Download Our App

Home » Uncategorized » मित्रसंघ के संस्थापक अजित वर्मा जी ने 1971 से शुरू किया था समाधि पर बलिदान दिवस का आयोजन: जबलपुर से शुरू हुए दुर्गावती की स्मृति रक्षा के प्रयास

मित्रसंघ के संस्थापक अजित वर्मा जी ने 1971 से शुरू किया था समाधि पर बलिदान दिवस का आयोजन: जबलपुर से शुरू हुए दुर्गावती की स्मृति रक्षा के प्रयास

@सच्चिदानंद शेकटकर, अध्यक्ष मित्र संघ      
दैनिक (जयलोक)।  मातृभूमि की रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान करके, अपने लहू से इतिहास के पृष्ठों पर शौर्य और वीरता की प्रेरक और रोमांचक गाथा अंकित करने वालों में वीरांगना रानी दुर्गावती का प्रसंग अद्वितीय और अप्रतिम है। 16 वीं शताब्दी में गोंडवाना और गढ़ा मंडला की महारानी दुर्गावती ने मुगल सम्राट अकबर की आक्रांता सेना से अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ लोहा लिया और जबलपुर के निकट बारहा ग्राम में नरर्ई पहाड़ी नदी के पहले स्थित मैदान में युद्ध में 24 जून 1564 को वीरगति पाई।

