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कोई हमदम ना रहा, कोई सहारा ना रहा, हम किसी के ना रहे…

(जय जोक)। 60 के दशक में एक फिल्म आई थी ‘झुमरू’ जिसका निर्माण और संगीत खुद किशोर कुमार ने दिया था। इस फिल्म का मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा   बहुत ही मशहूर दुखद गीत था ‘कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा हम किसी के ना रहे कोई हमारा ना रहा’ ये गीत आज भी लोगों की जुबान पर है और अपने ख्याल से ये गाना पूर्व गृहमंत्री ‘पंडित नरोत्तम मिश्रा जी’ पर पूरी तरह से सटीक बैठ रहा है। एक बार चुनाव हारे पर हिम्मत नहीं हारी, कोशिश में लगे रहे कि राज्यसभा में मौका मिल जाएगा, या फिर संगठन में बड़ी पोस्ट पर पोस्टिंग हो जाएगी या फिर निगम मंडलों में अध्यक्ष बन जाएंगे, कैबिनेट रैंक का दर्जा भी मिल जाएगा, लेकिन कहते हैं ना जब वक्त खराब आता है तो सारे पांसे उल्टे पड़ जाते हैं, कुछ नहीं हुआ ‘आस निराश भई’ इस बीच दतिया का उपचुनाव आ गया। अब भाई साहब ने तय कर लिया कि एक बार फिर दतिया में अपनी किस्मत आजमाएंगे। पूरे प्रदेश में यही चर्चा थी कि दतिया से भारतीय जनता पार्टी अपने पुराने और दमदार नेता नरोत्तम मिश्रा को ही प्रत्याशी बनाएगी, भाई साहब ने लोगों से मिलना जुलना भी शुरू कर दिया पुरानी जो गलतियां थीं उनके लिए ‘सॉरी’ भी कहना शुरू कर दिया, फार्म भी ले आए। प्रदेश ने भी एक नाम हाई कमान को भेज दिया और वो नाम था  ‘पंडित नरोत्तम मिश्रा’ का। सारी तैयारी थी चुनाव लडऩे के लिए मिश्रा जी ने कमर कस ली थी अपने चेलों को तैयार कर दिया था कि जैसे ही नाम की घोषणा हो प्रचार में जुट जाना। लेकिन उन्हें क्या पता था कि किस्मत एक बार फिर उन्हें दगा दे जाएगी, ऊपर वालों ने सर्वे करवाया और पता लगा कि पंडित जी की स्थिति कमजोर है और कमजोर पर दांव लगाना भारतीय जनता पार्टी को गवारा नहीं है। तुरंत ही तीन नाम का पैनल भेजने के निर्देश हुए और रातों-रात पंडित मिश्रा की जगह पंडित तिवारी ने ले ली, बहुत बड़ा झटका था मिश्रा जी के लिए इसलिए उनके समर्थक सडक़ों पर आ गए तोडफ़ोड़ शुरू कर दी टिकट बदलो, टिकट बदलो, के नारे लगने लगे। लेकिन ये कोई कांग्रेस तो है नहीं जो किसी ने दम दी और टिकट बदल जाए। हाई कमान ने साफ  कर दिया यहां इन सब नौटंकियों से टिकट नहीं बदली जाती, कल तक गृह मंत्री के रूप में पूरी प्रदेश की पुलिस उनके अधीन होती थी वहीं पुलिस उनके समथज़्कों पर लाठी और आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी। यही है समय का फेर, कभी कमलनाथ की कांग्रेस सरकार गिराने में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले पंडित मिश्रा जी एक टिकट नहीं पा सके। इसलिए बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘वक्त’ का ये गीत हमेशा याद रखना चाहिए ‘आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिजाज’ और अब तो सचमुच मिश्रा जी के लिए यही दो गाने सबसे सटीक हैं। अब ना तो कोई उनका हमदम रहा और ना ही कोई सहारा ना वे किसी के लिए उपयोगी रहे  और कोई उनके लिए उपयोगी नहीं रहा।

