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जबलपुर से शुरू हुआ था झंडा सत्याग्रह : स्व.श्री अजित वर्मा द्वारा 22 फरवरी 1976 को प्रकाशित स्वतंत्रता आंदोलन में जबलपुर का योगदान ‘आहूति’ पुस्तक में प्रकाशित विवरण से साभार

जबलपुर से झण्डा आन्दोलन की शुरुआत हुई। अप्रेल 1923 से अगस्त तक राष्ट्रीय झंडे के प्रश्न पर कांग्रेस तथा नागपुर के स्थानीय प्राधिकारियों के बीच कृतनिश्चय एवं नाटकीय खींचतान ने संपूर्ण देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। वस्तुत: यह झण्डा आंदोलन सर्वप्रथम जबलपुर में प्रारंभ हुआ जबकि नगर पालिका के कांग्रेस सदस्यों ने नगरपालिका भवन पर राष्ट्रीय झंडा फहराने का निर्णय किया। गांधी जी के नेतृत्व में लड़ाई का कार्यक्रम प्रारम्भ करने के समय से ही कांग्रेस ने बीच में चरखायुक्त तिरंगे झंडे को राष्ट्र का प्रतीक स्वीकार कर लिया था । 18 मार्च 1923 को गाँधी दिवस को, जबलपुर नगरपालिका (अब गाँधी भवन) के भवन पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया । यूरोपियन डिप्टी कमिश्नर ने अत्यंत क्रुद्ध् होकर झंडे को उतारने का आदेश दिया और उत्साह के अतिरेक में पुलिस ने उसे न केवल उतारा ही अपितु उसे पैरों तले कुचला भी । इसके तत्काल बाद ही रोषयुक्त आंदोलन फूट पड़ा । जिला कांग्रेस समिति ने सत्याग्रह प्रारंभ किया और डिप्टी कमिश्नर के आदेशों का उल्लंघन करते हुए  पं. सुन्दरलाल, पं.बाल मुकुन्द त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान, बाबू नाथूराम मोदी और कुछ स्वयं सेवकों ने एक जुलूस निकाला। जुलूस पुलिस द्वारा रोक लिया गया और समस्त नेता बंदी बना लिए गए। इस पर नगर पालिका के समस्त सदस्यों ने विरोध स्वरूप एक साथ त्याग पत्र दे दिया। पण्डित सुन्दर लाल पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें छ: मास के कारावास के दण्ड से दण्डित किया गया। बिल्ले के रूप में एक छोटा झण्डा उनके पास से बलपूर्वक छीन लिया गया और उनके विरोध स्वरूप, मुकदमा चलाये जाने के पूर्व, उन्होंने 72 घण्टे का अनशन किया। जबलपुर के जिला अधिकारियों की अत्याचारपूर्ण कार्यवाही ने सम्पूर्ण प्रान्त में जनता को उत्तेजित कर दिया और नागपुर कांग्रेस समिति ने यह चुनौती स्वीकार की। कांग्रेस के अपरिवर्तनवादियों के पक्ष को, जिसका असहयोग नीति में दृढ़ विश्वास था, एक ऐसा लक्ष्य मिला जिसके लिए लडऩा श्रेयस्कर था। झण्डे का अपमान राष्ट्र का अपमान है। स्वतन्त्रता संग्राम के सैनिकों का यह कर्तव्य है कि वे उत्पीडऩ को वरण करके भी झण्डे को न झुकने दें। यह एक ऐसा प्रश्न था, जिसे लोकमानस शीघ्र ही ग्रहण कर लेता और जो संघर्ष का श्रेष्ठ प्रतीक था। यह निर्णय किया गया कि नागपुर को  संघर्ष का केन्द्र बनाया जाय और महाकौशल कांग्रेस समिति ने अपने नेताओं को नागपुर भेजा । जमनालाल बजाज ने आन्दोलन के संगठन का कार्य हाथ में लिया और सत्याग्रह प्रारम्भ करने के लिए जलियांवाला बाग की दु:खद घटना का वार्षिक दिवस 13 अप्रैल चुना गया। इस पर