आज उनकी पुण्यतिथि पर विशेष
(डॉ. नरेश चंद्र त्रिपाठी),प्राचार्य
(डॉ. शिवकुमार व्यास),उप प्राचार्य
जी. एस. कॉलेज, जबलपुर
इस संसार में विरले ही व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिन्हें उनकी यश गाथा के आधार पर सदियों तक स्मरण किया जाता है, जो अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व की ऐसी अमित आभा जनमानस पटल पर बिखेरते हैं, जो उन्हें जीवंत एवं अनुकरणीय बनाये रखती है। यही कारण है कि संपूर्ण समाज उनका यशगान करता रहता है, और ऐसे अनेक चमत्कृत कर देने वाले व्यक्तित्व के धनी महापुरूष इस संसार में हुए हैं, जिन्हें विस्मृत कर पाना असंभव है। ऐसे ही अविस्मरणीय व्यक्तित्व एवं कृतित्व के धनी थे स्व. यशवंत शंकर धर्माधिकारी जी। समाज जीवन का शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा जो उनसे अछूता रहा हो! कुशल कानूनविद्, शिक्षा शास्त्री, लेखक, चिंतक-विचारक, समाजसेवी साहित्य संगीत, कला प्रेमी, विनोद प्रिय और न जाने कितनी विशेषताओं एवं विलक्षण प्रतिभाओं को समेटे वे अपने आप में विराट एवं बहुआयामी व्यक्तित्व रहे। निश्चित ही उन सभी बातों को इस आलेख में समेटना असंभव है।उनका सान्निध्य प्राप्त करने का सौभाग्य जिन्हें भी प्राप्त हुआ वे आज भी अभिभूत होकर उनके प्रभावी व्यक्तित्व की चर्चा बड़े आनंद से करते हैं। कानून के क्षेत्र में वे विख्यात रहे, उनका कानून का ज्ञान और उसकी समक्ष अद्भुत रही न्यायालय में जब वे मुकदमों की पैरवी करते थे तो न्यायाधीश भी पूरे ध्यान और सम्मान के साथ उनके तर्कों और दलीलों को सुना करते थे। उनकी इसी कानूनी समझ और ज्ञान को देखते हुए म.प्र. शासन ने उन्हें महाधिवक्ता का महत्वपूर्ण दायित्व प्रदान किया गया था, मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली और गौरवान्वित अनुभव करता हॅूं कि मुझे उनकी समृद्ध विरासत को कानून के क्षेत्र में आगे बढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ है। न्यायालय परिसर और अधिवक्ताओं के बीच आज भी उनकी चर्चा जब-तब होती रहती है, जिसमें कानून की उनकी समझ, सहजता, सरलता एवं विनोद प्रियता का पुट प्रधान होता है। समाज सेवा के क्षेत्र में उनका कोई शानी नहीं था, सामाजिक कार्यों के लिए वे सदैव पूरे उत्साह और उमंग के साथ वे सदैव तत्पर रहा करते थे, शायद ही कोई ऐसा आयोजन रहता होगा, जहॉं उनकी उपस्थिति न रहा करती हो, यह उनकी लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि सभी आयोजक उनसे उपस्थिति का आत्मीय आग्रह करते थे, और धर्माधिकारी जी भी उनके आग्रह का पूरा सम्मान करते हुए उस आयोजन में अवश्य उपस्थित होते थे। उनकी उपस्थिति भला सामान्य कैसे हो सकती थी। अत: उन्हें आयोजन का अध्यक्ष बनाया जाता था। कई बार वे घर के सदस्यों से मजाक करते भी थे कि घर के बाहर एक बोर्ड लगवा दो कि यहॉं अध्यक्ष रहता है। उनकी सबसे अनूठी विशेषता हर उम्र के व्यक्ति के साथ हिल-मिल जाना था, यही कारण था कि सभी उन्हें आत्मीय और अभिन्न मानते थे। सामाजिक व्यस्तता के बाद भी पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने वे कभी पीछे नहीं रहे। परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं को पूरा करना और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह वे बखूबी करते थे। उसका ही परिणाम है कि आज संपूर्ण परिजन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण सफल हैं। वे गंभीर चिंतक, विचारक एवं लेखक भी थे। उनके अनेक आलेख समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे।संगी एवं रंगमंच में ने केवल उनकी रूचि थी अपितु उनकी गहरी समझ भी थी संगीत के आयोजन परिवार में तो होते रहते थे। साथ ही संगीत समाज के वे लंबे समय तक अध्यक्ष भी रहे, जिसके नियमित आयोजन होते थे जिसमें उनकी उपस्थिति अनिवार्य रहती थी! रंगमंच से उन्हें गहरा लगाव रहा, जिसका प्रमाण उन संस्थाओं से उनका जुड़ाव रहा है। जबलपुर शहर की ऐसी ही संस्थाओं में से एक विवेचना संस्था है, जिससे वे लगातार जुड़े रहे! ऐसी संस्थाओं को सक्रिय एवं सशक्त रूप से प्रभावी बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, रंगमंचीय प्रस्तुतियों में वे पूरी रूचि के साथ शामिल होते थे। शिक्षा क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय है। अनेक शैक्षणिक संस्थाओं को कुशल एवं सुचारू रूप से संचालित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, विशेष रूप से समूचे महाकौशल क्षेत्र में वाणिज्य की शिक्षा के लिए विख्यात एवं सुप्रसिद्ध जी.एस. कॉलेज को उन्होंने संरक्षण एवं मार्गदर्शन देने में अविस्मरणीय योगदान दिया। उनका स्नेहपूर्ण एवं आत्मीय साहचर्य संस्था के सदस्यों के लिए अनुपम रहा।
अनेक अवसरों पर कॉलेज के समारोहों में उनकी चर्चा होती है, जिसमें उनके संस्था सदस्यों के साथ स्नेहपूर्ण संबंधों एवं संस्मरणों का उल्लेख किया जाता है, महाविद्यालय शासी निकाय के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने लंबे समय तक अपनी भूमिका का निर्वाह किया।
यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है, अत: इस शताब्दी वर्ष को भव्यतापूर्ण आयोजित किये जाने के संबंध योजना है। जिसके अंतर्गत् वर्ष भर विविध आयोजन किए जाएंगे! जिनमें नगर की विभिन्न संस्थाएॅ शामिल होंगी, इनमें साहित्यिक, अकादमिक, संगीत एवं रंगमंच पर आधारित गतिविधियॉं शामिल होंगी। दिनांक 18 जुलाई 2024 को जी.एस. कॉलेज में स्थापित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कार्यक्रम से इस शताब्दी समारोह का आरंभ हो चुका है। आगे होने वाले आयोजनों में व्यापक रूप से समाज के विविध क्षेत्रों से जुड़े विशिष्ट जनों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।