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कहो तो कह दूँ : वोट से ज्यादा अपने गोरे रंग को बरकरार रखने की चिंता थी उन्हें…

चैतन्य भट्ट
(जय लोक)।  इस बार लोकसभा के चुनाव में वोटिंग परसेंटेज में काफी कमी आ गई जो आंकड़े आए हैं उसमें ये भी पता लगा है कि वोट डालने के लिए  घर से बाहर निकले पुरुषों की संख्या ज्यादा थी और  महिलाओं की संख्या कम  लोगों ने सवाल किया कि महिलाएं वोट डालने क्यों नहीं गई ? अरे भैया देख रहे हो कितनी तेज धूप पड़ रही है भगवान सूरज अपनी पूरी ताकत लगाए पड़े हैं ऐसी भीषण गर्मी में घर के बाहर निकल कर कौन महिला होगी जो चेहरा काला करना चाहेगी, कहते हैं ना सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें अगर चेहरे पर पड़े तो चेहरा काला पड़ जाता है जब पूरी दुनिया में गोरे रंग की तूती बोल रही है ऐसे में कौन सी महिला होगी जो अपने चेहरे को काला करने की सोचेगी , महिलाओं के लिए तो उनकी खूबसूरती ही सबसे बड़ा उनका गुण होता है, हर नौजवान खूबसूरत और गोरी बीवी चाहता है, फिल्मों में अगर जाना चाहे तो चेहरा खूबसूरत होना चाहिए ,टीवी में एंकर बनना है तो सुदर्शन दिखना चाहिए, प्राइवेट बैंक में जाना हो या कंपनी में जॉब करना हो तो वहां भी खूबसूरती को प्राथमिकता दी जाती है, विवाह के जो विज्ञापन आते हैं उसमें भी साफ- साफ लिख दिया जाता है । वर चाहिए गोरी और सुंदर युवती  के लिए, यानी कि गोरा रंग सबसे इंपॉर्टेंट है,गोरे रंग के लिए तो तमाम तरह के प्रयास न केवल महिलाएं बल्कि पुरुष भी कर रहे हैं बड़ी-बड़ी कंपनियां गोरा बनाने के लिए क्रीम भी बाजार में बेच रही है उससे भले ही रंग गोरा हो या ना हो लेकिन उनकी तिजोरी तो भरती जा रही है। कोई हल्दी और शहद चेहरे पर लगाकर रंग गोरा कर रहा है तो कोई मलाई चेहरे पर घिसे पड़ा है  यानी हर तरफ गोरे रंग की माँग बनी हुई है। अब जब सब तरफ गोरे रंग का जलवा हो तो कौन सी महिला है जो इतनी तेज और चिलचिलाती धूप में वोट डालने  लाइन में लगी रहे और फिर क्या है सरकारें तो आती जाती रहती है कभी इसकी तो कभी उसकी होना जाना कुछ है नहीं जैसी जिंदगी चल रही है चलती रहेगी पर जो सरकार में आ जाएगा उसकी चांदी हो जाएगी और जो हार जाएगा उसकी लाई लुट जाएगी । लोगों ने पूछा कि पुरुष लोग तो वोट देने आए थे तो उनका क्या है, उनको तो घर से बाहर रहने का बहाना चाहिए बीवी की चिकचिक से थोड़ी देर तो आराम मिलेगा, इसी बहाने दोस्तों से भी मिल आयेंगे ,किसी पान के टपरे  या चाय के ठेले पर खड़े होकर राजनीति की चर्चा भी कर लेंगे चाय का प्याला भी डकार लेंगे और एक ‘राजश्री या विमल’ का गुटका भी सूट लेंगे। उनको तो फायदा ही फायदा है इसलिए उनकी संख्या ज्यादा हो गई अपने हिसाब से अपन ने इन आंकड़ों  का पूरा जस्टिफिकेशन कर दिया अब आप मानो या ना मानो लेकिन अपना ये भी कहना है वोट ना डालने वाली महिलाओं से ‘गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा’
अंतरात्मा की आवाज
आजकल राजनीति में जो भी  नेता सक्रिय हंै वो अपने अंतरात्मा की आवाज पर  अपना ध्यान कंसंट्रेट कर रहे हैं उनके कान पूरी तरह से अंतरात्मा की आवाज सुनने के लिए लगे रहते हैं कि पता नहीं अंतरात्मा उन्हें कब इस दल से उस दल  में जाने की सलाह दे दे और न जाने कब उस दल से फिर इस दल में आने के लिए आवाज बुलंद कर दे। अब देखो ना छिंदवाड़ा के महापौर विक्रम आहके  15 दिन पहले अपने अंतरात्मा की आवाज को सुनकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे लेकिन अचानक फिर उनकी अंतरात्मा ने उन्हें आवाज दी और कहा कि नहीं ये तुमने बहुत गलत कर दिया है तुम वापस कमलनाथ खेमे में वापस आ जाओ और भाई साहब रातों-रात भाजपा के प्रत्याशी को जिताने