
मूर्तिकारों को उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी मिले आर्डर
जबलपुर (जय लोक)। जबलपुर शहर का दशहरा पर्व प्रदेश ही नहीं पूरे देशभर में अपनी विशेष पहचान बना चुका है। जबलपुर में निर्मित होने वाली दुर्गा प्रतिमाओं को भी अब विशेष पहचान मिल रही है। देश के मध्य प्रदेश के अलावा देश सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी जबलपुर के मूर्तिकारों को मूर्ति बनाने के आर्डर मिल रहे हैं। जबलपुर के मूर्तिकारों को प्रदेश के अन्य शहरों से भी मूर्ति बनाने आर्डर मिलते हैं। जबलपुर संभाग के तो प्राय: सभी जिलों में जबलपुर से ही दुर्गा प्रतिमाएं मंगाई जाती हैं। यह शहर के मूर्तिकारों के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
शारदीय नवरात्र के करीब आते ही संस्कारधानी में आस्था के साथ-साथ पारंपरिक मूर्तिकला का रंग भी गहराने लगा है। शहर की विभिन्न मूर्ति निर्माण कार्यशालाओं में इन दिनों दिन-रात मिट्टी से देवी प्रतिमाओं को आकार देने का काम चल रहा है। हाथों की कारीगरी, चेहरे की भाव-भंगिमा और बारीक सजावट के लिए पहचान बना चुके जबलपुर के मूर्तिकारों की प्रतिमाओं की मांग मध्य प्रदेश के अलावा अब उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक बनी हुई है।
नवरात्र के लिए शहर में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों के साथ महिषासुर मर्दिनी, भव्य दरबारी स्वरूप और मां काली की प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं। बाहर के जिलों से उत्सव समितियों के पदाधिकारी पहले ही प्रतिमाओं की बुकिंग करा चुके हैं। अब समितियां अपने वाहनों के साथ प्रतिमाएं लेने जबलपुर पहुंच रही हैं।
सतना से रायपुर तक पहुंच रही जबलपुर की प्रतिमाएं
जबलपुर की मूर्तियों की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सतना, रीवा, अशोकनगर, नर्मदापुरम, रायपुर, बांदा, नरसिंहपुर, गाडरवारा, करेली, गोटेगांव, कटनी, दुर्ग, भिलाई, गुना, मुंगावली, सिवनी और शहडोल सहित कई शहरों से समितियां प्रतिमाएं लेने शहर पहुंच रही हैं। कई समितियां महीनों पहले ही अपनी पसंद के स्वरूप, आकार और डिजाइन के अनुसार प्रतिमाओं की बुकिंग करा देती हैं। इसके बाद मूर्तिकार उसी अनुरूप प्रतिमा को तैयार करते हैं। नवरात्र नजदीक आने के साथ अब कार्यशालाओं में मूर्तियों के निर्माण का अंतिम चरण का काम तेजी से चल रहा है।
हाथों की नक्काशी से उभर रही देवी की मुखाकृति
जबलपुर की मूर्तिकला की खासियत यहां की पारंपरिक कारीगरी मानी जाती है। कलाकार मिट्टी को आकार देने से लेकर देवी की मुखाकृति तैयार करने तक कई काम हाथों से करते हैं। प्रतिमा के चेहरे पर भाव, आंखों की चमक, होंठों की बनावट और चेहरे की बारीकियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मुकुट, आभूषण, वस्त्र और अन्य सजावटी हिस्सों में भी बारीक हाथ की कारीगरी देखने को मिलती है। प्राकृतिक मिट्टी से तैयार प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने के बाद विशेष रंगों और सजावटी सामग्री से सजाया जा रहा है।
कई दशकों से चली आ रही परंपरा
जबलपुर में देवी प्रतिमा निर्माण की कला नई नहीं है। कई परिवार पीढिय़ों से इस काम से जुड़े हुए हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही तकनीकों और अनुभव के कारण यहां के मूर्तिकार अलग-अलग आकार और स्वरूप की प्रतिमाएं तैयार करने में दक्ष हैं। मूर्तिकारों के लिए नवरात्र का सीजन साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। यही वजह है कि समय पर ऑर्डर पूरा करने के लिए कार्यशालाओं में कारीगर रात दिन लगातार काम कर रहे हैं।
महिषासुर से मां काली तक अलग-अलग स्वरूप
इस बार नवरात्र पंडालों में अलग-अलग थीम और स्वरूपों की प्रतिमाएं देखने को मिलेंगी। कहीं मां दुर्गा को महिषासुर का वध करते हुए दर्शाया जा रहा है, तो कहीं भव्य दरबारी स्वरूप तैयार किया जा रहा है। कई समितियों ने मां काली की रौद्र और भव्य प्रतिमाओं के ऑर्डर भी दिए हैं। पंडाल निर्माण का काम भी तेजी पकड़ चुका है। प्रतिमाओं के साथ पंडालों की सजावट और झांकियों को अंतिम रूप देने की तैयारियां भी चल रही हैं।
मिट्टी, बांस और रंगों के बीच आकार ले रही आस्था
नवरात्र से पहले जबलपुर की मूर्ति निर्माण कार्यशालाओं का दृश्य अपने आप में अलग दिखाई दे रहा है। कहीं मिट्टी को आकार दिया जा रहा है, कहीं बांस से ढांचा तैयार हो रहा है और कहीं देवी प्रतिमाओं में रंग भरे जा रहे हैं। कारीगरों के हाथों से तैयार होती इन प्रतिमाओं के साथ न केवल धार्मिक आस्था जुड़ी है, बल्कि जबलपुर की पारंपरिक शिल्पकला की पहचान भी जुड़ी हुई है। नवरात्र शुरू होने से पहले शहर से तैयार होकर निकलने वाली ये प्रतिमाएं अब मध्य प्रदेश के साथ पड़ोसी राज्यों के अलग-अलग शहरों में भी पहुंचना शुरू हो चुकी हैं।

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Author: Jai Lok






