
नई दिल्ली। महिला आरक्षण विधेयक को लेकर देश की सियासत में एक नया मोड़ आ गया है। लोकसभा में 230 विपक्षी सांसदों द्वारा इस बिल के खिलाफ वोट किए जाने के कारण यह पारित नहीं हो सका। सदन में बिल गिरने के बाद अब राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिख रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक बड़ा रणनीतिक अवसर बन गया है, जहाँ वह अब सार्वजनिक मंचों पर यह दावा कर सकेगी कि उसने महिला हित में पूरी ईमानदारी से प्रयास किया, लेकिन विपक्ष के अड़ंगे के कारण सफलता नहीं मिली। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष से आग्रह किया था कि श्रेय भले ही वे ले लें, लेकिन महिलाओं के हक के लिए इसे पास होने दें। अब भाजपा हमलावर है और विपक्ष रक्षात्मक मुद्रा में नजर आ रहा है।
मौजूदा समय में महिलाएँ अपने अधिकारों को लेकर काफी जागरूक हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में 15 वर्ष से अधिक उम्र की कामकाजी महिलाओं की संख्या लगभग 20 करोड़ है। यह कुल महिला आबादी का करीब 50-52 प्रतिशत हिस्सा है। इतनी बड़ी संख्या में शिक्षित और कामकाजी महिलाएँ अपने राजनीतिक और सामाजिक हितों को बखूबी समझती हैं। चुनावी गणित को देखें तो 2024 के लोकसभा चुनावों में एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच जीत-हार का अंतर मात्र 1.5 करोड़ वोटों का था। ऐसे में अगर 20 करोड़ कामकाजी महिलाओं में से मात्र 10 प्रतिशत भी विपक्ष के इस रुख से नाराज होती हैं, तो आगामी चुनावों में विपक्ष की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि आम महिला मतदाता परिसीमन जैसे तकनीकी दांव-पेंच नहीं समझती, लेकिन वह यह जरूर जानती है कि आरक्षण मिलने पर 543 सीटों वाली लोकसभा में महिलाओं की संख्या मौजूदा 74 से बढक़र दोगुनी से ज्यादा हो जाती। भाजपा ने इस मुद्दे को गांव-गांव तक पहुंचाने की योजना बना ली है। बिहार जैसे राज्यों में नीतीश कुमार ने जिस तरह महिला वोट बैंक के दम पर अपनी सत्ता बरकरार रखी है, वह साबित करता है कि आधी आबादी की ताकत क्या है। विपक्षी दलों ने शायद इस जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया है। मध्य प्रदेश, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी महिलाओं के लिए चलाई गई योजनाओं ने नतीजों को पलटने का काम किया है। भाजपा ने अल्पमत की स्थिति जानते हुए भी इस बिल को पेश कर एक बड़ा सियासी दांव चला है, जिसमें फिलहाल विपक्ष उलझता नजर आ रहा है।

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Author: Jai Lok