छह लाख दो अपना नाम कटाओ
मध्यप्रदेश सरकार ने एक बार फिर 3600 करोड़ का नया कजऱ्ा उठा लिया है। इसे मिलाकर प्रदेश पर कुल कर्ज बढक़र 5 लाख करोड़ रुपए से ऊपर निकल गया है। सरकारों द्वारा कर्ज लिया जाना एक? स्वीकृत व्यवस्था है जिसके केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा स्वीकृत मापदंड हैं। प्रदेश सरकारें इन्हीं मापदंडों के आधार पर कर्ज उठाती रहती हैं। तमिलनाडु और महाराष्ट्र क्रमश: साढ़े नौ लाख करोड़ और आठ लाख करोड़ के कर्ज के साथ सबसे ज्यादा कर्जदार राज्यों में शुमार हैं। मगर वे देश के सबसे विकसित राज्यों में भी आते हैं। कर्ज आखिरकार कर्ज़ है और इसकी ब्याज समेत अदायगी वित्तीय संसाधनों पर दबाव डालती है।
2011 की जनगणना के आधार पर मध्य प्रदेश की कुल आबादी सवा सात करोड़ के लगभग थी। 2021 में कोविड त्रासदी के कारण नहीं हो पाई जनगणना की प्रक्रिया 2026 में फिर प्रारंभ हुई है। जनगणना विशेषज्ञों द्वारा प्रोजेक्टेड आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की वर्तमान जनसंख्या लगभग 9 करोड़ होने का अनुमान है। उस अनुपात में मध्य प्रदेश राज्य में वर्तमान प्रति व्यक्ति कर्ज़ का आंकड़ा लगभग 6 लाख रुपए बैठता है। जबकि इकानामिक सर्वे बताता है कि राज्य की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 1.69 लाख रुपए है।
इस मामले में पुराने कांग्रेसी नेता स्व. नरेंद्र महीधर याद आते हैं जिन्होंने अखबार में पढ़ा  था कि प्रदेश के हर व्यक्ति पर उस वक्त के हिसाब से शायद ‘एक सौ बीस रुपए’ का कर्ज था उन्होंने तुरंत उस राशि का एक चेक बनवाया और सरकार को भेज कर कहा अब मेरा नाम कर्जदारों की लिस्ट से अलग कर दो। चुनाव के समय करोड़ों की संपत्ति घोषित करने वाले नेता जरूर चाहें तो ऐसी हिम्मत दिखा सकते हैं। अपनी तो धनवानों से भी यही सलाह है कि छह लाख दो और अपना नाम कर्जदारों की लिस्ट से कटवा लो।

ममता से ममता रूठी
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी चुनाव में जब से हारी है तब से उनके ही तमाम नेताओं की ममता जो बरसों तक ममता जी के साथ थी वही ममता आज ममता के खिलाफ होकर ममता से अलग हो गई। राजनीति भी बड़ी अजब चीज है जो भी राजनीति में आता है, नेता बनता है उसका  सिफज़् एक ही उद्देश्य होता है सत्ता की ‘मलाई चखना’ बरसों तक वे सत्ता की मलाई चाटते रहते हैं। लेकिन जैसे ही सत्ता में रहने वाली उनकी पार्टी चुनाव हार जाती है वे तत्काल पाला पलट कर वहां चले जाते हैं जहां उन्हें फिर से उन्हें मलाई मिलने वाली है। अब तो ममता बनर्जी पर दया भी आने लगी है जो कभी बेहद खास और विश्वास पात्र रहे वे भी ऐसी पलटी खा रहे हैं जिसका कभी दीदी को अंदाजा भी ना रहा होगा, वैसे दीदी को यह समझना होगा कि राजनीति में यह आम बात है ,हो सकता है भविष्य में जब कभी दीदी फिर सत्ता में आए तो यही सब भगोड़े फिर से दीदी की चरण वंदना में लग जाएंगे लेकिन वह वक्त कब आएगा ये तो  वक्त ही बता पाएगा।

सुपर हिट ऑफ  द वीक
‘तुम्हे मेरी आवाज से बहुत परेशानी हैं तो सुन लो आज के बाद तुम मेरी आवाज नहीं सुनोगे’ श्रीमती जी ने श्रीमान जी से कहा
‘क्यों क्या तुम गूंगी होने वाली हो’ श्रीमान जी ने पूछा
‘नहीं मैं तुम्हे बहरा बनाने वाली हूँ’ श्रीमती जी ने उत्तर दिया।

हर बहन के खातें मेें आये 1500 रुपये

Jai Lok
Author: Jai Lok

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