
डॉ. नवीन आनंद जोशी
(जयलोक)। रामकथा केवल भक्ति और आस्था का प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन-प्रबंधन, अनुशासन और नेतृत्व का अनुपम शास्त्र है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जब अयोध्या से वनवास के लिए प्रस्थान करते हैं, तब उनके पास न राजवैभव है, न रथ, न सेना, न कोई राजसी ठाठ—सिफऱ् माता-पिता के वचनों की मर्यादा। वे नंगे पाँव, साधारण वस्त्रों में, घनघोर वनों की कठिनाइयों को स्वीकार कर निकल पड़ते हैं। यही त्याग उन्हें ‘पुरुषोत्तम’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित करता है।
श्रृंगवेरपुर, चित्रकूट, दण्डकारण्य, पंचवटी से लेकर किष्किन्धा और समुद्र तट तक प्रभु राम कभी नगरों के राजाओं से सहयोग नहीं माँगते। यहाँ तक कि सुग्रीव को अपना वचन याद दिलाने हेतु भी वे स्वयं नगर नहीं जाते, बल्कि लक्ष्मण को भेजते हैं। यह घटना उनकी मर्यादा, अनुशासन और वचनबद्धता की गहराई को उद्घाटित करती है।

प्रभु राम का दिव्य दृष्टिकोण – संसाधनों से परे
राम जानते थे कि धर्मयुद्ध केवल बाह्य शक्ति या संसाधनों से नहीं जीता जाता। धर्मयुद्ध आत्मबल, साहस और संगठन की अजेय शक्ति से ही संभव है। वे चाहें तो मिथिलापति जनक या भ्राता भरत से सहायता प्राप्त कर सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा न कर, वानरों और भालुओं जैसे वनवासी जनों को संगठित किया। वनवासियों में विश्वास जगाकर, उन्हें प्रशिक्षण देकर उन्होंने ऐसी विराट सेना का निर्माण किया जिसने रावण जैसी समृद्ध और तकनीक-सम्पन्न असुर-संस्कृति को भी परास्त कर दिया। यह केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि नेतृत्व और प्रबंधन की अनुपम गाथा है। यही दिव्य दृष्टिकोण हमें आज भी सिखाता है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प दृढ़ हो तो साधनों की न्यूनता भी सफलता के मार्ग में बाधक नहीं बन सकती।
कोर टीम का अनुशासित संगठन- रामकथा हमें आधुनिक ‘कोर टीम’ की संरचना और उसकी प्रबंधन कला का सजीव उदाहरण देती है। हनुमान -शक्ति, बुद्धि और भक्ति का अद्भुत संगम। उनका योगदान – सीता की खोज, लंका-दहन और युद्ध में वीरता – अतुलनीय है।सुग्रीव -संगठन और सहयोग के प्रतीक, जिनकी निष्ठा ने वानर सेना को दिशा दी।जाम्बवन्त – नीति और प्रेरणा के स्रोत, वृद्ध होने पर भी युद्धनीति में अप्रतिम।अंगद – बालीपुत्र, पराक्रमी और साहस के अवतार।नल-नील – अभियंता वानर, जिनके कौशल ने रामसेतु जैसे अद्भुत निर्माण को संभव किया।सुशेण- वैद्य, जिन्होंने लक्ष्मणजी को जीवनदान देने हेतु संजीवनी का प्रबंध किया।तारा – जिनकी बुद्धिमत्ता ने सुग्रीव को विजयमार्ग पर अग्रसर रखा।विभीषण-जिन्होंने भ्रातृ-संबंध से ऊपर उठकर सत्य और धर्म का साथ चुना और प्रभु राम को रणनीति प्रदान की। यह केवल एक सेना नहीं थी, बल्कि विविधता, सामूहिकता और सहयोग का अनुपम प्रतीक थी। प्रभु राम ने प्रत्येक पात्र की क्षमता पहचानी और उसे उसके योग्य दायित्व सौंपकर सफलता का मार्ग प्रशस्त किया। यही सच्चा नेतृत्व है, यही प्रबंधन का मूलमंत्र है।
विजयदशमी केवल रावण-वध की ऐतिहासिक स्मृति भर नहीं है। रावण कोई एक व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि वह अहंकार, वासना, अन्याय और अनैतिकता का प्रतीक है।
आज भी रावण हमारे चारों ओर अनेक रूपों में विद्यमान है –
अत्याचार और हिंसा,
नारी-असुरक्षा और शोषण,
व्यसन और नशे की लत,
आत्महत्या और अवसाद,
परिवार और रिश्तों का विघटन,
गुरु और मित्रों की उपेक्षा,
लालच, भ्रष्टाचार और अहंकार।
दशहरे का वास्तविक संदेश यही है कि हम केवल बाहरी पुतले न जलाएँ, बल्कि अपने भीतर पल रहे अहंकार, क्रोध, लोभ, आलस्य और असंवेदनशीलता जैसे आंतरिक रावण का दहन करें।
डिजिटल युग की नई पीढ़ी को प्रभु राम से तीन अनमोल जीवन-मंत्र अपनाने चाहिए – संकल्प की स्पष्टता – लक्ष्य चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, यदि दिशा और दृष्टि स्पष्ट हो तो विजय सुनिश्चित है।टीमवर्क और सहयोग – अकेले कोई भी बड़ा कार्य असंभव है। सामूहिक प्रयास ही विजय का मार्ग है। अनुशासन और वचनबद्धता – संसाधनों की कमी बाधा नहीं, बल्कि संकल्पहीनता ही सबसे बड़ी रुकावट है।
दशहरा हमें स्मरण कराता है कि नारी का सम्मान, गुरुजनों का आदर, मित्रों की सहायता और निर्धनों के प्रति स्नेह ही वह आधारशिला है, जिस पर रामराज्य का निर्माण संभव है। इस विजयदशमी पर आइए, हम केवल पुतले न जलाएँ, बल्कि अपने भीतर और समाज में पल रहे हर प्रकार के रावण – अहंकार, हिंसा, भ्रष्टाचार, व्यसन और असंवेदनशीलता – का दहन करें। यही प्रभु राम की सच्ची आराधना और दशहरे का वास्तविक संदेश है।

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Author: Jai Lok







