
(जय लोक)। इन दोनों अगर सबसे ज्यादा चर्चा किसी चीज की हो रही है तो वो है ‘सोना’ मेरा मतलब ‘नींद’ से नहीं बल्कि धातु कहे जाने वाले सोने से है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी जी ने लोगों से अपील की है कि लोग बाग एक साल तक सोना ना खरीदें ताकि देश की धनराशि में बचत हो सके। कई लोगों ने उनके सुझाव पर अमल भी शुरू कर दिया लेकिन अपने देश में तो बच्चा पैदा होने से लेकर मरने तक में सोने की जरूरत पड़ती है। ऐसा कौन सा आयोजन है जिसमें सोना ना लगता हो? आज से नहीं पुरातन काल से सोने के प्रति लोगों में जबरदस्त आकर्षण रहा है। लोग बात कहते थे कि सोना खरीद लो वक्त जरूरत पर काम आएगा क्योंकि सोना ही एक ऐसी चीज है जो आधी रात को भी बिक जाती है या फिर उसको गिरवी रखकर सुनार से या साहूकार से नगद पैसा मिल सकता है। महिलाओं को तो सोना विशेष कर ज्यादा ही पसंद है उनके सारे जेवरात सोने के ही बने रहते हैं। आजकल वैसे सोने की तर्ज पर ‘बेंटेक्स’ के कुछ नकली जेवरात भी मार्केट में अवेलेबल हैं लेकिन हर महिला चाहती है कि वो असली खरे सोने के जेवरात पहने, दक्षिण भारत में तो सोने के प्रति अगाध प्रेम है। दस दस तोले वाली चेन पहनने का रिवाज है महिलाएं भी भारीभरकम जेवरात अपने शरीर पर धारण करती हैं। सोने का कितना महत्व है इस पर गीतकारों ने भी कई गीत रचे हैं चाहे वो मेरा गांव मेरा देश का ‘सोना लई जा रे चांदी लई जा रे’ गीत हो या फिर बॉबी का ‘ना मांगू सोना चांदी, ना मांगू हीरा मोती’ या फिर राजा हिंदुस्तानी का’ कितना सोना तुझे रब ने बनाया या फिर बहुत पुरानी देवानंद की फिल्म माया का ‘कोई सोने के दिल वाला कोई चांदी के दिल वाला’ या फिर गोविंदा और करिश्मा की फिल्म हीरो नंबर वन का ‘सोना कितना सोना है सोने जैसा तेरा दिल’। गजलों में भी सोने का जबरदस्त प्रयोग हुआ। पंकज उदास की एक बहुत मशहूर गजल आज भी उतनी ही मशहूर है जितनी पहले थी ‘चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल’ और सही बात है जिसके पास सोना होता है वही धनवान होता है क्योंकि सोने के दाम तो हमेशा बढ़ते ही आए हैं और रुपया हमेशा गिरता रहा। यही कारण है कि बड़े बूढ़े सोना खरीदने की सलाह देते रहते हैं। पता तो ये लगा है कि अपने भारत के घरों में ही लगभग पच्चीस हजार टन से लेकर पचास हजार टन सोना रखा हुआ है मंदिरों की तो बात ही छोड़ दो। महबूबा भी कई बार अपने आशिक को सोने के रूप में देखती है और यही कारण है कि फिल्म तीसरी मंजिल में शम्मी कपूर को देखकर आशा पारेख गाती है ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे दे दूंगी जान जुदा मत होना’ ये बात उस जमाने में सही होगी शम्मी कपूर के लिए, लेकिन आज ये बात पूरी तरह से महिलाओं पर लागू है जो सोने से कह रही हैं कि ‘दे दूंगी जान जुदा मत होना रे’। प्रधानमंत्री जी की अपील पर कौन कितना ध्यान देता है यह देखना अभी दिलचस्प होगा क्योंकि सोने के प्रति मोह को इतनी जल्दी कम करना बड़ा कठिन काम है और दूसरी बात ये भी है कि सोना एक ऐसी चीज है जिसके दाम हमेशा बढ़ते ही आए हैं एक सूचना के अनुसार पिछले 600 साल का रिकॉर्ड यही बताता है कि सोने के दामों में कभी कमी नहीं आई और अब तो सोना ईटीएफ में भी खरीदा जा सकता है यानी अपने पास रखने की जरूरत नहीं है अपना डिमैट अकाउंट खोलो सोना खरीदो और सोना बेचो।
इसको कहते हैं दूरदृष्टी
दिल्ली, महाराष्ट्र, तेलंगाना और हरियाणा कैडर समेत देश भर के 50 के लगभग आइएएस और आइपीएस अधिकारियों ने अप्रैल 2022 में एक ही पंजीकरण दस्तावेज के माध्यम से एक ही दिन में भोपाल के पास गुराडी घाट एरिया में 2.023 हेक्टेयर (लगभग पांच एकड़) कृषि भूमि खरीदी। जमीन की इस खरीदी को अचल संपत्ति विवरण (आईपीआर) में ‘समान विचारधारा वाले अधिकारियों’ द्वारा अधिग्रहित संपत्ति के रूप में वर्णित किया गया।
खरीद के महज 16 महीने बाद, अगस्त 2023 में 3,200 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले पश्चिमी बाईपास परियोजना को मंजूरी मिली जिसका प्रस्तावित मार्ग कथित तौर पर उस भूमि से गुजरता है। कहा जाता है कि खरीद के समय यह जमीन कृषि योग्य भूमि के रूप में नामित थी मगर प्रदेश सरकार द्वारा बाईपास को मंजूरी देने के 10 महीने के भीतर ही इसे आवासीय क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया गया। दो साल से भी कम समय में, सरकार द्वारा अनुमोदित बाईपास और भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण इस जमीन का बाजार मूल्य 11 गुना बढ़ कर 5.5 करोड़ रुपये से बढक़र 60 करोड़ रुपये से अधिक हो गया।

