
कक्षा पाचवीं से शुरू हुआ सफर, मिडिल स्कूल, हाईस्कूल और अब कॉलेज तक पहुँचा
्जबलपुर (जयलोक)। नगर के मराठी भाषियों की प्रमुख शैक्षणिक संस्था महाराष्ट्र शिक्षण मंडल अपनी स्थापना के 100 वें वर्ष में प्रवेश कर शताब्दी वर्ष मना रहा है। महाराष्ट्र शिक्षण मंडल की सौ वर्ष पूर्व हुई स्थापना के समय जबलपुर शहर में प्रारंभ में मराठी माध्यम से पढऩे की सुविधा केवल चौथी कक्षा तक थी। तब मराठी भाषी लोगों ने 14 जनवरी 1926 को एक शिक्षण संस्था की स्थापना महाराष्ट्र शिक्षण मंडल के नाम से की और इस संस्था का उद्देश्य यह बना कि मराठी माध्यम से शहर में उच्च शिक्षा भी दी जाना चाहिए। जब महाराष्ट्र शिक्षण मंडल के पहले चुनाव हुए तब कृष्ण हरि दाते इसके प्रथम अध्यक्ष चुने गए। सीआर राजवाड़े सचिव तथा श्री डिगवेकर कोषाध्यक्ष बने। महाराष्ट्र शिक्षण मंडल द्वारा मराठी शिक्षा को गति देने के प्रयास शुरू हुए और 4 अप्रैल 1926 को चौथी कक्षा तक की शिक्षा का दायरा बढ़ाकर पांचवी कक्षा तक किया गया। स्थानाभाव के कारण इसे तिलक मंदिर श्रीनाथ की तलैया में आरंभ किया गया। सन 1929 तक यहां मिडिल स्कूल की आठवीं कक्षा तक की शिक्षा दी जाने लगी।

1930 में महाराष्ट्र विद्यालय को दान में मिला भूखंड

सन 1930 में श्री गोपाल राव काणे ने गोलबाजार में 103 नंबर का प्लाट श्रीमती लक्ष्मीबाई काणे के नाम से महाराष्ट्र शिक्षण मंडल को दान कर दिया। इस प्लाट पर शिक्षण मंडल ने महाराष्ट्र स्कूल का नया भवन बनाना शुरू किया। इस भवन के निर्माण के लिए चंदा एकत्रित किया गया जिससे 9000 की राशि प्राप्त हुई। श्रीमती मनोरमा बाई गोलवरकर ने भी घर-घर चंदा एकत्रित किया उनके प्रयासों से 1300 रुपए प्राप्त हुए। सन 1934 में महाराष्ट्र विद्यालय की इमारत बनकर खड़ी हो गई।

महाराष्ट्र स्कूल कई जगह घूमता रहा
महाराष्ट्र स्कूल के नए भवन में आने से पहले यह विद्यालय शहर के कई स्थानों जैसे तिलक मंदिर, जैन बोर्डिंग, लाल बंगला, अवस्थी का बंगला और अंत में सक्सेना आईपीएस के बंगले में भी यह शाला लगी जहां बाद में पुराना जीएस कॉलेज भी लगता रहा। महाराष्ट्र शिक्षण मंडल द्वारा महाराष्ट्र विद्यालय के नाम से संचालित स्कूल में एक विज्ञान प्रयोगशाला का भी प्रावधान किया गया। इस विद्यालय से विद्यार्थियों का पहला बैच सन 1936 में मैट्रिक परीक्षा में बैठा।
महाकौशल स्कूल की स्थापना
तभी महाराष्ट्र शिक्षण मंडल ने शहर में हिंदी शिक्षा को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी प्रयास प्रारंभ किए। महाराष्ट्र शिक्षण मंडल ने अपने आप को मराठी भाषा की संकीर्णता से दूर रखा और शहर में 1937 में महाकौशल हाई स्कूल के नाम से गोलबाजार में ही हिंदी माध्यम का एक स्कूल भव्य परिसर में खोला गया।
गोरखपुर में नत्थूमल शाला
महाराष्ट्र शिक्षण मंडल ने 1940 में गोरखपुर में नत्थूमल शाला भी आरंभ की। जिसे महाराष्ट्र विद्यालय की शाखा ही समझा जाता था। परंतु जब उसे विधिवत मान्यता मिल गई तो इस शाला ने अलग विद्यालय का रूप ले लिया। एन जी ओक का महत्वपूर्ण योगदान
महाराष्ट्र शिक्षण मंडल की गतिविधियों को विस्तार देने के लिए श्री एनजी ओक ने कठिन परिश्रम से सर्वाधिक सराहनीय योगदान दिया। उन्होंने साइकिल से घर-घर जाकर चंदा एकत्रित किया। ओक जी वर्षों तक इस विद्यालय के अवैतनिक अध्यापक भी रहे जिससे संस्था पर जो कर्ज हो गया था उसे चुकाया जा सके।
