
अब तक आप रानी दुर्गावती, विलियम हेनरी स्लीमन, कामकंदला-माधवानल, नाटककार राजशेखर , शहीद राजा शंकरशाह -रघुनाथशाह, पाटन की वीरांगना सरस्वती बाई, माखनलाल चतुर्वेदी, बाबू कंछेदीलाल जैन, प्रेमचंद जैन उस्ताद, सीताराम जाधव, थानेदार नौरोज़ अली, गाड़ाघाट के गजराज सिंह और जवाहर सिंह, सिलौंड़ी की श्रीमती सुंदरबाई गौतम, पाटन के बद्रीप्रसाद पाठक, सुभद्राकुमारी चौहान, सूरजप्रसाद शर्मा, बालमुकुंद त्रिपाठी, हन्नू पहलवान, सेठ गोविंददास, द्वारका प्रसाद मिश्र, ब्योहार राजेंद्र सिंह, त्रिलोक सिंह, भवानी प्रसाद तिवारी, राजकुमार सुमित्र, रामानुजलाल श्रीवास्तव उफऱ् ऊँट बिलहरीवी, शशिन यादव, रामेश्वर गुरु, महेंद्र बाजपेई, मायाराम सुरजन, चंद्रभान राय, मलय जी, कुंज बिहारी पाठक, डॉ आर के शर्मा , ज्ञानरंजन, गणेश प्रसाद नायक, केके अग्रवाल, वसंत काशीकर और रमेश सैनी के बारे में पढ़ चुके है।
– संपादक जयलोक

शिक्षा के लिए दान कराने समर्पित-अनुराग जैन
(जयलोक)। वह सन् 2008 का वक़्त था। अनुराग अपने मिलनसार स्वभाव के चलते घर-घर जाकर अपने परिचितों और दोस्तों से मिल रहे थे। वे एक ऐसे घर गए, जिसके स्वामी पहले कभी संपन्न थे, पर समय ने उन्हें विपन्नावस्था में पहुँचा दिया था। उनका रहन-सहन ही उनकी दशा का बयान कर रहा था। बातचीत से पता चला कि उनका बेटा बारहवीं उत्तीर्ण करके कॉलेज इसलिए नहीं जा पा रहा था, क्योंकि एडमीशन कराने के लिए बाईस हजार रुपयों जैसी बड़ी रकम की उपलब्धता नामुमकिन थी।
अनुराग के हृदय में करुणा और मानस में चिंता उमडऩे-घुमडऩे लगी। क्या किया जाये कि होनहार बच्चा अपनी पढ़ाई कर सके और उस घर के पुराने दिनों को लौटा कर ला सके। उन्होंने अपने मित्रों नवनीत जैन, नितिन जैन और संतोष अग्रवाल से बात की। वे भी द्रवित हुए और सहयोगी भावना से साथ हो गए।
बात एक परिवार भर की न थी, ऐसे सैकड़ों-हजारों परिवार थे, जिन्हें मदद की ज़रूरत थी। दिनेश भाई ने सुझाया कि शिक्षा के क्षेत्र में सहयोगी भावना से काम करना चाहिए। इस पर सहमति बनी और संस्था का नामाकरण हुआ, ‘छात्र-मित्र संस्था।’ 11 मित्र साथ हो लिए, अनुराग जैन गढ़वाल, संतोष अग्रवाल, नवनीत जैन, नितिन जैन, सुनील ठाकुर, सुबोध जैन स्मृति, रमेश दाऊ, राकेश जैन, आलोक सिंघई, अनुपमा जैन और पद्माकर तलवारे।
इस समूह ने तय किया कि अपने घरों के बच्चों के जन्म दिन पर शुभकामना कार्डस् बनाए जाएं और उस पर एक टैग लाइन डाली जाए, ‘निर्धन बच्चों की सहायता करें।’ यह भी तय किया गया कि ये 11 नौजवान, अपने-अपने 11-11 मित्रों, परिचितों और रिश्तेदारों से संपर्क करें और जन्म दिवस कार्डस् का दायरा बढ़ाएं। सुबोध जैन स्मृति ने कार्ड डिजायन किया। नवनीत जैन ने सूची तैयार की। आने वाली राशि का हिसाब-किताब रखने का जिम्मा सम्हाला।
जब कार्ड घरों में गए और लोगों ने उस पर टेग लाइन को देखा, तो पूछताछ की। उन्हें बताया गया। वे भी उत्प्रेरित हुए और संग हो लिए। सहयोग राशि की कोई सीमा निश्चित नहीं की गई। जिसको जितनी देना हो, उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकारने की नीति अपनायी गई। 20 से 25 हजार रुपया जमा हुआ। इससे ज़रूरतमंद स्कूली बच्चों के लिए एक और दो हजार रुपयों की छात्रवृत्ति देना आरंभ किया गया । इसके अलावा, चूंकि ज्सादातर साथी व्यवयायी क्षेत्र से थे और उनके कर्मचारीगण थे, तो उनके बच्चों के लिए प्रतिभा सम्मान कार्यक्रम रखे गए और सहायता भी उपलब्ध कराई।
‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’ की तजऱ् पर सहयोग की यह लहर भी फैल चली। ज़रूरतमंद लोग संपर्क करने लगे। किसी को कॉपी-किताबें तो किसी को बैग या यूनीफार्म और किसी को फीस चुकाने के लिए धन की आवश्यकता थी।
