
जबलपुर (जयलोक)। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध, आर्थिक अस्थिरता एवं कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, तब देश के प्रधानमंत्री द्वारा पेट्रोल-डीजल की बचत तथा अनावश्यक स्वर्ण खरीद से बचने की अपील को केवल एक सामान्य सलाह मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे गहरा आर्थिक एवं राष्ट्रीय हित निहित है। भारत आज भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग विदेशों से आयात करता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढऩे का सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था, महँगाई, परिवहन लागत तथा आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। यदि देश में ईंधन की अनावश्यक खपत कम होती है, तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी तथा आर्थिक दबाव भी कम होगा। यही कारण है कि विकसित राष्ट्र भी संकट के समय ऊर्जा संरक्षण को राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में अपनाते हैं। इसी प्रकार भारत विश्व के सबसे बड़े स्वर्ण आयातक देशों में शामिल है।

अत्यधिक सोना खरीदने से देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। स्वर्ण व्यक्तिगत सुरक्षा एवं निवेश का माध्यम हो सकता है, किंतु अत्याधिक आयात से व्यापार घाटा बढ़ता है तथा रुपये पर दबाव आता है। इसलिए कठिन वैश्विक परिस्थितियों में संयमित उपभोग की भावना राष्ट्रहित में मानी जाती है।


यह भी सत्य है कि केवल जनता से त्याग की अपेक्षा पर्याप्त नहीं है, शासन एवं प्रशासन को भी सादगी, व्यय नियंत्रण तथा संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। जब सरकार और समाज दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तभी आर्थिक स्थिरता मजबूत होती है। आज आवश्यकता केवल आलोचना की नहीं, बल्कि जागरूक सहभागिता की है। यदि प्रत्येक नागरिक थोड़ी-सी ईंधन बचत करे, अनावश्यक उपभोग से बचे तथा देशहित को प्राथमिकता दे, तो इसका सामूहिक प्रभाव अत्यंत सकारात्मक हो सकता है।
राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों से नहीं, बल्कि नागरिकों की आर्थिक अनुशासन एवं सामाजिक जिम्मेदारी से भी होता है। अत: वर्तमान परिस्थितियों में पेट्रोल बचत एवं स्वर्ण खरीद में संयम की अपील को व्यापक राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से समझना चाहिए।
निसर्ग रिसॉर्ट की लापरवाही से युवक को लगा करंट, पुलिस करेगी दोषियों पर कार्रवाही
Author: Jai Lok