संगीत की कक्षाएं
महाराष्ट्र विद्यालय में सन 1940 में संगीत की कक्षाएं भी प्रारंभ की गईं जिन्हें एस बी देशपांडे चलाते थे। यह कक्षाएं केवल रात्रि में ही लगती थीं। यहां से कई नामवर कलाकारों ने संगीत की शिक्षा ग्रहण की।
दो शिक्षकों ने बना दिया चंचलाबाई कालेज
महाराष्ट्र शिक्षण मंडल के दो शिक्षकों जीएस रानडे तथा गुणवंत राव ताम्हनकर की प्रेरणा से एक महिला महाविद्यालय भी प्रारंभ हुआ। जिसका नाम चंचलाबाई महिला महाविद्यालय रखा गया। जो महाकोशल शिक्षा प्रसार समिति के अधिकार में चला गया।
मंच और सभागृह
महाराष्ट्र समाज के आर्थिक योगदान से महाराष्ट्र स्कूल में सन 1965 में प्रख्यात चिकित्सक डॉक्टर गणपत राव हर्षे के नाम पर हर्षे रंगमंच बनाया गया। महाराष्ट्र समाज द्वारा ही एक सभागृह भी निर्मित कराया गया। सभागृह का नाम विख्यात वकील तथा समाजसेवी श्री मनोहर कृष्ण गोलवलकर के नाम पर रखा गया।
हिंदी बनी शिक्षा का माध्यम
जब प्रदेश में शिक्षा का माध्यम हिंदी हो गया तो महाराष्ट्र विद्यालय में 1973 -74 में हिंदी माध्यम की कक्षाएं भी प्रारंभ की गर्ईं।
डाक्टर जामदार ने कालेज शुरू कराये
महाराष्ट्र शिक्षण मंडल में जब डॉक्टर जितेंद्र जामदार अध्यक्ष बने तब उन्होंने महाराष्ट्र शिक्षण मंडल की ओर से महाकौशल स्कूल में महाविद्यालयीन शिक्षा की शुरुआत कराई। तब अनिल राजुरकर सचिव थे। डाक्टर जामदार के कार्यकाल में आर्ट, कामर्स और बीए, बीकॉम की स्नातक की महाविद्यालयीन शिक्षा की शुरूआत की गई। साथ ही अब महाराष्ट्र शिक्षण मंडल द्वारा एक लॉ कॉलेज भी पिछले वर्ष महाकौशल स्कूल में प्रारंभ किया गया है।
कठिन दौर का सफर
जबलपुर के गौरवशाली शिक्षा संस्थान, ‘महाराष्ट्र शिक्षण मंडल’ के शताब्दी वर्ष के प्रमुख कार्यक्रम प्रारंभ हो रहे हैं। संस्था का यह सौ वर्ष का सफर आसान भी नहीं रहा। राष्ट्रीय विचारधारा से प्रेरित लोगों ने इस शाला की स्थापना की थी। अंग्रेजों के जमाने से इस संस्था की शालाओं में ‘वंदे मातरम’ का नियमित गायन होता था। 1975 में जब आपातकाल लगाया गया था, तब इस संस्था के 11 शिक्षक और संचालकों को मीसा के अंतर्गत बंदी बनाया गया था।ऐसे अनेक अवरोधों को पार करते हुए, ‘महाराष्ट्र शिक्षण मंडल ‘ अपने यशस्वी और उज्ज्वल सौं वे वर्ष मे प्रवेश कर रहा है। इस संस्था ने देश को अनेक नामी-गिरामी, प्रसिद्ध चेहरे दिये हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र की बुलंदियों को छूते हुए, देश-विदेश में सम्मान प्राप्त किया हैं। आज से तीन दिन तक, उन सभी पूर्व छात्र-छात्राओं का समागम जबलपुर मे हो रहा हैं।
आज महाराष्ट्र शिक्षण मंडल द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं में तीन हजार के लगभग छात्र-छात्राएं इससे लाभान्वित हो रहे हैं।
दिनांक 28 दिसंबर को, शताब्दी वर्ष के प्रमुख कार्यक्रम के लिए, अपनी चुनावी व्यस्तताओं के बावजूद, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस विशेष रुप से पधार रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की भी विशेष उपस्थिति भी रहेगी।
महाकौशल विद्यालय के गौरव लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकटकर
