
नई दिल्ली (जयलोक)। भारत के चुनाव आयोग द्वारा जून 2025 में शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) प्रक्रिया इस समय देश भर में चर्चा और विवाद के केंद्र में है। मूल रूप से वोटर लिस्ट को शुद्ध और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस प्रक्रिया के तहत &0 रा’यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 1& करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और नागरिकों के मताधिकार को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई है। हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू आयोग के भीतर से ही निकलकर आ रहा है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर ही इस प्रक्रिया और इससे जुड़े फैसलों को लेकर भारी असंतोष है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं। आयोग के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व स्थिति मानी जा रही है, जहाँ शीर्ष अधिकारियों ने अपनी ही संस्था के आदेशों पर सवाल खड़े किए हैं। आपत्तियों का मुख्य केंद्र वे फैसले और दिशा-निर्देश हैं, जो दोनों आयुक्तों के अनुसार उनकी जानकारी या सहमति के बिना जारी किए गए। इन मुद्दों में नए वोटरों का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना या पुन: जोडऩा, अपीलीय प्रक्रियाएँ और पूरी डिजिटल वोटर लिस्ट की सुरक्षा एवं कस्टडी जैसे अति-संवेदनशील मामले शामिल हैं। एक लिखित शिकायत में आयुक्त संधू ने स्पष्ट रूप से कहा कि कुछ कदम दो आयुक्तों की लिखित सलाह के विपरीत उठाए गए, जो बिना अधिकार के और गैर-कानूनी थे। संस्था के भीतर इस अभूतपूर्व मतभेद और कार्यप्रणाली पर राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने आयोग की निष्पक्षता और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि सर्वसम्मति या बहुमत के बिना नियम दरकिनार कर निर्णय लिए गए हैं, तो इससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और स्वायत्तता पर गंभीर चोट पहुँचती है। इस पूरे घटनाक्रम ने देश की सबसे प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं में से एक की कार्यप्रणाली और आंतरिक पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
काम में मतभेद तो होते रहते हैं: विपक्ष के आरोपों पर चुनाव आयोग की सफाई, कहा- सभी फैसले मिलकर लेते हैं
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद वाले विपक्ष के आरोपों के बीच आयोग की ओर से सफाई सामने आई है। आयोग से जुड़े सूत्रों ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी के बीच किसी औपचारिक असहमति की बात को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि कामकाज के दौरान अधिकारी अपनी राय और सुझाव रखते हैं, लेकिन इसे आपसी टकराव या औपचारिक असहमति नहीं माना जाना चाहिए। आयोग के मुताबिक एसआईआर समेत उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्त मिलकर लेते हैं। विवाद इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद बढ़ा, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई। ये मामले नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने या जोडऩे और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े दूसरे फैसलों से संबंधित बताए गए।
तीनों चुनाव आयुक्तों के फैसलों को लेकर क्या सफाई दी गई?
चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक आयोग में किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान अलग-अलग सुझाव और टिप्पणियां सामने आना सामान्य कामकाजी प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतिम फैसले सभी सदस्यों की सहमति से लिए जाते हैं। आयोग ने इस दावे को भी खारिज किया कि एसआईआर से जुड़े फैसले किसी एक व्यक्ति ने लिए। आयोग का कहना है कि उसके फैसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के भी हस्ताक्षर होते हैं। इसी आधार पर आयोग ने कहा है कि एसआईआर और दूसरे मामलों में उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
Author: Jai Lok






