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आज की तारीख में पटवारी से ताकतवर और कोई है क्या?

 

चैतन्य भट्ट

(जय लोक)। एक पुराना चुटकुला है और क्या मालूम हक़ीकत ही हो कि एक गाँव में जब उस जिले के कलेक्टर लोगों की समस्याओं को हल करने गाँव गए तब गाँव की एक बुढिय़ा ने कलेक्टर के काम से खुश होकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि बेटा, भगवान की दुआ से तुम इतनी तरक्की करना कि पटवारी बन जाओ। आज की तारीख में गाँव हो या शहर, कस्बा हो तहसील हो राजधानी हो या मेट्रोपॉलिटिन सिटी पटवारियों का जलवा इस कदर बढ़ गया है और वे वाकई कलेक्टर से ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं। आदमी आम हो या खास, किसी को भी खसरे में नाम चढ़वाना हो, नकल लेना हो, सीमांकन करवाना हो, नामान्तरण करवाना हो, या जमीन जायदाद की पतासाजी करना हो तो उस इलाके के पटवारी के आगे पीछे घूमना ही पड़ता है। आजकल तो बड़े-बड़े बिल्डर, ठेकेदार और कॉलोनाइजर अपने अपने इलाके के पटवारियों को अपनी महंगी मंहगी गाडिय़ों में बैठाकर इधर उधर घुमाते रहते हैं ताकि उनके काम में पटवारी जी कोई अड़ंगा न लगा दें।

अब ऐसे सर्वप्रिय पटवारियों की जमात को भी हड़ताल करना पड़े तो समझो जमाना खराब आ गया है। जिस पटवारी देवता के सामने अच्छे-अच्छे खां सर झुकाये अर्जी लगाते हैं वो पटवारी सरकार से नाखुश हैंं। सचमुच बहुत नाइंसाफी है, वैसे आजकल सरकार किसी हड़ताल की ज्यादा परवाह नहीं करती लेकिन पटवारियों की हड़ताल होते ही सरकार और आला अफसरों की हालत पतली हो गई, तुरत फुरत में पटवारियों के नेताओं को वार्ता की टेबल पर बुलाया बातचीत  करके मान मनौव्वल की और सरकार पर रहम खा कर पटवारियों ने हड़ताल स्थगित कर दी। यानी पटवारियों की ताकत का सामना करने में सरकार भी बेबस साबित हुई और ये भी साबित हो गया कि भारत के सिस्टम में पटवारी ही सबसे ज्यादा ताकतवर मुलाजिम हंै। दरअसल ये पटवारी राजस्व विभाग की ‘रीढ़ की हड्डी’ होते हैं और कोई भी इंसान अपनी रीढ़ की हड्डी को खराब नहीं होने देत। कहा जाता है कि रीढ़ की हड्डी का एक भी गुरिया खिसका तो समझ लो बैडरेस्ट के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। इसलिए सरकार और अफसरों ने भी सोचा कि सरकार और वे खुद बैडरेस्ट पर आ जाएं उससे बेहतर है कि गुरिया खिसकने के पहले ही इसका इलाज कर लिया जाये, फिर दूसरी बात तो ये भी है कि बड़े बड़े अफसरों की पोल तो इनके पास ही रहती है पता नहीं कब कौन अपना मुंह खोल दे और अफसरी पर आँच आ जाए। इसलिए सारी परिस्थितियों का गहन अध्ययन करते हुए सरकार इन कलयुग के भगवानों के सामने नतमस्तक हो गई। क्योंकि सरकार को भी मालूम है कि यदि पटवारी नाराज हो गए तो सारा राजस्व विभाग का भट्टा बैठ जाएगा। अफसरों को भी इस बात का अहसास है कि पटवारी सेटिंग नहीं करेंगे तो अपनी रोजी रोटी पर संकट आ जाएगा और कोई भी ये नहीं चाहेगा कि उसकी रोजी रोटी पर संकट आ जाए।

