
चैतन्य भट्ट
जबलपुर (जय लोक)। यूं तो कहने को शहर में दस से बारह छोटे-बड़े ऑडिटोरियम और सामुदायिक भवन हैं। मगर प्रतिष्ठित या यूं कहें कि जिनमें राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम हो सकते हैं, तीन ही कहे जाएंगे। घंटाघर के पास स्थित स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा बनाया गया शहर का सबसे नया लग्जरी ऑडिटोरियम , शहर के मध्य स्थित ‘मानस भवन’ और मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी के स्वामित्व वाला ‘तरंग ऑडिटोरियम’। गोलबाजार स्थित ‘शहीद स्मारक’ का सभा भवन भी अपने सांस्कृतिक आयोजनों के लिए जाना जाता है।
इनमें तरंग ऑडिटोरियम का एक प्रमुख स्थान है। सन 1993 में तकरीबन साढ़े चार हजार स्क्वायर फीट में निर्मित इस सुव्यवस्थित ऑडिटोरियम में स्वर्गीय पंडित जसराज, जगजीत सिंह जैसे विश्व विख्यात कलाकारों ने प्रस्तुतियां दी हैं और सराहा है। अपनी सुंदर वास्तु कला, वातानुकूलन, ध्वनि विज्ञान की विशेषता, प्राकृतिक वातावरण और पार्किंग की समुचित व्यवस्था जैसी विशेषताओं के कारण इसे शहर ही नहीं पूरे देश में जाना जाता है।

लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले दिनों इसी तरंग आडिटोरियम की प्रतिष्ठा पर गहरा दाग लग गया उसके बाद से तरंग आडिटोरियम में भविष्य में होने वाले सार्वजनिक कार्यक्रमों पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। हुआ यूं कि प्रख्यात कलाकार आशुतोष राणा के बेहद लोकप्रिय शो ‘हमारे राम’ के मंचन के दौरान तरंग के एक हिस्से में बिजली के शार्ट सर्किट होने से आग लगने की घटना हुई चौतरफा अंधेरा छा गया। इस दौरान तरंग आडिटोरियम में लगभग पांच सौ से भी ज्यादा दर्शक बैठे थे। बिजली गायब होते और आग की जानकारी लगते ही अफऱा-तफऱी मच गई। कलाकार और खचा-खच भरे हाल से दर्शक किसी तरह टार्च की रोशनी में बाहर निकले। यह घटना एक बड़ी त्रासदी में भी बदल सकती थी, यदि उस वक्त भगदड़ मच जाती, अँधेरे में भगदड़ के दौरान न जाने कितने लोग कुचल जाते, बच्चे बूढ़े महिलाएं सभी उस दौरान हाल के भीतर मौजूद थे, इस घटना का कितना भयावह परिणाम हो सकता था इस बात की कल्पना कर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सवाल ये है कि समूचे प्रदेश की विद्युत सप्लाई और सुरक्षा का भार संभालने वाली विद्युत कंपनियों के अपने आडिटोरियम की विद्युत व्यवस्था में हुई ये चूक कैसे हो गई और वो भी उस वक्त जब उस आडिटोरियम में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित होने वाला था। जाहिर है कि तरंग के रखरखाव पर किसी का कोई ना तो ध्यान है और ना ही किसी की जिम्मेदारी तय की जा रही है। दुर्घटना के दौरान आग बुझाने के समुचित उपायों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि तमाम अग्नि सुरक्षा उपकरण तक भी सीमित संख्या में थे जो सामान्यत: आपातकालीन स्थितियों में अक्सर छोटी आग लगने की घटनाओ में ही नियन्त्रण के लिए ही उपयोगी साबित होते हैं। लेकिन इतने बड़े और इतने विख्यात आडिटोरियम में अग्नि शमन के लिए केंद्रित व्यवस्था न होना चिंता का विषय है।

तरंग आडिटोरियम एक पुराने तालाब ‘पांडुताल’ के किनारे बना हुआ है। इस तालाब के सौंदर्यीकरण के लिए तत्कालीन मध्यप्रदेश विद्युत मंडल ने विशेष प्रयास किए थे जिसके फलस्वरूप इसमें पानी की समुचित उपलब्धता रहती है। ऐसे में तरंग में केंद्रित अग्नि शमन व्यवस्था न होना नदी किनारे प्यासे होने जैसी स्थिति है।
माना कि आडिटोरियम जैसी जनसुविधा विद्युत कंपनियों की मूल जिम्मेदारियों में नहीं आती। मगर ऐसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधा अगर पूर्ववर्ती मंडल द्वारा उपलब्ध कराई ही गई है तो उसका समुचित संचालन संधारण भी होना चाहिए। ध्वनि विज्ञान की आवश्यकताओं के चलते इस आडिटोरियम की छत सामान्य सीमेंट कांक्रीट नहीं बल्कि ‘स्क्रीडिंग’ की तकनीक से निर्मित की गई थी और किसी भी प्रकार का अतिरिक्त भार उठाने के लिए डिजाइन नहीं की गई थी। लेकिन कुछ समय पहले जिम्मेदारों ने बिना सोचे समझे सोलर ऊर्जा के प्रसार के चलते शक्ति भवन परिसर के विभिन्न ब्लाकों के साथ साथ इस आडिटोरियम की छत पर भी भारी भरकम सोलर पैनल लगाने की योजना बना ली थी। कहा जाता है कि ऐसी सूचना मिलने पर इसके निर्माण से जुड़े रहे सेवानिवृत्त अफसरों द्वारा प्रबंधन को सचेत किया गया जिससे यह प्रस्ताव टाल दिया गया।
अपने वास्तुशिल्प और अन्य सुविधाओं के लिए विख्यात तरंग आडिटोरियम शहर की एक बेहद महत्वपूर्ण धरोहर है और इसके उचित संचालन संधारण के लिए धन और अन्य संसाधनों की कमी का कोई भी बहाना स्वीकार्य नहीं है। जरूरत तो इस बात की है कि तीस मई की शाम को हुई इस घटना की उच्चस्तरीय जांच की जाए और जो भी इसके लिए जिम्मेदार हो उसे कड़ी सजा दी जाए। इसे ईश्वर की अनुकम्पा ही कहा जाएगा कि कोई जनहानि नहीं हो पाई वरना भगदड़ में कितने लोगों की जान जा सकती थी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।


Author: Jai Lok