शासन ने भी इसी बीच प्रान्त में समस्त नगरपालिकाओं तथा जिला परिषदों को परिपत्र प्रचलित कर दिए। जिसमें उन्हें अपने-अपने भवनों पर राष्ट्रीय झण्डा न फहराने के आदेश दिए । लड़ाई अब तत्परता से प्रारंभ हो गई थी । नागपुर कांग्रेस समिति तथा महाकौशल कांग्रेस समिति ने संयुक्त रूप सें परामर्श करके चुनौती स्वीकार करने का निर्णय किया। पहली मई को जमनालाल बजाज और भगवानदीन के साथ स्वयं सेवकों का एक जत्था नगर से राष्ट्रीय झंडा लिये हुए आगे बढ़ा, किन्तु जब वह जिला न्यायालय पहुँचा तो पहले की ही भांति रोक दिया गया। छ:-छ: स्वयं सेवकों के जत्थे आगे बढ़े पर उन्हें नृशंसतापूर्वक पीटकर जेल ले जाया गया । संपूर्ण प्रांत में उत्तेजना अवितरत रूप से फैल गई, और इसी प्रकार  अन्य भागों में भी अभिरूचि जागृत हो गई। झुंड के झुंड स्वयं सेवक प्रत्येक जिले से नागपुर में आने लगे तीन सौ स्वयंसेवकों का एक जत्था बालाघाट से आया, छोटे-छोटे  जत्थे अन्य प्रत्येक जिले से आये। नरसिंहपुर डिप्टी कमिश्नर बोर्न ने स्वयं सेवकों का आगे नागपुर में आना रोकने के लिये बहुत कठिन प्रयत्न किया। उसने स्थानीय  नेताओं को बंदी बनाया और जिले के मालगुजारों तथा जमींदारों को बुलाकर यह कार्य सौंपा कि यहां से कोई  स्वयं सेवक जाने न पाए। किन्तु इस सबके होते हुए भी सेठ कन्हैयालाल  के नेतृत्व में एक जत्था नरसिंहपुर से आ ही गया। जबलपुर से एक बड़ा जत्था सुभद्रा कुमारी चौहान तथा उनके पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में  आया, दूसरा हालवे तथा अब्दुलगनी के अधीन सागर से आया। बैतूल से एक जत्था सेठ जेठमल  के नेतृत्व में आया। होशंगाबाद के बानपुरा नामक स्थान से ठाकुर अमरसिंह एक जत्था लाए। इस प्रकार थोड़े दिनों में ही लगभग एक हजार स्वयं सेवक नागपुर आए। आन्दोलन जोर पर था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का ध्यान भी, जिसकी बैठक मई के अंतिम सप्ताह में बम्बई में हो रही थी, नागपुर में चल रहे संघर्ष की ओर आकर्षित हुआ, और सी0 राजगोपालाचारी ने नागपुर में राष्ट्रीय झण्डे की रक्षार्थ मध्यप्रदेश के स्वयं सेवकों द्वारा किए गए सत्याग्रह पर बधाई देते हुए तथा संपूर्ण देश में समस्त सेवकों को आवश्यकता पडऩे पर संघर्ष में भाग लेने के लिए तैयार रहने,का आव्हान करते हुए एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया । उस वर्ष के कांग्रेस अध्यक्ष श्री अंसारी ने 18 जून 1923 को अखिल भारतीय झंडा दिवस मनाने हेतु समस्त प्रांतों का आव्हान किया और कहा कि नागपुर और मध्यप्रदेश ने हमारे राष्ट्रीय झंडे के सम्मान की रक्षार्थ एंक गौरवपूर्ण लड़ाई छेड़ दी है।  अब प्रश्न स्थानीय नहीं रहा है। अतएव प्रत्येक प्रांत को चाहिए कि वह स्वयं सेवक भरती करके तथा नागपुर में चल रहे झंंडा संघर्ष में सहायता देकर इसमें अपना अंशनदान करें। जबलपुर से शुरू हुए आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप मिला।

Jai Lok
Author: Jai Lok

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