
,प्रशासन की चुप्पी संदेहास्पद ,अब छात्र आंदोलन सा डर नहीं दूध व्यवसायियों को , खुले में दूध बेचने और स्टोरेज पर रोक का अधिकार

रवीन्द्र दुबे
जबलपुर (जयलोक)। मध्य प्रदेश का सबसे महंगा दूध 80 रूपये लीटर जबलपुर में बिकने लगा है। प्रशासन एवं जनप्रतिनिधि इस मामले में मौन साधे हुए हैं। इससे पहले जबलपुर में दूध के दाम प्रति लीटर 73-76 थे। अब शहर में दूध 80 रुपए लीटर बिकने के पीछे पेट्रोल-डीजल, बिजली,खली चुनी और परिवहन महंगा होने के तर्क दिए जा रहे हैं। जबकि यह तर्क संगत नहीं है प्रदेश में सभी जगह एक सी दाम बढ़ोतरी होना थी। इस मामले में प्रशासन को कार्रवाई का पूरा अधिकार है लेकिन वह मौन है।
सब जगह 68 से 72 रुपए लीटर – मध्यप्रदेश में अमूल्य और मदर डेरी ने मई में ही 2 रुपए लीटर दूध दाम बढ़ाए थे इसके बाद दूध 68 से 72 रुपए लीटर बिक रहा है। जबकि इंदौर में 1 अक्टूबर से 3 रुपए लीटर दाम बढ़ाए जाने के बाद दाम 68 रुपए लीटर तक पहुंचे हैं। कहीं कहीं 70 रुपए लीटर तक खुले में बिक रहा है। भोपाल ग्वालियर में भी 68 से 70 रुपए लीटर दूध खुले में बिक रहा है।
नागपुर आपूर्ति सबसे बड़ी वजह – जबलपुर में दूध का उत्पादन प्रदेश के अन्य शहरों से ज्यादा है फिर भी मांग और पूतिज़् में अंतर है। जिसका कारण नागपुर को भी जबलपुर से ही दूध भेजा जा रहा है। आजकल जबलपुर के बड़े डेरी मालिक सीधे सीधे दूध नागपुर भेज रहे हैं, जहाँ मिठाई व अन्य उत्पाद बनाए जाने के ‘क्वालिटी मिल्क’ के ऊँचे दसम मिल रहे हैं।
दूध पर अब आंदोलन कम हुए – दूध के दाम को लेकर भी जबलपुर में राजनीति का इतिहास है। छात्र संघ चुनाव के दौर में पहले 50 पैसे या 1 रुपए लीटर दूध के दाम बढ़ जाने पर जबलपुर बंद तक कराए जाते थे। दूध व्यवसाय से जुड़े लोग बताते हैं कि यह प्रथा स्वर्गीय शरद यादव ने शुरू की थी। तब विपक्ष में रहते हुए पहले जनसंघ और बाद में जनता पार्टी के अनेक नेता आंदोलन में शामिल होते थे। स्वर्गीय ईश्वर दास रोहणी ने बहुत ज्यादा आंदोलन किए या समथज़्न दिया हैं। लेकिन अब जनहित से जुड़े मुद्दों पर यदाकदा ही छात्र आंदोलन हो रहे हैं।
कोर्ट भी पहुंचा था मामला – दूध के दाम निर्धारित करने के लिए भी न्यायलय की शरण जाने का इतिहास है। मामला जबलपुर हाईकोर्ट से होकर सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। 2003 में दूध के दाम 20 रुपए से घटाकर 18 रुपए लीटर कर दिया गया था। जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया था। कोर्ट ने दूध व्यवसाय से जुड़े लोगों की याचिका पर कहा था कि प्रशासन को दूध के दाम तय करने का अधिकार नहीं है।
मप्र हाईकोर्ट ने स्वयं बदला अपना आदेश – जबलपुर में जनहित याचिका दायर करने का रिकार्ड बनाने वाले डॉ.पीजी नाजपांडे ने सबसे पहले 2003 में दूध के बढ़ते और मनमाने दामों के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि आम जनता और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा के लिए सरकार दूध को ‘अति आवश्यक वस्तु’ मानकर इसके दाम तय करें। 2006 में हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि दूध इसमें शामिल नहीं है, लेकिन बाद में नए सिरे से दायर याचिका पर 7 जनवरी 2007 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया। कोर्ट ने माना कि दूध आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आता है और राज्य सरकार को निर्देश दिए कि वह इसके दाम निर्धारित व नियंत्रित करे ताकि डेयरी संचालक मनमर्जी से दाम न वसूल सकें।
