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त्यौहारों की रौनक पर भारी पड़ रही लापरवाही

अंधेरा और आवारा पशु ना बन जाएँ हादसे का कारण

जबलपुर (जय लोक)। त्यौहारों का मौसम अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है। शहर की गलियों और बाजारों में रौनक लौट आई है। जगह-जगह भीड़-भाड़ का माहौल है। लेकिन इस भीड़ के बीच आवारा पशुओं का तांडव नागरिकों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। खासकर रात के समय स्थिति विकट हो जाती है, जब सडक़ों पर अंधेरा और खुले गड्ढों के बीच आवारा गाय, बैल, सूअर और श्वानों का आतंक देखने को मिलता है।

सडक़ों पर अंधेरा और मौत के गड्ढे
शहर का कोई भी क्षेत्र हो, गड्ढेदार सडक़ों और बंद स्ट्रीट लाइटों ने दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा दिया है। आगाचौक से लेकर बल्देवबाग, चेरीताल, निवाडग़ंज, गंजीपुरा, बड़ा फुहारा और गोलबाजार जैसे मुख्य मार्गों पर हफ्तों से स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हैं। रात के अंधेरे में जहां वाहन चालक खुले गड्ढों का शिकार हो जाते हैं, वहीं आवारा पशु सडक़ों पर बैठकर जानलेवा हादसों को न्यौता देते हैं।

आवारा पशुओं की धमाचौकड़ी
लटकारी का पड़ाव, बल्देवबाग, गढ़ाफाटक, रानीताल, सब्जी मंडी, मालवीय चौक और शंकर घी भंडार जैसे इलाकों में आवारा पशुओं का जमावड़ा आम नजारा है। दिन में ये पशु झुंड बनाकर दुकानों के सामने बैठ जाते हैं, तो रात में सडक़ के बीचों-बीच डेरा जमाकर दुर्घटनाओं को आमंत्रण देते हैं। कई बार सब्जी मंडी में गाय और बैल दुकानों पर मुंह मारने लगते हैं, जिसके बाद व्यापारी उन्हें खदेड़ते हैं और भगदड़ जैसी स्थिति बन जाती है। वहीं रात में सूकर और श्वानों की भिड़ंत राहगीरों के लिए खतरनाक साबित हो रही है।

त्योहारों में और बढ़ी परेशानी
गणेश चतुर्थी और ईद मीलादुन्नबी चल रहा है, ऐसे समय में आवारा पशुओं का बीच सडक़ पर घूमना या बैठ जाना गंभीर हादसों का कारण बन सकता है। खासतौर पर काले रंग के बैल और सूकर अंधेरे में साफ  दिखाई नहीं पड़ते, जिससे दोपहिया और चारपहिया चालकों के लिए खतरा दोगुना हो जाता है।

डेरी मालिकों और नगर निगम की उदासीनता
शहर में प्रतिबंध के बावजूद डेरी मालिक अभी भी अपने पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं। रात होते ही ये पशु मुख्य मार्गों पर आ जाते हैं। पहले नगर निगम की ‘हांका गैंग’ सक्रिय रहती थी और ऐसे पशुओं को पकडक़र कांजी हाउस या गौशाला में छोड़ा जाता था, साथ ही पशुपालकों का चालान किया जाता था। लेकिन अब पशु कू्ररता अधिनियम के नाम पर नगर निगम की कार्यवाही शिथिल हो चुकी है। नतीजतन, नागरिकों की जान खतरे में है और व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है।

जिम्मेदारों पर उठ रहे सवाल
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि समस्या की जानकारी पार्षदों और अफसरों तक बार-बार पहुंचाई जाती है, लेकिन सब केवल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने का काम कर रहे हैं। न सफाई व्यवस्था सुधर रही है, न स्ट्रीट लाइटें दुरुस्त हो रही हैं, और न ही आवारा पशुओं पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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