
जबलपुर, (जय लोक)। प्रदेश में नगरीय निकायों के चुनाव के लिए अब एक वर्ष से कम समय बचा है। प्रदेश की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए ये चुनाव अग्रिपरीक्षा साबित होने वाले हैं। क्योंकि इन चुनावों के ठीक एक वर्ष बाद विधानसभा के चुनाव भी होने जा रहे हैं।
मध्यप्रदेश भाजपा में जिलाध्यक्षों के कामकाज और संगठनात्मक पकड़ को लेकर लगातार समीक्षा का दौर चल रहा है। महाकौशल तथा इसके मुख्यालय जबलपुर में भी भाजपा संगठन विशेष रूप से अपना ध्यान केन्द्रित कर रहा है।
प्रदेश नेतृत्व द्वारा संगठन में कार्य कुशलता, बूथ स्तर की सक्रियता और कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय को पैमाना बनाया गया है। नगरीय निकाय चुनाव को लेकर स्थानीय नेताओं और दावेदारों की सक्रियता बढ़ा दी है।

निकाय चुनाव सबसे बड़ी परीक्षा
जबलपुर में नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी पहले ही तेज हो चुकी है। माना जा रहा है कि चुनाव में करीब 9-10 महीने का समय शेष है और यदि कार्यक्रम तय समय पर रहा तो जून-जुलाई तक नई नगर सरकार का गठन हो सकता है। ऐसे में भाजपा के लिए संगठनात्मक मजबूती बेहद महत्वपूर्ण होगी। शहर की राजनीति में महापौर पद के संभावित आरक्षण से भी समीकरण बदलने की संभावना है। पार्टी को केवल प्रत्याशी चयन ही नहीं, बल्कि वार्ड स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता, बूथ प्रबंधन और विभिन्न गुटों के बीच समन्वय की चुनौती से भी निपटना होगा।

जबलपुर में नेताओं का प्रभाव
भाजपा का जबलपुर संगठन लंबे समय से प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यहां कई वरिष्ठ नेता और जनप्रतिनिधि अपनी अलग राजनीतिक पकड़ रखते हैं। स्थानीय स्तर पर पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रहेगी कि वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव और जमीनी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। ऐसे में संगठनात्मक नियुक्तियों और फैसलों में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। यदि प्रदेश भाजपा से यह संदेश दिया जाता है कि अब संगठनात्मक जिम्मेदारियों में केवल किसी प्रभावशाली नेता की पसंद नहीं, बल्कि जमीनी कामकाज और संगठनात्मक प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाएगी, तो इसका असर जबलपुर की आगामी नियुक्तियों और राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।


क्या होगी संगठन में नई सर्जरी…?
प्रदेश संगठन की नई कार्यशैली का असर यहां भी दिखाई देना तय माना जा रहा है। निकाय चुनाव से पहले संगठन की मजबूती, वार्ड स्तर की रणनीति और नेताओं-कार्यकर्ताओंं के बीच समन्वय ही स्थानीय भाजपा नेतृत्व की असली परीक्षा होगी। अब नजर इस बात पर रहेगी कि भाजपा में आगामी नियुक्तियों और चुनावी तैयारियों का आधार किसे बनाया जाता है वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक पसंद को या फिर जमीन पर काम करने वाले संगठनात्मक चेहरों की कार्य कुशलता को।
Author: Jai Lok