सुप्रीम कोर्ट का स्टे और कानूनी लड़ाई- हाईकोर्ट के आदेश के बाद जब राज्य शासन ने दूध के दाम तय करने की कोशिश की और 18 रुपये प्रति लीटर निर्धारित किया गया, तो डेयरी संचालक इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए और वहां से स्टे (स्थगन आदेश) ले आए। इस स्टे की वजह से लंबे समय तक राज्य सरकार दूध के दामों पर व्यावहारिक नियंत्रण नहीं कर सकी और डेयरी संचालक स्वतंत्र रूप से कीमतें तय करते रहे।
फिर क्या है कार्रवाई के अधिकार – वर्तमान में, आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत केंद्र व राज्य सरकारें खाद्य सुरक्षा और कालाबाजारी रोकने के नियमों का उपयोग करती हैं, लेकिन दूध के रिटेल दाम मोटे तौर पर बाजार की मांग-आपूर्ति और को-ऑपरेटिव सोसायटियों तथा स्थानीय डेयरी संघों के समन्वय से ही तय हो रहे हैं।सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करके ही दूध और दुग्ध उत्पाद आदेश, 1992 को लागू किया था। इस आदेश का मुख्य उद्देश्य देश में दूध की आपूतिज़् को बनाए रखना, बढ़ाना और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना है। इसके तहत बड़ी मात्रा में दूध का कारोबार करने वाले प्रतिदिन 10,000 लीटर से अधिक दूध या सालाना 500 मीट्रिक टन मिल्क सॉलिड्स का प्रबंधन करने वाले डेयरी प्लांटों के लिए सरकार से पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया।
खाद्य सुरक्षा कानून के साथ जुड़ाव- साल 2006 में जब भारत में खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (एफएसएस एक्ट, 2006) लागू हुआ, तो आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आने वाले इस एमएमपीओ (1992) को रेगुलेटरी तौर पर एफएसएसएआई के नियमों के साथ समाहित कर दिया गया।
मार्च 2026 के नए दिशा निदेर्शों के अनुसार दूध में मिलावट रोकने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए सभी स्वतंत्र दूध उत्पादकों, डेयरी कंपनियों और घर-घर दूध पहुंचाने वाले विके्रताओं की निगरानी के अधिकार प्रशासन को हैं।
लाइसेंस और सीलबंद बिक्री अनिवार्य- मध्य प्रदेश सरकार ने निजी डेयरी क्षेत्र को विनियमित करने और मिलावट रोकने के लिए कुछ कड़े प्रशासनिक नियम लागू किए हैं। सहकारी समितियों (जैसे सांची) को छोडक़र, राज्य के सभी निजी दूध उत्पादकों, डेयरियों और विक्रेताओं के लिए सरकारी लाइसेंस और पंजीकरण लेना अनिवायज़् कर दिया गया है। जिसकी व्यापक जांच कराई जा सकती है। नए नियमों के तहत अब कोई भी डेयरी या दूधवाला खुले डिब्बे में नापकर दूध नहीं बेच सकता। दूध को केवल सीलबंद और उचित लेबल लगे पैकेट या बोतल में बेचना ही अनिवार्य है। इस नियम के उल्लंघन पर 3 लाख से 10 लाख रूपये तक के जुर्मानेे का प्रावधान है। दूध के परिवहन और भंडारण में उपयोग होने वाले बर्तनों या चिलिंग प्लांट की शुद्धता जांचने के अधिकार जिला प्रशासन को दिए गए हैं।
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