वर्तमान जबलपुर 16वीं शताब्दी में गढ़ा मंडला राज्य का अंग था। 400 वर्ष के प्रत्यक्ष अस्तित्व वाले गढ़ा मंडला राज्य के विषय में इतिहास में अधिक कुछ वर्णित नहीं है। जबकि यह एक तथ्य है कि 16 वीं शताब्दी में विशाल भारत भूमि में गढ़ा मंडला राज्य के विषय में अधिक कुछ वर्णित नहीं किया गया?।  16 वीं शताब्दी में विशाल भारत भूमि में गढ़ा मंडला के राज्य का हिस्सा छोटा नहीं था उसका गौरव कम नहीं था। गढ़ा मंडला की महारानी वीरांगना दुर्गावती का बलिदान किसी भी प्रकार कम लोमहर्षक नहीं था। पर इतिहास में ना तो गढ़ा मंडला के  गोंड राजाओं को समुचित स्थान मिला ना ही वीरांगना दुर्गावती के बलिदान को। गढ़ा मंडला और वीरांगना दुर्गावती को इतिहास के पृष्ठों में स्थापित करने के जो प्रयास हुए यह प्रयास भी प्रमुख रूप से आजादी के बाद जबलपुर में ही किए हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान 6 अप्रैल 1930 को जबलपुर में सेठ गोविंद दास तथा पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का एक विशाल जुलूस शहर से तेरह मील की दूरी पर स्थित वीरांगना दुर्गावती की समाधि की ओर शहर से प्रस्थित हुआ। फिर समाधि पर पहुंचकर सेनानियों ने यह प्रतिज्ञा की कि स्वाधीनता के लिए हम अपने प्राणों की बलि भी चढ़ा देंगे। यह पहला जुलुस था जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की ऐतिहासिक घटना बन गया।
वीरांगना दुर्गावती की स्मृति रक्षा के प्रयासों की शुरुआत  
वीरांगना दुर्गावती की स्मृति रक्षा के प्रयासों की शुरुआत नगर निगम जबलपुर ने की थी। 24 एवं 25 जून 1964 को नगर निगम द्वारा वीरांगना दुर्गावती के 400 वें बलिदान दिवस के अवसर पर वीरांगना रानी दुर्गावती का चतुर्थ शताब्दी समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह के अंतर्गत नगर निगम जबलपुर ने नगर निगम की सीमा के बाहर होने के बावजूद रानी दुर्गावती की समाधि स्थल पर एक भव्य कीर्ति स्तंभ का निर्माण कराया। 24 जून 1964 को तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने इस कीर्ति स्तंभ का अनावरण किया।      रानी दुर्गावती संग्रहालय का निर्माण    
नगर निगम जबलपुर ने रानी दुर्गावती के चतुर्थ शताब्दी समारोह के समय रानी दुर्गावती संग्रहालय की स्थापना के लिए पहल की और नगर निगम ने इस संग्रहालय के निर्माण के लिए  अपनी भूमि दी। नगर निगम ने इस संग्रहालय का शिलान्यास भी दुर्गावती के बलिदान दिवस 24 जून 1964 को तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र से कराया।  शिलान्यास के पश्चात मध्य प्रदेश शासन ने इस संग्रहालय का निर्माण भी कराया।
 वृंदावन लाल वर्मा का सम्मान
नगर निगम ने रानी दुर्गावती चतुर्थ शताब्दी के आयोजन में दो दिवसीय संगोष्ठी भी करायी। इस संगोष्ठी में उपन्यासकार श्री वृंदावन लाल वर्मा को आमंत्रित किया और उनका सम्मान भी किया गया। इस अवसर पर श्री वर्मा ने कहा की रानी दुर्गावती जैसा चरित्र का ऊंचापन बहुत कम देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि सन 1958 में जब मैंने रानी की समाधि देखी तो मेरी आंखों से आंसू निकल आए। मैंने सोचा कि मुमताज के लिए तो ताजमहल बन गया था किंतु ऐसी वीरांगना के लिए हम कोई स्मारक नहीं बना सके। अब चार सौ वर्ष के पश्चात इस कार्य को पूरा करने का काम नगर निगम कर रहा है। पद्म भूषण वृंदावन लाल वर्मा ने रानी दुर्गावती ऐतिहासिक उपन्यास की रचना कर गढ़ा मंडला की वीरांगना के प्रति वैसे ही श्रद्धांजलि अर्पित की जैसे कई वर्ष पूर्व एक अमर उपन्यास लिखकर झांसी की रानी को चिर स्मरणीय श्रद्धांजलि दी थी।  मित्र संघ के संस्थापक अजित वर्मा जी के प्रयास। 4 फरवरी 1967 को साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था मित्र संघ की स्थापना करने वाले वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक जयलोक के प्रधान संपादक श्री अजित वर्मा जी ने मित्र संघ की ओर से वीरांगना दुर्गावती स्मृति रक्षा अभियान के आयोजन की  पहली बार 24 जून 1971 को बारहा स्थित समाधि पर शुरूआत की। जहां वीरांगना दुर्गावती को स्मरण करने और उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने की जो शुरुआत  हुई वह अभी भी मित्र संघ द्वारा जारी रखी गई है।
 वीरांगना दुर्गावती की गजारूढ़ प्रतिमा की स्थापना  
