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कथित महिला पत्रकार की उठा पटक के बाद एसपी ऑफिस में पूछताछ का दौर शुरू, पत्रकार संगठनों की शिकायत के बाद पुलिस ने शुरू की कार्यवाही, हो रही सराहना

जबलपुर (जयलोक)। कुछ दिनों पहले पुलिस अधीक्षक कार्यालय में दो महिलाओं के बीच में जमकर उठा पटक हुई थी और महिलाएं लहूलुहान हुई थी। इस पूरे घटना का वीडियो सोशल मीडिया से लेकर हर अखबार से लेकर चैनल में भी सुर्खियों में बना रहा। पत्रकार जगत में इस घटना को लेकर काफी आक्रोश था क्योंकि युद्ध में शामिल एक महिला ने खुद को पुलिस के समक्ष पत्रकार बताया और सबसे बुरी बात यह निकाल कर सामने आई कि मामला खबर के बदले 500 रुपए के लेनदेन का था। सिविल लाइन पुलिस ने दोनों महिलाओं पर मामला दर्ज किया है। इस शर्मनाक घटना के बाद नगर के वरिष्ठ पत्रकारों से लेकर विभिन्न पत्रकार संगठनों ने कनेक्टर राघवेन्द्र सिंह, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय के समक्ष अपनी आपत्तियाँ दर्ज करवाईं थीं।  पत्रकार बनकर जनसुनवाई के दौरान पुलिस अधीक्षक कार्यालय और कलेक्ट्रेट कार्यालय में अपनी शिकायत लेकर आने वाले पीडि़त लोगों को भ्रमित कर झूठ पत्रकार बनकर अपने फर्जी क्रियाकलाप से खबर के नाम पर या उनके काम करवाने के नाम पर पैसे लेने वाले फर्जी पत्रकारों को सबक सिखाने के लिए मांग की थी।

नाम, नंबर, पता, संस्था, काम सब बताएं

विगत दिवस जनसुनवाई के दौरान पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आने जाने वाले लोगों से पूछताछ का क्रम शुरू किया। किसी भी व्यक्ति को बेवजह और बिना किसी काम के एसपी ऑफिस में रुकने की इजाजत नहीं दी गई। जिन लोगों ने खुद को मीडिया से जुड़ा हुआ बताया उनसे पुलिस ने नाम, पते, मोबाइल नंबर, किस संस्था से जुड़े हैं आदि जानकारियां एकत्रित की हैं ताकि सही लोगों की पहचान हो सके और उन्हें उचित सम्मान के साथ कार्य करने का स्थान दिया जा सके। यह जानकारी भी सामने आई है कि माइक आईडी लेकर गले में कार्ड लटका कर खुद को पत्रकार बताने वाले बहुत सारे लोगों के पास तो रजिस्ट्रेशन भी नहीं है, नौ शैक्षणिक योग्यता है, ना पत्रकारिता के सिद्धांतों से मतलब है, ना कि इसकी गंभीरता और समाज के प्रति अपने सरोकारों और जिम्मेदारी का एहसास है। बस इनको एक वजनदारी के साथ पैसे कमाने की भूख सर पर सवार है।

असली मेहनतकश पत्रकारों को बड़ी परेशानी

कलेक्ट्रेट में भी बहुत गंदगी करने वाले हैं। केवल पुलिस अधीक्षक कार्यालय नहीं बल्कि कलेक्ट्रेट कार्यालय में भी पत्रकारिता के नाम पर फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं नजर आती। ज्यादा कठिनाई उन लोगों को होती है जो वास्तविक पत्रकार हैं और कई वर्षों से अकेले या फिर किसी संस्थान के साथ जुडक़र पत्रकारिता कर रहे हैं। अपनी जिम्मेदारियां को भली भाती समझते हुए समाज के चौथे स्तंभ की भूमिका को बेदाग बनाकर निभा रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब किसी रिपोर्टिंग के अवसर पर फर्जी लोगों के बीच में यह लोग अपने आप को घिरा हुआ पाते हैं तो सबसे अधिक गिलानी उनके मन में ही उठती है और वे पत्रकारिता और प्रशासनिक जगत से भी यह सवाल करते हैं कि ऐसे फर्जी लोगों को अगर जिम्मेदार ही पत्रकार मानने लगेंगे, तो उनकी वर्षों की मेहनत और तपस्या व्यर्थ समझी जाएगी। कई वरिष्ठ कैमरामैन है, कई वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार है जो छोटे से लेकर बड़े स्तर पर पत्रकारिता के आयामों का पालन करते हुए कार्य कर रहे हैं लेकिन इन फर्जी लोगों की गैंग के कारण कई बार उन्हें भी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जो पूरे पत्रकार जगत के लिए शर्मनाक स्थिति उत्पन्न करते है।

माइक देखकर ललचाने से पहले अधिकारियों को भी सोचना चाहिए

पब्लिसिटी किसी को बुरी नहीं लगती लेकिन यह बात सत्य है कि प्रशासनिक अधिकारियों को, पुलिस अधिकारियों को स्वयं भी एक बार माइक आईडी देखकर ललचाने से पहले यह विचार कर लेना चाहिए कि वह किस व्यक्ति को पत्रकारिता जगत के व्यक्ति के रूप में मान सम्मान देकर स्थापित कर रहे हैं। क्योंकि फर्जी लोग अधिकारियों की बाइट को लेकर फर्जीवाड़ा करते हैं। उनसे निचले स्तर के अधिकारियों के समक्ष जाकर उन्हें चमकने, रौब दिखाने का कार्य करते हैं। आम लोगों को बेवकूफ बनाकर उनसे के पैसे की ठगी करते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा दी जाने वाली जानकारी और उनके द्वारा ऐसे लोगों का मनोरंजन करना इन्हें इतना बढ़ावा दे देता है। संपूर्ण जानकारी रखने वाले प्रशासनिक अधिकारी अगर इस मामले में थोड़ा एतियात बरतें और ऐसे लोगों को पहले दिन से चयनित कर इनसे दुरी बनाये रखेंगे तो ऐसे फर्जी लोग खुद को पत्रकार बताने से पहले दस बार सोचेंगे।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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