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जीजा अस्थाई व्यवस्था, फूफा होना ही जीवन का स्थाई भाव…

(जय लोक)। फूफा हो जाना तो विधि का विधान है! सडक़ किनारे, फुटपाथ पर घटी दरों पर बिकती, पुरानी धुरानी, सैकेंड हैंड किताबें देखी हैं ना आपने, कुछ बुजुर्ग, अधेड़ औरतें, आदमी कभी कभी ठिठक कर रूक जाते हैं उसके सामने कुछ ढेर को टटोलते हैं, काम की चीज निकालने की कोशिश करते है, जो चीज कभी हजार की थी वो सौ पचास की हैसियत पा लेती है आमतौर पर ये ढेर ,बेशकीमती ज्ञान का भंडार जवान छोरे छोरियों द्वारा अनदेखा ही किया जाता है! फूफा होना ऐसा ही ढेर हो जाना है।
फूफा दरअसल ओल्ड एडीशन है जीजा का। जीजा जब पुराना पड़ जाता है तो फूफा हो जाता है! फूफा वह कच्चा आम बना रह जाना चाहता है जिसे देख कभी उसकी सालियों के मुँह मे पानी भर आया करता था, पर वो वक्त के हाथों पकता है, और अचार डालने जैसा भी नहीं बचता!
जीजा हारता है वक्त से, उसका बस चले तो वो घड़ी की सुइयों से लटक कर रोक ले उसे, पर इतिहास गवाह है कोई जीजा आज तक कर नही पाया है ऐसा। अपनी खुद की कमर पर ही बस नही चलता उसका। वो लाख कोशिश करता है वो चौतीस से अडतीस के खतरे के निशान पर जा पहुँचती है, उसका अपना पेट उसे अपने घुटने देखने से रोक देता है, सर की लहलहाती फसल उजड़ चुकी होती है अब बिना चश्मे के सालियों को पहचानना कठिन हो चलता है और ससुराल की सीढियाँ चढऩे मे घुटने भी अनमने होने लगते हैं।
वैसे भी फूफा हो जाना तन से ज्यादा मन का दुख है, मन अटका होता है जीजा होने में और तन फूफा हो चुका होता है! ऐसे मे यदि बंदे के पास धन हो तब थोड़ी सी और मोहलत मिल जाती है। धन उसे फूफा की अधोगति में पडऩे के पहले जीजा की योनि में बने रहने के लिये कुछ और फालतू साल दिला देने मे मदद करता है।
ससुराल ऐसी जगह होती हंै जहाँ जाना ही होता है आदमी को। ये वो जगह है जहाँ जीजा रहते आदमी उछल-उछल कर जाता है जाने के बहाने तलाश करता है, पर फूफा होते ही ये सब बदल जाता है बचता है वो ससुराल जाने से। फूफा होने के बाद ससुराल जाना, रिटायरमेंट के बाद उस ऑफिस की सीढिय़ाँ चढऩे जैसा है जहाँ कभी आप बॉस रह चुके हों।
फूफा हो चुके आदमी को ससुराल मे होते हुये गौर से देखियेगा अगली बार फूफा होने के बाद ससुराल में बंदा लालकिले में कैद शाहजहाँ टाईप की चीज हो जाता है।  ताजमहल उसकी पहुँच से दूर होता है अब वो अपने सिंहासन पर किसी ताजा ताजा जवान हुये लडक़े को देख बैचैन होता है, सोफे पर करवटें बदलता है, किसी बात की शिकायत आमतौर पर करता नहीं! करता है तो आवाज में दम नही होती।
फूफा हो जाना ‘सूरज से प्लूटो’ हो जाना है! वो ससुराल के सौरमंडल में होता तो जरूर है पर उसे गिना नहीं जाता ,वो ससुरालियों की कुंडली मे होता तो है पर किसी का कुछ बना बिगाड़ नहीं पाता सो अनदेखा होता है वो इस अनदेखी पर भुनभुनाता तो है पर उसे मन ही मन करना होता है ऐसा।
ये सब लिखा क्यो हैं मैनें? वास्तव में ये तो सलाह है उन्हें जो फिलहाल जीजा हैं  जीजा हैं तो ज्यादा फुदकिये मत, जीजा होना तो अस्थायी व्यवस्था है, फूफा होना ही जीवन का स्थायी भाव है! अपने आपको फूफा होने के लिये अभी से तैयार करें इसी में सार है और यदि फूफा हो ही चुके हैं आप तो धीरज बनाये रखें, हौसला रखें,  समझायें खुद को, ये तो होना ही था एक ना एक दिन। चुप रहने की आदत डाल लें और जब किसी सभा समारोह मे बतौर मार्गदर्शक मंडल तीसरी लाईन में खिसका दिये जायें तो बुरा ना मानें! समय किसी का सगा नही होता! फूफा का तो हरगिज नही!

