
(जयलोक)। जबलपुर में एक अतिथि शिक्षक ने अपने स्कूटर पर एक बोर्ड टांगा जिसमें उसने लिखा था ‘कृपया मार्ग अवरुद्ध ना करें हमें ई अटेंडेंस लगानी है’ वास्तव में जब से सरकार ने शिक्षकों शिक्षिकाओं के लिए ‘ई अटेंडेंस’ का लफड़ा शुरू किया है तब से बेचारे शिक्षक और शिक्षिकाएं भारी परेशान हैं, समझ में नहीं आता कि जब नेटवर्क नहीं मिल रहा अटेंडेंस लगाएं तो लगाएं कैसे? मोबाइल तो सबके पास है लेकिन नेटवर्क तो अपने हाथ में है नहीं, जब टावर की मर्जी होगी तो नेटवर्क दे देगा वरना लिए बैठे रहो मोबाइल हाथ में। जैसे ही स्कूल पहुंचते हैं सबसे पहले अटेंडेंस लगाने की चुलबुलाहट शुरू हो जाती है क्योंकि यदि अटेंडेंस नहीं लगी तो तनख्वाह नहीं मिलेगी। तो शुरू करते हैं कवायत अटेंडेंस लगाने की, बार-बार ऐप पर जाते हैं लेकिन नेटवर्क का गोला घूमता ही रहता है। करें तो करें क्या? अटेंडेंस तो लगानी हैं तो कोई स्कूल की बिल्डिंग की छत पर चढ़ जाता है, कोई रोशनदान से लटक जाता है, कोई स्कूल के प्रांगण में लगे पेड़ की सबसे ऊंची डाली पर चढक़र बैठ जाता है, कोई डेस्क के नीचे लेट कर अटेंडेंस लगाने की कोशिश करता है, तो कोई कमरों में लगे पंखों पर चढक़र कोशिश करता है, कोई पालती मार कर नेट पकडऩे का प्रयास करता है, तो कोई भुजंगासन, कोई शीर्षासन, कोई सर्पासन जैसे योग करके मोबाइल को इधर से उधर उधर से इधर करके अटेंडेंस लगाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है लेकिन उसके बावजूद अटेंडेंस नहीं लगती। सुबह से स्कूल लगने के समय से लेकर स्कूल छूटने तक बेचारे शिक्षक शिक्षिकाएं अटेंडेंस लगाने में अपना पूरा वक्त बिता देते हैं बच्चे चिल्लाते रहते हैं कि मैडम जी, सर जी कुछ तो पढ़ा दो लेकिन वे पढ़ाएं कैसे? पढ़ा भी देंगे और अगर अटेंडेंस नहीं लगी तो तनख्वाह नहीं मिलेगी। देखते ही देखते अटेंडेंस तो नहीं लग पाती हैं स्कूल छूटने की घंटी जरूर बज जाती है। सरकार का सोचना है कि इससे अनुशासन बढ़ेगा, अपने को तो ये बात समझ में आज तक नहीं आई कि अगर नेटवर्क मिल भी गया और यह अटेंडेंस लगा भी दी और उसके बाद यदि शिक्षक शिक्षिकाएं गायब हो जाएं तो उन्हें कैसे पकड़ पाओगे। जैसे पहले से चलता आया है वैसे ही चलते रहना देना चाहिए ना, लेकिन ऊपर बैठे अफसरों को तो एक न एक नई नौटंकी करने की आदत है, फरमान जारी कर दिया ई अटेंडेंस लगाना पड़ेगी। अरे भैया पहले देख तो लो कि उधर नेटवर्क आ भी रहा है कि नहीं आ रहा, लेकिन एक बात तो है अटेंडेंस लगे ना लगे इससे शिक्षक शिक्षिकाओं के स्वास्थ्य पर काफी अच्छा असर पड़ा है वरना बैठे-बैठे पढ़ते रहने से शरीर पर जो मोटापा और भारीपन चढ़ रहा था वो इतनी भाग दौड़ में कम जरूर हो रहा है।