अब आप ही बताइए इसे राष्ट्रभक्ति की शपथ के साथ सिविल सेवा में आने वाले इन तथाकथित समान विचारधारा वाले अफसरों की दूरदृष्टी न कहें तो और क्या कहेंगे। मौका था, समय रहते पहचान लिया। अब सरकार ने वहीं से बाईपास योजना को मंजूरी दे दी तो हम क्या करें? कुछ नादान इसे पद और सत्ता का घोर दुरुपयोग और घोटाला बता रहे हैं। कह रहे हैं कि राजनेताओं को तो फिर भी हर पांच साल में चुनाव का सामना करना पड़ता है। सिविल सेवा अफसरों को तो बिना किसी वास्तविक जवाबदेही के आजीवन सत्ता सुख का वरदान प्राप्त है। अपना भला करने की कोशिश भी कोई अपराध है भला? और जो खुद का भला नहीं कर पाया वो जनता का भला कैसे करेगा। ऐसे में उनकी दूरदृष्टी को घोटाले जैसे घटिया शब्द से तौलना कहां का इंसाफ है?
अपनी तो इन तथाकथित समान विचारधारा वाले अफसरों, जिनके सिविल सेवा में चयन का मूल सिद्धांत ही देश के आम नागरिकों के भले से जुड़ा हुआ है, से बस एक ही छोटी सी शिकायत है। काश थोड़ी बहुत दूरदृष्टी का परिचय अपनी सेवा के इस मूल सिद्धांत के लिए भी दें। थोड़ा बहुत भला जनता का भी हो जाए।

इन गिद्धों की गिनती कौन करेगा
राज्य सरकार का वन विभाग जल्द ही जंगली गिद्धों की गणना करवाने की तैयारी कर रहा है। ज्ञात हो कि पूरे देश में गिद्धों की आबादी के मामले में मध्यप्रदेश सबसे आगे है। लेकिन अफसोस ये है कि सरकार जंगली गिद्धों के साथ साथ इंसानी गिद्धों की गणना क्यों नहीं करवा रही। पंचायत, नगर पालिका, थाना, आरटीओ, कलेक्ट्रेट से लेकर सचिवालय और तमाम सरकारी विभागों में बैठे इन गिद्धों ने जनता का जीना हराम कर रखा है। आम आदमी जैसे ही किसी दफ्तर में घुसता है, किसी भी अफसर और कर्मचारी की पैनी नजर से बच ही नहीं सकता। काम छोटा हो या बड़ा, सही हो या गलत कोई फकज़् नहीं पड़ता। ये गिद्ध फौरन काम की कीमत लगाकर मांस नोचने की शुरुआत कर देते हैं। जितनी टेबल उतने गिद्ध। फिर चाहे परसाई का ‘भोलाराम’ हो या श्रीलाल शुक्ल का ‘लंगड़’। काम पूरा होते तक हर आदमी की सिर्फ हड्डियां बच पाती हैं। इंसानी गिद्ध का आकार और उसकी भूख ओहदे के मुताबिक होती है। जितना बड़ा पद उतना ज्यादा मांस नोचने को तत्पर। उधर जंगली गिद्धों का तो आखिर पेट भर भी जाता है लेकिन इंसानी गिद्धों की भूख कभी खत्म नहीं होती। मेरा सुझाव तो यह है कि जनगणना के काम के साथ साथ सरकार अपने महकमों में फैले इंसानी गिद्धों की गिनती भी करवा ले तो बेहतर है।


सुपर हिट ऑफ द वीक
श्रीमान जी ने अपने दोस्त से कहा ‘यार, परसों मेरी बीवी कुएं में गिर गई थी, उसे बहुत चोट लगी और बहुत चिल्ला भी रही थी।
‘अरे बाप रे! अब कैसी है बेचारी दोस्त ने घबरा कर पूछा
‘अब बिल्कुल ठीक है, कल से कुएं से आवाज नहीं आई’ श्रीमान जी ने तसल्ली देते हुए कहा।
Author: Jai Lok






