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न्यायपालिका की साख और विश्वसनीयता पर उठ रहे प्रश्न चिन्ह

चैतन्य भट्ट। दिल्ली हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से लगे स्टोररुम में लगी आग बुझाते समय दमकल कर्मियों द्वारा वहां करोड़ों की नकदी मिलने जिसमें बहुत सी आग बुझाते समय जल गईं, की खबर ने देश में आग लगा दी है। मामले की जांच के लिए मुख्य न्यायाधीश माननीय संजीव खन्ना ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ  तीन सदस्यीय आंतरिक जांच शुरू कर दी थी। उनका तबादला भी इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। इस तबादले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने न सिर्फ ‘यह हाईकोर्ट रद्दी की टोकरी नहीं है’ जैसा तल्ख़ बयान दे डाला बल्कि उनके बहिष्कार की अपील भी की। ताज़ा समाचारों तक जस्टिस वर्मा द्वारा किसी भी न्यायालयीन कार्य पर रोक लगा दी गई है।
1992 में बतौर वकील करियर की शुरुआत करने वाले जस्टिस वर्मा तीस साल से भी ज़्यादा समय से क़ानूनी पेशे से जुड़े हुए हैं। 2014 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एडिनशल जज के रूप में जुडऩे के लगभग डेढ़ साल बाद 2016 में उन्होंने स्थायी जज के रूप में शपथ ली। उनके प्रमुख फैसलों में  डॉ. कफील ख़ान को दी गई जमानत, आयकर विभाग द्वारा जारी नोटिस के विरुद्ध कांग्रेस द्वारा दायर याचिका खारिज करने, दिल्ली आबकारी नीति मामले की कथित ग़लत रिपोटिंज़्ग के लिए कुछ न्यूज़ चैनलों से जवाब मांगने जैसे फैसले शामिल हैं। ईडी मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के अलावा किसी दूसरे अपराध की जांच नहीं कर सकती और खुद से यह नहीं मान सकती कि कोई अपराध किया गया है, जैसा साहसिक निर्णय भी उन्होंने दिया जिससे ईडी के अधिकारों संबंधी सीमाओं पर स्पष्टता आई और इसे जाँच शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने की कोशिश के तौर पर देखा गया।
सुप्रीम कोर्ट टीम द्वारा की जा रही जाँच के दौरान खबरों का बाजार गर्म है। सवाल उठ रहे हैं, आखिर आग कैसे लगी? अपने आप लगी या लगाई गई ? दिल्ली फायर ब्रिगेड प्रमुख अपने परस्पर विरोधी बयानों से सवालों के घेरे में हैं। राशि के आंकलन के आधार को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं। जस्टिस यशवंत वर्मा के खुद के बयान वे अपने घर पर मौजूद नहीं थे। घर पर पारिवारिक सदस्य और सुरक्षाकर्मी मौजूद थे। आम तौर पर हर घटना के बाद आग लगने के कारणों का खुलासा करने वाली दिल्ली फायर ब्रिगेड टीम मौन साधे हुए है। इन सब बातों ने मिलकर ऐसा सन्नाटा खींचा है जो शोर से भी ज्यादा भयावह है।
भारतीय न्यायलयीन व्यवस्था की शुचिता और स्वायत्तता को अन्य प्रभावों से बचाने के लिए उच्च और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को संवैधानिक प्रतिरक्षा हासिल है। उनके खिलाफ  कोई प्रक्रिया न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 की धारा 3 के अंतर्गत निर्धारित महाभियोग के तहत ही हो सकती है। महाभियोग के लिए प्रस्ताव कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर के बाद ही संसद में पेश किया जा सकता है। यदि प्रस्ताव राज्य सभा में प्रस्तुत किया जाता है, तो 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसे तीन सदस्यों की समिति को भेजा जाता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (आमतौर पर सीजेआई) हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक ऐसा व्यक्ति शामिल हो जो अध्यक्ष/सभापति की राय में एक प्रतिष्ठित न्यायविद् हो। संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत जांच रिपोर्ट पर चर्चा और मतदान होता है। प्रस्ताव को ‘विशेष बहुमत’ द्वारा पारित किया जाना चाहिए, जिसके लिए प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और प्रत्येक सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत होना अनिवार्य है। न्यायाधीश को संसद के समक्ष अपना पक्ष रखने का उचित अवसर भी दिया जाता है। संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित होने के बाद ही संबंधित न्यायाधीश को आधिकारिक रूप से पद से हटाया जा सकता है। प्रक्रिया बेहद जटिल है और संभवत: इसीलिए स्वतंत्र भारत के इतिहास में, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग केवल 4 बार औपचारिक रूप से शुरू किया गया है या शुरू करने का प्रयास किया गया है। यद्यपि इनमें से कोई भी प्रस्ताव सीधे तौर पर भृष्टाचार के माध्यम से धन अर्जित करने से संबंधित नहीं था।
उच्च और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संवैधानिक व्याख्या को लेकर हमेशा एक निष्पक्ष छवि रही है। मगर हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव का सार्वजनिक बयान कि देश की व्यवस्था बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगी विवाद का कारण बना था। उनका कहना था कि परिवार भी बहुमत के हिसाब से चलता है तो देश इस तरह चलाने में क्या गलत है। ‘कठमुल्ला’ शब्द के प्रयोग को लेकर भी विवाद छिड़ गया था। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस टिप्पणी पर सवाल किया था औऱ कहा कि जज का बर्ताव ऐसा नहीं हो सकता। कॉलेजियम ने जस्टिस शेखर यादव को बुलाकर इस मामले में सफाई भी मांगी थी।
लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ कहीं जाने वाली न्यायायिक व्यवस्था शुचिता का संकट झेल रही है। जस्टिस वर्मा के घर नोट मिलने का मामला राज्यसभा भी पहुंचा जहां सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा कि वह इस मुद्दे पर संरचित चर्चा आयोजित करने के लिए तंत्र ढूंढेंगे। प्रश्न उठे हैं कि अगर ऐसी घटना किसी राजनीतिज्ञ या सरकारी नुमाइंदे के घर हुई होती तो ? कालेजियम सिस्टम नामी न्यायलयीन प्रशासनिक स्वायत्तता की व्यवस्था पर जब तब उंगलियां उठाने वाली ताकतों ने इस दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी को अवसर की तरह लपक लिया है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि माननीय उच्चतम न्यायालय को जस्टिस वर्मा के खिलाफ  एफआईआर दर्ज कराने की याचिका पर विचार करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर मीम्स का बाजार गमज़् है। पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान के लचर और भृष्ट अदालती निजाम पर वहां एक बेहद लोकप्रिय व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया है : वकील क्यों करते हैं जज ही क्यों नहीं कर लेते। हमारी न्यायलयीन व्यवस्था अभी तक तो ऐसी किसी प्रतिक्रिया से अछूती है। जब तक रहे .. तभी तक अच्छा है।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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