
नीतीश और नायडू को लेकर जोखिम उठाने और पटनायक को पटकनी देने की भाजपा
की नीति कामयाब रही
सच्चिदानंद शेकटकर , समूह संपादक
जबलपुर (जयलोक)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी बार सरकार बड़ी ही विषम परिस्थितियों में इस बार बन रही है। यह पहला मौका है जब प्रधानमंत्री को अब पूरी तरह से गठबंधन की सरकार चलाना पड़ेगी। भारतीय जनता पार्टी ने समय के अनुसार अपनी नीतियों को भी बदला है। अटल-आडवाणी के युग में एक दौर वह था जब भाजपा चाल, चेहरा और चरित्र की बात करती थी। एक वोट से अटल जी की सरकार को गिर जाना मंजूर था लेकिन झुकना मंजूर नहीं था। लेकिन पिछले 10 वर्ष पूर्व से भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने जब से संभाला है तब से भाजपा के लिए इस जोड़ी ने चाल, चेहरा, चरित्र की जगह साम, दाम, दंड भेद की नीति को अपनाना जरूरी समझा है। इस नीति का महाराष्ट्र सबसे बड़ा सबूत है जहां भाजपा ने शिवसेना और शरद पवार की पार्टी को दो फाड़ कर दिया। इस जोड़ी का एक ही ध्येय है कि अब भाजपा भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता की राजनीति करेगी और कांग्रेस की तरह देश पर 50 वर्षों तक भाजपा राज करेगी, इसीलिए तो नरेन्द्र मोदी आने वाले 2047 तक के लिए देश के विकास की योजना बना रहे हैं। मोदी शाह की इस जोड़ी का ही कमाल है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2014 और 2019 में पहली बार केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी। 2024 के इस बार के चुनाव में भी भाजपा को 241 सीटों पर जितवाकर सबसे बड़ी पार्टी बनाकर रखा और इस बार गठबंधन की सरकार बनाकर तीसरी बार भी सत्ता में आ रहे हैं। मोदी शाह की 10 वर्षों की मेहनत का ही यह नतीजा है कि भाजपा देश के सभी राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुकी है और भाजपा सिर्फ हिंदी पट्टी की पार्टी नहीं रह गई है। दक्षिण राज्यों में भी भाजपा ने अपनी सरकार बनाई है और बड़ी संख्या में सांसद भी जीते हैं। सत्ता के लिए अब भाजपा किसी भी स्तर पर जा सकती है और वह सत्ता के लिए किसी से भी समझौता कर सकती है यह इस बार नीतीश कुमार और चंद्राबाबू नायडू के साथ हुए गठबंधन से साबित भी हो चुका है। भाारतीय जनता पार्टी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा आंध्र के तेलुगु देशम के मुखिया चंद्रबाबू नायडू के बीच सास बहू की तरह संबंध हैं। भाजपा की भूमिका जहां सांस की है वही नीतीश कुमार और नायडू बहू की भूमिका में नजर आते हैं। जिस तरह सास बहू में झंझट होती है तो कभी बहु नाराज होकर घर छोड़ कर चली जाती है और नाराजगी दूर होने पर घर वापस आ जाती है। ऐसा ही नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू साबित भी करते आ रहे हैं। नीतीश कुमार बिहार में न जाने कितनी बार भाजपा के साथ आए और भाजपा को छोड़ भी चुके। पिछले बार उन्होंने जब भाजपा को छोड़ा तो यह कसम खा ली थी कि वह मर भी जाएंगे लेकिन भाजपा में नहीं जाएंगे लेकिन वहीं सांस की तरह नाराज भाजपा ने भी यह तय कर लिया था कि अब नीतीश कुमार जैसी बहू के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। लेकिन नाराज बहू बने नीतीश कुमार फिर भाजपा के साथ आ गए और मंच से ही मोदी को कहा कि अब मैं आपके ही साथ रहूँगा और आपको कभी नहीं छोडूंगा और भाजपा ने भी नीतीश को गले लगा लिया। वहीं चंद्राबाबू नायडू भी कई बार भाजपा के साथ आए और भाजपा का साथ छोडक़र चले गए। लेकिन इस बार भाजपा के रणनीतिकार गृहमंत्री अमित शाह ने चंद्रबाबू नायडू को गले लगाने की रणनीति खुद बनाई। आंध्र में विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा को चंद्रबाबू नायडू को अपने गले लगाना फायदेमंद साबित हुआ है। भाजपा के रणनीतिकार मोदी और शाह को इस बात का बखूबी अंदाजा रहा की इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा के हाल ठीक-ठाक नहीं रहने वाले हैं इसी को ध्यान में रखकर नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को भाजपा ने अपने पाले में लाकर यूपी में हुए नुकसान की भरपाई भी कर ली।

भाजपा ने पटनायक को भी नहीं बक्शा
सबसे आश्चर्यजनक तो उड़ीसा में 25 वर्ष से अपनी सरकार चला रहे बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक को लेकर मोदी शाह की जोड़ी ने इस बार जो नीति बनाई उसने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया है। नवीन पटनायक पिछले 25 वर्षों से उड़ीसा में अपनी सरकार चला रहे थे। वहीं केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद नवीन पटनायक भाजपा के सहयोगी भी रहे हैं लेकिन इस बार मोदी और शाह ने नवीन पटनायक को विधानसभा के चुनाव और लोकसभा के चुनाव में पटकनी देने की रणनीति बना ली। भारतीय जनता पार्टी के फायदे के लिए नवीन पटनायक के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया गया और विधानसभा का चुनाव भाजपा इस बार पूरी ताकत से लड़ी। मोदी उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को बीमार साबित करते रहे। मोदी ने यहां तक कह दिया कि उड़ीसा में भाजपा की सरकार बनने पर नवीन पटनायक की बीमारी की जाँच भी कराई जाएगी। आज भाजपा उड़ीसा में अपनी सरकार बनाने जा रही है। वहीं लोकसभा के चुनाव में नवीन पटनायक की पार्टी का पूरी तरह से सफाई भी हो गया है और यह पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई है। निश्चित थी पटनायक से पंगा लेने की नीति भाजपा को के लिए फायदेमंद साबित हुई है।

Author: Jai Lok







