
जबलपुर (जय लोक)। भाजपा और कांग्रेस के अंदर उठा पटक का पैमाना अलग स्तर पर चला गया है। दोनों ही दलों में विगत दिवस अपने प्रतिद्वंदी नेताओं को मार्ग से हटाने के लिए वीडियो वायरल करने और एक दल के नेता के द्वारा पर्दे के पीछे से अपने ही नेता के खिलाफ शिकायत और न्यायालीन प्रक्रिया का सहारा लेकर उन्हें नुकसान पहुंचाने का खेल खेले जाने की चर्चाएं अब राजनीतिक गलियारों में सरगर्म है। चर्चाएं कितनी सच हैं कितनी झूठ हैं यह केवल दो पक्ष ही सत्यापित कर सकते हैं, जिसके साथ घटना घटित हुई है और जिसने यह पूरा घटनाक्रम करवाया है।

बाकी सब चर्चाओं को पंख लगा-लगाकर उड़ाए पड़े है। लेकिन यह सच है कि दोनों दलों के लोगों ने अपने दल के प्रतिद्वंदी को निपटाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। इन दोनों ही घटनाक्रमों को सही समय पर अंजाम दिया गया। भारतीय जनता पार्टी लंबे अरसे से बहुप्रतीक्षित मेयर इन काउंसिल के विस्तार के बारे में चर्चा कर रही थी और संगठन इस दिशा में सक्रिय होकर शामिल किए जाने वाले नामों पर मंथन कर रहा था। पार्टी सूत्रों के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया अंतिम चरण पर थी। इसी दौरान एक हरी बोतल वाली बियर का वीडियो पुराने रिकॉर्ड के चिराग से जिन्न की तरह निकला और उसने जबलपुर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की, देश की राजनीतिक गलियों में सुर्खियाँ बटोरी। जिन नेताजी का वीडियो था उनको मेयर इन कौंसिल के विस्तार में बड़ा दावेदार माना जा रहा था। तो स्वाभाविक सी बात है लंबे समय से रिकॉर्ड में रखा गया तरकश का यह वीडियो तीर समय पर चलाया गया था। तीर निशाने पर लगा भी मर्यादा और अनुशासन के नाम से चलने वाले भाजपा संगठन ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया और जिस मकसद से यह तीर चलाया गया था वह पूरा भी हुआ और मेयर इन काउंसिल के गठन की प्रक्रिया पुन: आगे बढ़ गई। अब इस सफलता से किस-किस के चेहरे पर खुशी छाई और किस-किस के हाथ निराशा आई यह सब ने देखा और अपने अपने अंदाज लगाए। भाजपा पार्षदों में चर्चा यह भी है एक के चक्कर में कई और नेता पद पाने से वंचित रह गए।

दूसरे घटनाक्रम में वर्षों पुराने एक लीज के प्रकरण में अतिक्रमण की शिकायत का तडक़ा लगाया गया। वैसे तो यह जनसुनवाई की सामान्य शिकायत के रूप में सामने आई थी। फिर मामला न्यायालय में चला गया, लेकिन जैसे ही राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को और विशेष करके जो इनके अपने दल कांग्रेस के थे उनके संज्ञान में यह पूरा मामला आया तो उन्होंने तिल का ताड़ बनाने में बिल्कुल भी देरी नहीं की।
मामला न्यायालय के समक्ष पहुंच चुका था। साथ ही साथ डीएनजैन संस्था को वर्षों पहले दी गई लीज सन 1992 से निरस्त बताया गया। यहां पर एक झुझारू सक्रिय पार्षद कई वर्षों से निवासरत हैं उनके साथ यहां रहने वाले कई अन्य परिवार भी हैं। दस्तावेजों की कमी का आधार बना और न्यायालय अब अतिक्रमण हटाने के निर्देश दे चुका है। मामला दीवानी मुकदमे का था। लीज के आवंटन, निरस्तीकरण नियमों कानून आधारित था। लेकिन बाद में इसे हर मोर्चे से हवा देने का काम किया गया। राजनीतिक दृष्टिकोण से इस मामले को हवा देने की साजिश करने वालों की मनोकामना उस समय पूरी होती नजर आई और नेता प्रतिपक्ष के पद पर जो बदलाव की संभावनाएं उभर रही थी वह फिलहाल कुछ समय के लिए टल गई। हालांकि और भी वरिष्ठ पार्षद नगर निगम की विपक्ष की वर्तमान परिस्थितियों को कांग्रेस पार्टी के हित में नुकसानदायक मानते हुए अन्य किसी सक्षम व्यक्ति को मौका देने की बातें उचित मंच और वरिष्ठ नेताओं के सामने कई बार रख चुके हैं। चुनाव का समय नजदीक आ रहा है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस दिशा में जल्दी निर्णय ले सकते हैं ताकि नगर निगम में विपक्ष इस मजबूती के साथ नजर आए जैसा उसे होना चाहिए। इस स्थिति का पूरा फायदा उठाते हुए दूसरे दावेदारों ने इस पूरे घटनाक्रम के बाद अपनी स्थिति को मजबूती के साथ वरिष्ठ नेताओं के सामने रखना और संगठन बदलाव की बात करना दबी जुबान में तो शुरू कर दिया है जल्द ही इस बारे में खुलकर भी मांगे सार्वजनिक होगी।


बीजेपी ने किया दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ लोकसभा में पास होगा परिसीमन बिल!
Author: Jai Lok