नगर निगम जबलपुर ने 24 जून  1964 को वीरांगना दुर्गावती के चतुर्थ शताब्दी समारोह के अवसर पर भंवर ताल उद्यान में वीरांगना दुर्गावती की प्रतिमा को स्थापित करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र से भूमि पूजन कराया। तभी वीरांगना दुर्गावती की प्रतिमा स्थापना के लिए जयपुर के कलाकार नारायण लाल जैमनी को नगर निगम ने आदेश दिया। लेकिन इस प्रतिमा के भुगतान को लेकर नगर निगम और कलाकार के बीच विवाद की स्थितियां बन गई और यह मूर्ति 10 वर्षों तक जयपुर में ही  बनी रखी रही । प्रतिमा का निर्माण करने वाले मूर्तिकार नारायण लाल जैमिनी  दिवंगत भी हो चुके थे।  8 अगस्त 1974 को श्री बाबूराव परांजपे  महापौर निर्वाचित हुए। तब मित्र संघ के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार श्री अजित वर्मा ने महापौर श्री परांजपे को वीरांगना दुर्गावती की प्रतिमा को जयपुर से मंगवाने और उसकी स्थापना कराने का सुझाव दिया और निरंतर इसके लिए उन्होंने दबाव बनाया। श्री परांजपे के प्रयासों से  दुर्गावती की प्रतिमा के 69 हिस्से तीन ट्रकों में लाये गए?। इस प्रतिमा का संपूर्ण भार 2000 मन है। प्रतिमा की ऊंचाई 20 फुट, प्रतिमा की लंबाई 16 फुट और प्रतिमा की चौड़ाई 6 फीट और निर्माण अवधि 10 वर्ष है। प्रतिमा में प्रयुक्त पत्थर मकराना धवल संगमरमर और हाथी का निर्माण हृसलामा काला संगमरमर से हुआ है।
13 अप्रैल 1975 को भंवरताल में दुर्गावती की प्रतिमा का तीन दिनों तक भव्य अनावरण समारोह मित्र संघ के संस्थापक श्री अजित वर्मा के संयोजन में आयोजित हुआ। जिसमें प्रतिमा का अनावरण बांग्लादेश युद्ध के विजेता भूतपूर्व लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोरा से कराया गया और व्याख्यान देने के लिए साहित्यकार श्रीमती महादेवी वर्मा को आमंत्रित किया गया था। मित्र संघ ने इस प्रतिमा की स्थापना के पश्चात प्रतिवर्ष 24 जून को वीरांगना दुर्गावती की समाधि के साथ ही भंवर ताल में प्रतिमा  स्थल पर भी बलिदान दिवस समारोह के आयोजन की शुरुआत कराई गई । इस आयोजन में वीरांगना दुर्गावती को समाधि और प्रतिमा स्थल पर राजकीय सम्मान देने की शुरुआत भी श्री अजित वर्मा ने अपने सक्रिय प्रयासों से कराई जिसमें पुलिस बैंड द्वारा राष्ट्रधुन बजायी जाती है और पुलिस के दल द्वारा हर्ष फायर कर प्रतिवर्ष वीरांगना दुर्गावती को सलामी दी जाती है।  वीरांगना दुर्गावती का बलिदान दिवस का कार्यक्रम दो दिन तक होता है। 22 जून को  महिला और पुरुष वर्ग की वीरांगना दुर्गावती मैराथन दौड़ प्रतियोगिता होती है। वहीं 24 जून को धावक दल वीरांगना दुर्गावती की समाधि से मशाल लेकर भंवर ताल में प्रतिमा स्थल तक आते हैं। कुछ समय पश्चात श्री अजित वर्मा जी के प्रयासों से 5 अक्टूबर को मित्र संघ ने वीरांगना दुर्गावती के जन्मदिन का आयोजन भी प्रारंभ किया है।
जबलपुर विश्वविद्यालय वीरांगना दुर्गावती के नाम
पहले जबलपुर के विश्वविद्यालय का नाम जबलपुर विश्वविद्यालय रहा। इस विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय करने के लिए मित्र संघ के संस्थापक श्री अजीत वर्मा में लंबा संघर्ष किया और उनको जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कराने में कामयाबी भी मिली। विश्वविद्यालय में रानी दुर्गावती की आदमकद प्रतिमा भी स्थापित हुई।
लेडी एल्गिन अस्पताल रानी दुर्गावती के नाम पर हुआ
जबलपुर हाईकोर्ट के पास महिलाओं के लिए एक शासकीय  अस्पताल संचालित है। इस अस्पताल का नाम पूर्व में लेडी एल्गिन अस्पताल रहा है। इस अस्पताल का नाम रानी दुर्गावती चिकित्सालय कराने के लिए भी मित्र संघ के संस्थापक श्री अजित वर्मा ने लंबे समय तक प्रयास किये और इस अस्पताल का नाम भी दुर्गावती के नाम से हुआ।
दुर्गावती पर डाक टिकट
मित्र संघ के संस्थापक श्री अजित वर्मा ने तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री श्री अर्जुन सिंह से  कई बार भेंट की और उनसे वीरांगना दुर्गावती पर डाक टिकट जारी करने का आग्रह किया?। डाक टिकट उन्हीं पर जारी होती है जिनका केंद्रीय ग्रंथालय में इतिहास रहता है। लेकिन जब संचार मंत्री अर्जुन सिंह ने डाक टिकट जारी करने की स्वीकृति प्रदान की तो दिल्ली के केंद्रीय संग्रहालय में दुर्गावती से संबंधित कोई जानकारी नहीं थी। तब श्री अजित वर्मा ने जानकारी एकत्र करके प्रस्तुत की और 24 जून 1988 को वीरांगना गाना दुर्गावती के बलिदान दिवस पर मित्र संघ द्वारा मानव भवन में आयोजित  दुर्गावती स्मृति समारोह में संचार मंत्री अर्जुन सिंह ने डाक टिकट भी जारी की।

Jai Lok
Author: Jai Lok

RELATED LATEST NEWS

Home » Uncategorized » मित्रसंघ के संस्थापक अजित वर्मा जी ने 1971 से शुरू किया था समाधि पर बलिदान दिवस का आयोजन: जबलपुर से शुरू हुए दुर्गावती की स्मृति रक्षा के प्रयास