
बड़ी बेंच को मामला भेजा जाए या नहीं, सरकार ने कहा- संविधान पीठ को भेजा जाए
नई दिल्ली (जयलोक)। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह तय करने संबंधी आदेश सुरक्षित रख लिया कि मामले को संविधान पीठ (बड़ी बेंच) के पास भेजा जाए या नहीं। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रखा।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने आग्रह किया कि मामला संविधान पीठ को भेजा जाए, क्योंकि इसमें संविधान के अनुच्छेद 324 की व्याख्या, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया तथा इस विषय पर कानून बनाने की संसद की विधायी शक्ति जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी कि अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ द्वारा दिया गया फैसला, जिसमें संसद द्वारा कानून बनने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की समिति के माध्यम से करने की अंतरिम व्यवस्था तय की गई थी, स्वयं कई संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि यदि यह माना जाए कि उस निर्णय ने पूरे क्षेत्र को अंतिम रूप से नियंत्रित कर दिया है, तो संसद के पास इस विषय पर कानून बनाने की शक्ति ही समाप्त हो जाएगी।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी मामले को बड़ी बेंच के समक्ष भेजने की आवश्यकता बताई। उनका कहना था कि अनूप बरनवाल का फैसला केवल अंतरिम व्यवस्था प्रदान करता था और उसमें यह अनिवार्य संवैधानिक सिद्धांत स्थापित नहीं किया गया था कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश का होना आवश्यक होगा। केंद्र सरकार ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाओं में ऐसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं, जिनमें यह शामिल है कि क्या अनुच्छेद 324 के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून को केवल इस आधार पर असंवैधानिक ठहराया जा सकता है कि चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश जैसे किसी बाहरी संवैधानिक पदाधिकारी को शामिल नहीं किया गया। साथ ही यह भी कि क्या अदालतें किसी कानून की समीक्षा करते समय कार्यपालिका के दुर्भावनापूर्ण आचरण या सत्ता के दुरुपयोग का पूर्वानुमान लगा सकती हैं।
केंद्र ने कहा कि किसी संवैधानिक अदालत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि प्रधानमंत्री या कार्यपालिका लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत कार्य करेगी।
Author: Jai Lok