महाराष्ट्र शिक्षण मंडल द्वारा संचालित महाकौशल स्कूल को जनरल डीबी शेकटकर ने भी गौरवान्वित किया है। उनकी कठिन पारिवारिक परिस्थितियों में हाई स्कूल की शिक्षा इसी विद्यालय में हुई। जब देश के प्रधानमंत्री नरसिंह राव थे तब जनरल डीबी शेकटकर ने आतंकवाद से ग्रसित कश्मीर को कमांड किया और एक वर्ष के अंदर 1200 आतंकवादियों से आत्म समर्पण कराकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। पूर्वोत्तर में बोडो आंदोलन को भी कुचलने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जब मनोहर परिकर रक्षा मंत्री बने तो उन्होंने सेना के तीनों अंगों में सुधार के लिए अनुशंसा करने के लिए जनरल डीबी शेकटकर कमेटी का गठन किया जिनकी अनुशंसा पर लगातार सेना के तीनों अंगों में सुधार जारी है। सेवानिवृत्ति के बाद जनरल डीबी शेकटकर नासिक के भोंसले सैनिक स्कूल के अध्यक्ष तथा भारत सरकार की सेंट्रल सिक्किम यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं। जनरल डीबी शेकटकर सेना में रहते हुए और सेवानिवृत्ति के बाद भी महाकौशल विद्यालय को भेंट देते रहे। वर्ष 2005 में महाकौशल स्कूल में डॉक्टर हेडगेवार स्मृति मंडल की ओर से अध्यक्ष दीपक मुंजे ने डॉक्टर हेडगेवार स्मृति व्याख्यान माला के अंतर्गत देश की सुरक्षा पर जनरल डीबी शेकटकर का व्याख्यान आयोजित कराया था। इसके पश्चात जनरल डीबी शेकटकर महाकौशल विद्यालय में नए खोले गए महाविद्यालयों का अवलोकन करने भी आए थे। महाविद्यालय के संचालन की गवर्निंग बॉडी में भी वे सदस्य हैं।

शाला से जुड़े साहित्यकार, शिक्षक और पत्रकार
महाराष्ट्र शिक्षण मंडल द्वारा संचालित महाराष्ट्र स्कूल और महाकौशल स्कूल में ऐसे शिक्षकों ने भी सेवाएं दी हैं जो बाद में साहित्य जगत के बहुत बड़े नाम बने। वर्ष 1947-48 में कवि इंद्र बहादुर खरे ने महाराष्ट्र स्कूल में शिक्षण कार्य किया। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में दिवंगत हो गए। शहर और देश के अन्य कई स्कूलों और कॉलेज में अपनी सेवाएं देने के बाद उन्होंने कई काव्य संग्रह और पुस्तकें भी लिखीं। उनकी कविता बड़ी भली है अम्मा मेरी ताजा दूध पिलाती है बाल भारती में पढ़ाई जाने लगी। महाकौशल विद्यालय में शिक्षक रहे जवाहरलाल चौरसिया ‘तरुण’ भी साहित्य जगत के एक बड़े नामवर कवि थे वे संघ की विचारधारा से जुड़े थे। वहीं महाकौशल विद्यालय में शिक्षक शिवकुमार श्रीवास्तव ‘मलय‘ ने भी कुछ समय अपनी सेवाएं महाकौशल विद्यालय में दी वे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय स्तर के चर्चित पदाधिकारियों में शामिल रहे। महाकौशल विद्यालय में शिक्षक रहे दत्तात्रेय कुलकर्णी भी कला जगत का एक बड़ा नाम है। उन्होंने अपने बड़े भाई हेमंत कुलकर्णी के साथ कुलकर्णी बंधु के नाम से हास्य कार्यक्रमों की धूम मचा दी थी। महाकौशल विद्यालय में कुछ पत्रकारों ने भी पढ़ाई की है। इस विद्यालय में पढऩे वाले छात्रों में देश के वरिष्ठ पत्रकार राम शंकर अग्निहोत्री का नाम प्रमुख है जिन्होंने संघ से जुड़े हिंदुस्तान समाचार सेवा का संचालन भी किया। महाकौशल विद्यालय के पूर्व छात्र रविन्द्र बाजपेई आज दैनिक हिंदी एक्सप्रेस का संचालन कर रहे हैं। वहीं मैं सच्चिदानंद शेकटकर भी महाकौशल विद्यालय का छात्र हूं और आज दैनिक जय लोक का प्रधान संपादक हूं। महाकौशल और महाराष्ट्र स्कूल में ऐसे और भी शिक्षक और छात्र रहे हैं जिन्होंने राजनीति ,पत्रकारिता, साहित्य और कला के क्षेत्र में नाम कमाया।
Author: Jai Lok