की बजाय नकुलनाथ को जिताने की अपील करने लगे, वोटर भी भारी परेशान हो गए कि  भाई साहेब ने तो भगवा दुपट्टा ओढ़ लिया था  इन्हें तो साहू जी की वकालत करनी चाहिए लेकिन ये नकुलनाथ को जिताने की बात कर रहे हैं लोगों ने पूछा कि भैया यह अचानक आपको क्या हो गया तो भाई साहब ने साफ उत्तर दे दिया कि मेरी अंतरात्मा ने मुझे आवाज दी कि बेटा तू जहां था वही अच्छा था वही चला जा जिन्होंने तुझे कहां से कहां पहुँचा दिया। अपने को लगता है आजकल अंतरात्मा भी राजनीति में रह रहकर दल बदलू हो गई है कभी इस दल में जाने के लिए कहती है तो कभी उस दल में जाने  के लिए प्रेरित करती है अब चूंकि नेताओं के लिए अंतरात्मा सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट हो गई है इसलिए उसकी बात  मानना भी पड़ती है और उस चक्कर में उसे सुबह किसी की तारीफ में कसीदे पढऩे पड़ते  हैं तो शाम को उसको पानी पी पी कर कोसना पड़ता है या फिर सुबह जिसको पानी पी पीकर कोसा जाता है शाम को उसकी तारीफ कैसे पुल बांधने पड़ते हैं कि वो खुद शर्मा जाए जिसकी तारीफ ये कर रहे हैं ।  जब पत्रकार उनसे सवाल पूछते हैं कि आप ये ‘आया राम गया राम’ की स्थिति में क्यों हो तो वे एक ही उत्तर देते हैं हम क्या करें हम तो अंतरात्मा के अंडर में है जो अंतरात्मा कहती है वही हम करते हैं हमारा इसमें कोई दोष नहीं है ।
जेल जाते ही बीमार
बाकी पूरे टाइम अच्छे भले स्वस्थ नेता या अफसर जैसे ही किसी मामले में जेल पहुँचते हैं अचानक से वे बीमार पड़ जाते हैं। किसी का ‘ब्लड प्रेशर’ हाई हो जाता है तो किसी की ‘शुगर’ एकदम से 300 के पार चली जाती है किसी को सांस में तकलीफ होने लगती है तो किसी का बुखार 105 के आसपास पहुँच जाता है। आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल की ही बात सुन लो, बेहतरीन सरकार चला रहे थे ना कोई तकलीफ थी ना कोई बीमारी  लेकिन जैसे ही ईडीने    उन्हें जेल भेजा उनकी तमाम बीमारियां बाहर निकाल कर आ गई  वैसे तो उनकी शुगर ठीक-ठाक थी लेकिन वे आम चूस चूस कर कर शुगर को बढ़ाए पड़े हैं ताकि उन्हें जमानत मिल जाए। इधर राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर सुनील कुमार भी जैसे ही करोड़ों की घपले बाजी के आरोप में जेल पहुंचे तुरंत अपने वकीलों की फौज लेकर अदालत के सामने गिड़गिड़ाने लगे कि  मैं बीमार हूं दरअसल जेल है ही ऐसी जगह कि जो ऐश और आराम की जिंदगी जीते हैं उन्हें जब जेल की कोठरी में पहुंचना पड़ता है तो स्वाभाविक रूप से उनके शरीर के तमाम अंग काम करना बंद कर देतेफिर बीमारी तो आनी है  इधर कोर्ट भी बीमारी के आधार पर जमानत दे देता है और बस इसलिए वे बीमार बन जाते हैं लेकिन भैया जब तक अच्छी जिंदगी जी रहे हो तो काहे को ये गोल गपाड़ा करते थे कहते हैं पाप  सिर पर चढक़र बोलता है और जब पाप सर पर चढक़र बोलता है तो फिर एसी बेडरूम, बड़ा एसी  आफिस,बड़े-बड़े बंगलो को छोडक़र एक छोटी सी कोठरी में जाना ही पड़ जाता है जहां ना एसी होता है ना पंखा न मिलने वालों की संख्या, बहुत ज्यादा वीआईपी हुए तो एक पलंग मिल जाता है मुंडी हिलाने वाला पंखा भी । अपना तो यही कहना है कि हुजूर जितना भगवान ने दिया है उसी में अपनी जिंदगी बिता लो ज्यादा के चक्कर में कैसी लाई लुटती है है ये तो आप देख ही रहे होंगे ।
सुपरहिट ऑफ  द वीक
‘कुछ सुना तुमने अपने इलाके के विधायक जी ‘कोमा’ में चले गए हैं श्रीमान जी ने श्रीमती जी को खबर देते हुए कहा ।
‘इसमें कौन सी बड़ी बात है पैसे वाले लोग हैं, नेता हैं, सरकार भी उनकी है वे कहीं भी जा सकते हैं श्रीमती जी ने भोलेपन से उत्तर दिया।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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