
@सच्चिदानंद शेकटकर
समूह संपादक
ज्योतिषपीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती का आज 55वां प्रकटोत्सव है। यह एक सुखद संयोग है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ज्योतिषपीठ के 55वें शंकराचार्य हैं और आज उनका 55वाँ प्रकटोत्सव भी है। ज्योतिषपीठ एवं द्वारका शारदापीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनकी वसीयत के अनुसार स्वामी सदानंद जी सरस्वती को द्वारकापीठ का एवं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बनाया गया है। स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य बने तब उन्हें विरासत में संघर्ष ही मिला। स्वामी स्वरूपानंद जी के पूर्व स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य रहे और उनसे स्वामी शांतानंद जी ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद के लिए संघर्षरत रहे। ब्रह्मलीन स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के स्थान पर जब स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती शंकराचार्य बने तब उन्हें शंकराचार्य पद के लिए स्वामी शांतानंद जी द्वारा ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के लिए जारी न्यायालयीन विवाद विरासत में मिले। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती अपने पूरे जीवन भर संघर्ष करते रहे। पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती की सेवा में 50 वर्ष से ज्यादा समय तक अग्रज अजित वर्मा जी के साथ मुझे भी गुरु सेवा कार्य करने का सौभाग्य मिला। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के संघर्षों को लेकर तो अग्रज अजित वर्मा जी ने सानिध्य की अर्धशति के नाम से पुस्तक तक लिख डाली। स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के कुछ वर्षों पूर्व ही सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें ही ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित किया था।
स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में विरासत में सिवाय संघर्ष के कुछ भी नहीं मिला यहां तक की पुराना मठ भी नहीं मिला। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने बद्रीनाथ धाम में सभी नये निर्माण कार्य खुद ही कराये। निर्माण कार्य फिर तो देशभर में चलते रहे। स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने ज्योतिषपीठ की संघर्ष भरी शंकराचार्य परंपरा को ध्यान में रखकर ही अपने एक संघर्षशील शिष्य दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती को अपनी वसीयत में ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य नामित किया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य बने और श्रृंगेरी के जगतगुरु शंकराचार्य जी ने उनका अभिषेक किया तभी से उनके शंकराचार्य बनने को लेकर विवाद शुरू कर दिए गए। यहाँ तक की पुरी के शंकराचार्य ने भी उनका विरोध किया वही कुछ और लोग भी उनके शंकराचार्य बने का विरोध करने लगे। लेकिन शंकराचार्य बनते ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी विरोधों की परवाह किए बिना अपने शंकराचार्य पद के दायित्व का पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निर्वहन कर रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंदजी सरस्वती शंकराचार्य बनने के पूर्व से ही सनातन धर्म की रक्षा के कार्यों के लिए संघर्ष करने में पीछे नहीं रहे। इतना ही नहीं इस कार्य के लिए उन्होंने पुलिस की लाठियाँ भी खाई हैं। काशी में गंगा जी में गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने संघर्ष किया डटकर विरोध भी किया और पुलिस के जुल्म भी सहे। जब काशी विश्वनाथ का नया मंदिर परिसर बनने की योजना शुरू हुई तब बड़े स्तर पर इस नए निर्माण के लिए बाधक बन रहे धार्मिक स्थलों को तोड़े जाने का भी उन्होंने सडक़ पर उतरकर विरोध किया।
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कानूनी लड़ाई लड़ी। सर्वोच्च न्यायालय ने शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के तर्कों से सहमत होते हुए ही अयोध्या में राम जन्मभूमि के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया था। सर्वोच्च न्यायालय में शंकराचार्य जी की ओर से राम जन्मभूमि को लेकर सभी तरह के प्रमाण जुटाने का काम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने ही किया और इस मामले में उनकी महत्वपूर्ण गवाहियाँ भी हुईं और सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हीं सब आधारों पर अयोध्या में राम जन्मभूमि को लेकर अपना फैसला भी सुनाया। पूर्व में एक बार राम जन्मभूमि से दूर हटकर मंदिर निर्माण का शिलान्यास किये जाने पर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने जमकर विरोध किया था। अब जब अयोध्या में अधूरे बने राम मंदिर के लोकार्पण के कार्यक्रम का निर्धारण हुआ तब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने भी अपने गुरु की तरह ही बिना शिखर के आधे अधूरे राम मंदिर के निर्माण का लोकार्पण करने का विरोध किया। इस तरह का विरोध करने वाले वे अकेले शंकराचार्य रहे। सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज और शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती द्वारा गौ रक्षा के लिए जो अभियान प्रारंभ किए गए उन अभियानों को शंकराचार्य बनने के पश्चात स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने जारी रखा है और वह गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इसके लिए उन्होंने दिल्ली तक तपती धूप में पदयात्रा भी की है।
सनातन धर्म की शिक्षा के लिए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी शंकराचार्य गुरुकुल की स्थापना की योजना भी शुरू कर चुके हैं ऐसे और भी कार्य हैं जो उनके द्वारा कराई जा रहे हैं। गौ सेवा के लिए समर्पित शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती का जन्मदिन आज गौ प्रतिष्ठा दिवस के रूप में देश की राजधानी दिल्ली के ताल कटोरा मैदान में मनाया जा रहा है। शंकराचार्य जी के आज पावन जन्म दिवस के अवसर पर उनके चरणों में सादर प्रणाम।

Author: Jai Lok