अंडों से डर

अपने को तो अभी तक ये मालूम था कि टीएमसी की सांसद ‘महुआ मोइत्रा’ बड़ी दमदार और एक वीरांगना लेडी है लेकिन क्या पता था कि ये वीरांगना अंडे से डरने लगी है। हुआ यूं कि कोर्ट ने उन्हें किसी मामले में बुलाया था तो उनके वकील ने एक एप्लीकेशन दी कि महुआ मोइत्रा को डर है कि विरोधी पार्टी के नेता उन पर अंडे फेंकेंगे इसलिए अगर पेशी वर्चुअल हो जाए तो ज्यादा ठीक होगा, हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने एक ही बात कही कि अगर आप राजनीति में हो तो आपको अंडों से क्यों डरना चाहिए, वैसे न्यायमूर्ति ने बड़ी सही बात की थी राजनीति में यदि आना है तो अपने भीतर जबरदस्त सहनशक्ति बढ़ाना पड़ेगी। क्योंकि यदि आप राजनीति में हो और यदि फूल माला मिल रही है तो कभी कभार अंडे की चोट भी खानी पड़ सकती है। गाली गलोज तो आज कल आम बात है और पश्चिम बंगाल में तो लंबे समय से पिटाई भी चल रही है पहले टीएमसी वाले बीजेपी वालों को पीटा करते थे अब बीजेपी वाले टीएमसी वालों को पीट रहे हैं। वहां के पुलिस वाले स्थितप्रज्ञ की स्थिति में हंै वे इन सब चीजों पर टेंशन नहीं लेते, वे सोचते हैं कल तक ये पीटते थे आज पिट रहे हैं हो सकता है कल फिर वो पुराने पीटने वाले सत्ता में आ जाएं, अपने को तो सबसे संबंध बनाकर रखना है काहे को इस झंझट में पड़ें वैसे अपना महुआ मोइत्रा जी को एक ही सुझाव है कि आपके बारे में जो धारणा लोगों के बीच में है कि आप एक बहुत दमदार, निडर, बहादुर, साहसी नेता हो उस धारणा को बने रहने दो अगर कोई अंडा फेक भी रहा है तो अंडे इक_े कर लो दो-चार दिन के आमलेट का खर्चा अपने आप निकल आएगा। अब मानना या ना मानना मैडम के हाथ में है लेकिन अपनी सलाह तो यही है।

ये तो होना ही था

 

दतिया उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जिस तरह से शिकस्त मिली है उससे पार्टी, संगठन, सत्ता हाई कमान सबकेसब सकते में हैं। जब टिकट की घोषणा हुई थी तब इलाके के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने जो उत्पात मचाया था उस भारतीय जनता पार्टी में जिसके बारे में ये बात मशहूर है कि वो बेहद अनुशासित पार्टी है ये धारणा तार तार हो गई थी। लोगों को लगा इस मामले में तत्काल कार्यवाही हो जाएगी लेकिन पार्टी ने उस समय तो धीरज धर लिया। लेकिन जैसे ही चुनाव का परिणाम आया एक झटके में विभिन्न संगठनों के एक हजार से ज्यादा नेताओं को उनके पद से हटा दिया गया। अब भारतीय जनता पार्टी हो गई है ‘अर्जुन’ और नरोत्तम मिश्रा बन गए हैं ‘चिडिय़ा की आंख’ पूरे हाई कमान की निगाहें नरोत्तम मिश्रा पर टिकी हुई हैं क्योंकि उनको ही तो चुनाव संचालन का जिम्मा सौंपा गया था। उन्होंने भी रुंधे गले से आंसू बहाते हुए कहा भी था कि मैं अपने प्रत्याशी को जिता दूंगा लेकिन अब जब प्रत्याशी की लाई लुट गई है तो मिश्रा जी को भी ये डर सता रहा है कि पार्टी पता नहीं उनके साथ क्या करेगी। वैसे इस बात का अंदाजा तो मिश्रा जी को भी होगा कि उनके समर्थकों ने जो नौटंकी करी थी उसका खामियाजा उनको ही भुगतना पड़ेगा भले ही उसमें देर क्यों ना हो जाए लेकिन पहले जो कुछ हुआ है और उसके बाद जो कुछ हुआ तो यही कहा जा सकता है ‘ये तो होना ही था’।

सुपर हिट ऑफ  द वीक

‘आपको याद है कि जब आप मुझे देखने आये थे तो मैने कौन से रंग की साड़ी पहनी थी’ श्रीमती जी ने श्रीमान जी से पूछा
‘नहीं मुझे याद नहीं है’ श्रीमान जी ने उत्तर दिया।
‘इसका मतलब है कि आप मुझे प्यार नहीं करते’ श्रीमती जी ने नाराजगी से कहा
‘ऐसी बात नहीं है जब कोई पटरी पर लेटने जाता है तो ये थोड़ी न देखता है कि ट्रेन पेसेंजर है, एक्सप्रेस है, या सुपर फास्ट’ श्रीमान जी ने उत्तर दिया।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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