खुश कैसे रहें

एक सर्वे सामने आया है जिसमें ये बताया गया है कि सबसे ज्यादा खुशनुमा देश ‘फिनलैंड’ हैं। दूसरी तरफ ‘हैप्पीनेस रैंकिंग’ में अपने देश की रैंकिंग काफी नीचे पहुंच गई है। लोग बाग बोल रहे हैं कि आखिर हम खुश क्यों नहीं है अब उन्हें कौन बताएं कि भैया खुश कैसे हों, महंगाई सर पर चढक़र बोल रही है, ईएमआई का पैसा दे दे के पूरी तनख्वाह निकली जा रही है, सडक़ों पर निकलते हैं तो जाम से हलाकान हो जाते हैं, बच्चे मां-बाप की सुन नहीं रहे, पति-पत्नी में पट नहीं रही, नेताओं अफसरों के पास जनता की समस्याओं को सुनने का वक्त नहीं है, अतिक्रमण के चलते सडक़ पर चलना मुहाल है, देश की राजधानी में इतना प्रदूषण है कि यदि आप मॉर्निंग वॉक पर चले गए तो आपकी ऑक्सीजन कहां पहुंच जाएगी कोई नहीं जानता, रोजगार है नहीं, पीने के पानी में मल मूत्र मिल रहा है, उसके कारण मौतें हो रही है, घर के चिराग बुझ रहे हैं, नदियों का पानी पीने लायक नहीं बचा है, वहीं कपड़े धुल रहे हैं, वहीं भैंसे नहा रही हैं, वहीं से रेत निकाली जा रही है। अब जब चौतरफा परेशानी ही परेशानी हो तो इंसान खुश कैसे रह सकता ये बहुत बड़ा सवाल है।


सरकारी फरमान
उत्तर कोरिया सरकार ने अपने लोगों से कहा है कि चूंकि देश में भारी गर्मी पड़ रही है इसलिए सभी लोग ‘बियर’ का सेवन करें। सरकार का कहना है कि बियर एक शीतल पेय है जो गर्मी का मुकाबला कर सकती है। भारत में भी भारी गर्मी पड़ती है। साल में बारह महीने होते हैं और आठ महीने गर्मी चलती है लेकिन अपनी सरकार ने कभी भी ये निर्देश नहीं दिए कि लोग बाग गर्मी से बचने के लिए बियर का सेवन करें, ये बात अलग है कि सरकार ने कहा हो ना कहा हो लेकिन अपने देश के दारू खोर अपनी गर्मी मिटाने बियर जरूर पीते हैं। लेकिन इन दारुखोरों को एक बात की बड़ी शिकायत है कि बियर बहुत महंगी होती है एक बोतल जो कभी पचास साठ रुपए में आ जाती थी वो अब दो सौ रुपए में आ रही है और यदि किसी बार में बैठ गए तो उसी बियर की कीमत तीन सौ रूपये तक पहुंच जाती है। वैसे भी एक बियर में कुछ होता जाता है नहीं तो कम से कम दो बोतल तो पीना
पड़ जाती है तब जाकर गर्मी से निजात मिलती है। अपनी तो इन दारुखोरों और बियर प्रेमियों को एक सलाह है बियर पीना है तो उत्तर कोरिया चले जाओ वहां सरकार खुद बियर पिला रही है आने जाने भर का पैसा लगेगा लेकिन जब सरकार बियर पीने कह रही है तो बियर सस्ती भी हो कर दी होगी। फायदा ही फायदा है आजमा कर तो देखो।
सुपर हिट ऑफ द वीक
‘पत्नी को बेगम क्यों कहा जाता है’ श्रीमान जी से उनके मित्र ने पूछा
‘क्योंकि शादी के बाद सारे ‘ग़म’ पति के हिस्से में आ जाते हैं और पत्नी ‘बेगम’ हो जाती है, श्रीमान जी का उत्तर था।
Author: Jai Lok