ऊपर नीचे होते सोना चांदी
अब आदमी किस पर भरोसा करे और किस पर ना करे, हाल तो ये है कि अपने लोगों पर भी भरोसा उठ चुका है। नेताओं पर उनके कर्मों के कारण लोगों ने भरोसा करना बंद कर दिया है, क्योंकि वे कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। पॉलीटिकल पार्टी पर भी भरोसा बचा नहीं है और अब तो ‘सोना चांदी’ पर भी भरोसा करना बड़ा कठिन हो गया है। एक जमाना था जब लोग बाग कहते थे कि सोना खरीद लो संकट के वक्त काम आएगा, चांदी खरीद लो जब कभी बुरा वक्त आएगा तो चांदी बेचकर अपना गुजारा कर लेना। लेकिन लगता है कि दुनिया जिस ढंग से चल रही है उसी ढंग से सोना और चांदी भी उसी रंग में रंग गए हैं, कब गिर जाए कब ऊपर उड़ जाए कोई नहीं जानता यहां तक कि जो अपने आप को शेयर मार्केट का या सोने चांदी के उस्ताद  मानते हैं वे भी नहीं जानते कि कब सोने का भाव ऊपर हो जाएगा और चांदी जमीन पर आ जाएगी। कुछ दिन पहले चांदी ने ऐसी छलांग लगाई जिसको देखकर बंदरों ने भी अपने दांतों तले उंगली दबा ली कि इतनी बड़ी बड़ी छलांग तो वे भी नहीं लगा सकते। देखते-देखते चार लाख के पास पहुंच गई चांदी। भाव बढ़ रहे थे तो लोगों ने धकापेल चांदी की खरीद शुरू कर दी और फिर एक हफ्ते में चांदी ने उनकी लुटिया डुबो दी और एक ही झटके में दो लाख पर वापस आ गई, अब जिन लोगों ने ज्यादा दामों में चांदी खरीदी थी वे चांदी पर सर रखकर रो रहे हैं जार जार आंसू बहा रहे हैं कि अब क्या पता कब ये चांदी चार लाख जाएगी, यही हाल सोने का है फिर भी सोने पर थोड़ा बहुत भरोसा किया जा सकता है अपना तो लोगों से यही कहना है कि भैया जब इंसान का इंसान पर से भरोसा उठ गया है तो फिर सोना चांदी पर भरोसा काहे को करते हो, लेकिन कहते हैं ना ‘लालच बुरी बला’ सब कुछ देखने के बाद भी लोगबाग सोना चांदी खरीदने में लगे हैं जब नुकसान होता है तो सोना चांदी को गाली देते हैं और जब फायदा होता है तो अपनी बुद्धिमत्ता को।

खैरात ही तो है वोट बैंक
‘स्टेट बैंक ऑफ़  इंडिया’ की एक शोध रिपोर्ट में यह कहा गया है कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा ‘फ्रीबीज’ जैसी योजनाएं जो खैरात के रूप में दी जा रही हैं उससे देश का विकास रुक रहा है इसकी वजह रोजगार की कल्याणकारी योजनाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, अब स्टेट बैंक के इन शोधकर्ताओंं को कौन बताएं कि भैया राजनीतिक पार्टियों का एकमात्र उद्देश्य होता है सत्ता में आना और सत्ता में आने का जो रास्ता मुफ्त खोरी से जाता है वो सबसे आसान रास्ता है। ‘पैसा फेंको तमाशा देखो’ ये तो एक पुराना गीत भी है, अब देखो ना मध्य प्रदेश में लाडली बहना योजना शुरू हुई और भाजपा के पक्ष में ऐसे वोट गिरे कि कांग्रेस की लाइ लुट गई, फिर बिहार में दस दस हजार रुपए लोगों के खाते में डाल दिए गए वहां भी भाजपा की जय जयकार हो गई, बेचारे दूसरे दल हाशिये पर चले गए, अब जब ऐसा फायदा फ्रीबीज से होता है तो कौन सा राजनीतिक दल है और कौन सी सरकार ऐसी है जो उसका उपभोग नहीं करेगी। दूसरी बात फिर पैसा तो अपनी जेब से जाता नहीं है ,सरकारी पैसा है ‘लुटाओ और वोट पाओ’ इधर सुप्रीम कोर्ट भी इस पर कड़ी टिप्पणी कर चुका है लेकिन उससे फर्क क्या पडऩे वाला है। जो रास्ता दिखा दिया गया है पॉलिटिकल पार्टियों को वे उसी रास्ते पर चलेंगे क्योंकि उन्हें तो सत्ता में आना है और सत्ता में आने का सबसे आसान तरीका अब यही लगने लगा है, रोजगार, भ्रष्टाचार आम आदमी की समस्याएं इन सबसे कोई सत्ता में नहीं आता। सत्ता में आता है नोट बांटने से और यह बात सिद्ध भी हो चुकी है और जो बात सिद्ध हो चुकी है तो उससे फिर पीछा कोई भी पॉलीटिकल पार्टी क्यों छुड़ाएगी। अपना भी मानना है कि ‘कर्ज लो और घी पीओ’ इसी में फायदा है और सारे प्रदेश यही करने में जुटे हुए हैं।

सुपर हिट ऑफ  द वीक
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‘रक्षाबंधन हो गया है अब लेने आ जाओ’
‘अरे इतनी जल्दी क्या है पंद्रह अगस्त तक छुट्टी है, दो चार दिन और रह लो’ श्रीमानजी ने कहा।
‘ज्यादा होशियार मत बनो देश आजाद हुआ है तुम नहीं’ श्रीमती जी ने उत्तर दिया।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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