचरण नियम हैं जिनके अनुसार राजनीतिक दल और विचारधारा के लिए प्रतिबद्धता वर्जित है। यह मूल्य अब बिखर रहे हैं और नौकरशाही पार्टी और नेता विशेष के लिए खुलेआम प्रतिबद्ध नजर आती है। राजनीतिक दल तो छोडि़ए, नेता विशेष के सत्ताधीन होते ही प्रशासनिक कसावट के नाम पर चहेते अधिकारियों की पोस्टिंग के मामले सबने देखे हैं। नौकरी छोडक़र चुनाव लडऩे के भी कितने ही उदाहरण हैं। ऐसे भी संदर्भ हैं जहां सरकारी सेवक ने नौकरी छोड़ी, चुनाव लड़ा और असफल होने पर पुन: मजे से नौकरी में वापस आ गया। सेवानिवृत्ति के बाद बड़े अफसरों की शीर्ष संवैधानिक और अन्य संस्थाओं में ताजपोशी अब स्वीकृत व्यवस्था है। इनमें वे संस्थान भी शामिल हैं जहां विषय विशेषज्ञ की जरूरत होती है। सरकारी सेवा संविधान और व्यापक जनहित के लिए काम करने के बजाय व्यक्तिगत लाभ पूरे करने का साधन बन गई है। हालांकि हमाम में सारे ही निर्वस्त्र नहीं है। ऐसे सरकारी सेवक भी हैं जिनके लिए अभी भी सेवा के मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत ही सर्वोपरि हैं। मगर अल्पमत में होने का दंश है कि कुछ करने नहीं देता।

बहरहाल सरकार के समर्थन या विरोध में खुले आम सरकारी नौकरी से स्तीफा देने की यह नई बानगियां बताती हैं कि राजनीतिक बेशर्मी नित नए कीर्तिमान रचने पर उतारू है। सरकारी सेवा की मूल भावना के अनुसार नौकरी बिना किसी पूर्वाग्रह के सिर्फ और सिर्फ संविधान के प्रति जवाबदेही और व्यापक जनहित के लिए ही की जानी चाहिए। इसके लिए बाकायदा शपथ भी ली जाती है। यह प्रकरण दर्शाते हैं कि इस भावना और शपथ की हैसियत रद्दी कागज के टुकड़े जितनी ही रह गई है।
निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक होना सरकारी सेवाओं के मूलभूत मूल्यों में से एक है। सरकारी सेवक राजनीतिक रूप से तटस्थ रहने और विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं वाली निर्वाचित सरकारों के प्रति समान प्रतिबद्धता के साथ निष्पक्ष रूप से जनसेवा के लिए बाध्य हैं। दुर्भाग्यवश सरकारी सेवा तटस्थता, व्यावसायिकता और सार्वजनिक सेवा के सिद्धांतों द्वारा संचालित होने के बजाय राजनीतिक विचारों और पक्षपातपूणज़् हितों से प्रभावित और नियंत्रित होने लगी है। सरकारी सेवक के रूप में निष्पक्ष रूप से व्यापक देश और जनहित के लिए काम करने के मूलभूत मापदंड बिखर रहे हैं और जनता जर्नादन बिखराव के इस सर्कस को मूक दर्शक की तरह देखने पर मजबूर है। क्योंकि जो बदलाव ला सकते हैं वह खुद रिंगमास्टर बने हुए हैं।

Author: Jai Lok