इस समूह ने 2000 नग रजिस्टर छपवाए। प्रभात विशाल की पेपर इंडस्ट्री है, तो उन्होंने लागत से आधी कीमत पर रजिस्टर उपलब्ध करा दिए। प्रभात जैन का सोलार प्रिंटिंग नामक उपक्रम है, तो उन्होंने नि:शुल्क छपाई करा दी। रजिस्टर संख्या व्यवसायिक तौर पर छपाए जाने की दृष्टि से कम थी, इसलिए मंहगी पड़ रही थी। तब अनुराग के पिता स्मृति शेष नरेश चंद गढ़वाल जी ने लडक़ों के इस भले काम से प्रसन्न होकर अपनी तरफ से 5 हजार रुपयों की मदद की। रजिस्टरों के पिछले कवर पेज पर दानदाताओं के नाम छापे गए। उन्हें पढक़र और लोग प्रेरित हुए और संस्था से जुड़े। सरकारी स्कूलों में जाकर उनके प्रधानों से मुलाक़ात की। बच्चों की ज़रूरतों को जाना-समझा और उन्हीं के माध्यम से सहयोग कलाप को संपन्न किया जाने लगा। स्कूलों में भी अपार कमियाँ थीं। कहीं टाट-पट्टी तक न थी, तो कहीं खपरैल छत गिरने को उतावली हो रही थी। कहीं पीने के पानी की टंकी न थी, तो कहीं अपर्याप्त कमरे थे। कहीं कम्पयूटर, आलमारी और पानी की टंकी नहीं थी। अनुराग और उनके दोस्तों ने प्रधान से कहा कि इसी समय आप एस्टीमेट बनाईये, कारीगर बुलाईये और हमसे राशि लीजिए। यही किया गया और स्कूलों तथा बच्चों के हालात बदले। टाट-पट्टी मुक्ति स्कूल अभियान चलाया गया और अब तक 20 से भी ज्यादा सरकारी स्कूलों को डेस्क-बेंच उपलब्ध कराए गए। दीक्षितपुरा और तमरहाई के सरकारी स्कूलों में आलीशान फर्नीचर हुआ। एक स्कूल में पुराने और टूटे-फूटे फर्नीचर की मरम्मत करवा कर नया फर्नीचर तैयार करवाया गया! चीजें मंहगी हैं। एक स्कूल के लिए अगर टाट-पट्टी मुहैया कराना हो तो 70-80 हजार का ओर फर्नीचर देना हो तो डेढ़ लाख रुपयों का खर्च आता है।
कोविड-काल में इसी संस्था ने आठ-दस लाख रुपयों को जमाकर राशन खरीदा और उनके पैकेट बनवाकर ज़रूरतमंदों के घरों पर जाकर उपलब्ध कराए। महिलाओं को सिलाई के काम के लिए मषीनें दी गईं और चालीस-पचास स्त्रियों की आजीविका का साधन हुआ।
अनुराग भाई ने बताया कि वे और उनके साथी पहले से कोई रकम आपस में नहीं मांगते। जो काम सामने आता है, उस पर लगने वाले खर्च के अनुसार आपस में रकम जमा करते हैं। उनका व्हाट्सएप् समूह है। उस पर सूचना प्रसारित कर दी जाती है। सूचना मात्र से ही साथी अपनी भूमिका अदा करने के लिए आगे आ जाते हैं। दानदाताओं से भी उसी अनुपात में राशि लेते हैं।
एक हैं सुमित यादव, वे शनिवार -रविवार को अपना अनौपचारिक स्कूल चलाते हैं। बच्चे वहाँ अतिरिक्त रूप से पढऩे जाते हैं। संस्था ने उस स्कूल को पानी की बोतलें, कॉपियाँ-पुस्तकें वगैरह प्रदान की हैं। हाल ही में जैन समुदाय की दो दूकानें आग लगने से जल गई थीं। दोनों पीडि़तों को 12-12 लाख रुपए की सहायता दी गई।
अनुराग अनेक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं, जैसे महावीर चिल्ड्रन अकादमी, जैन पुत्री शाला , अ भा दिगम्बर जैन प्रशिक्षण संस्थान, रोटरी क्लब साउथ आदि। ये संस्थाएं भी सहयोग करती हैं। रूपेंद्र पटेल और बबुआ शुक्ल जैसे सक्षम मित्रों ने भी सहायता दी है। जिन स्कूलों की मदद की जाती है, वहाँ के अध्यापक और प्रधानाचार्य भी अपना योगदान करने में पीछे नहीं रहते। चंद्रकला मोदी नाम की एक अध्यापिका तो ऐसी हैं कि जब तक सेवा में रहीं, हर बार 1000-1500 रुपये प्रदान करती थीं,और जब सेवानिवृत् हुईं तो उन्होंने करीब दो लाख रुपये लगाकर त्रिमूर्ति नगर, चंडाल भाटा स्कूल को फर्नीचर उपलब्ध कराया।
धन्य हैं अनुराग भाई और उनके मित्र गण। उन सबको प्रणाम!
जबलपुर प्रणाम!!
प्रणाम जबलपुर

Author: Jai Lok







