
नई दिल्ली। भारतीय सेना ने 1000 किलोमीटर तक की लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम, अत्याधुनिक स्वदेशी वन-वे अटैक ड्रोन खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। इन ड्रोनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर आधारित सटीक निशाना लगाने की क्षमता होगी और ये जीपीएस-रहित वातावरण में भी काम कर सकते है। लॉन्ग रेंज लोइटर म्यूनिशन (एलआरएलएम) परियोजना के तहत यह खरीद रक्षा अधिग्रहण नीति के मेक टू क्लॉज के अंतर्गत की जा रही है। इस क्लॉज के तहत, उद्योगों को अनुसंधान और विकास का खर्च स्वयं उठाना होता है और तकनीकी मानदंड पूरे होने पर सेना इन्हें खरीदने का वादा करती है। हालांकि, इनकी संख्या अभी तय नहीं हुई है, पर सेना को विभिन्न रेंज वाले हजारों इस तरह के ड्रोनों की आवश्यकता है।
सेना विशेष रूप से इसतरह ड्रोन सिस्टम की तलाश में है जो 50 मीटर के घातक दायरे के लिए 25 किलोग्राम का वॉरहेड ले जा सकें। इन ड्रोनों को 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर उड़ान भरने और कम से कम 400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल करने में सक्षम होना चाहिए। इन्हें मैदानी इलाकों, रेगिस्तान, घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों सहित सभी प्रकार के भूभागों में सैन्य मानकों के अनुरूप मजबूत और प्रभावी ढंग से काम करने के लिए डिज़ाइन होना अनिवार्य है।
यह खरीद रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी द्वारा शुरू की गई है, जो पहले से ही कम दूरी वाले वन-वे अटैक ड्रोन भी खरीद रही है। रिपोर्ट के अनुसार, 100 किलोमीटर से अधिक दूर के लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम 850 ड्रोन खरीदने के लिए हाल ही में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और निबे डिफेंस को शॉर्टलिस्ट किया गया है। एलआरएलएम कार्यक्रम के तहत, सरकार लंबी दूरी वाले वन-वे अटैक ड्रोनों के संचालन के लिए एक पूर्ण इकोसिस्टम बनाना चाहती है। इसमें लांच व्हीकल, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन, सिम्युलेटर और प्रत्येक सेट में 15 एरियल व्हीकल शामिल होने है। इन ड्रोनों को रूस-यूक्रेन युद्ध में दिखाए गए सिस्टम की तरह, खड़ी ढलान, तिरछी ढलान और ज़मीन के बहुत करीब उडक़र टारगेट पर हमला करने में सक्षम होना होगा। वे थर्मोबेरिक और गहरे पैठ वाले (डीप पेनिट्रेशन) सहित विभिन्न प्रकार के वॉरहेड ले जाने में भी सक्षम होगा। सेना यह सुनिश्चित करने पर जोर दे रही है कि इन ड्रोनों के इंजन, इलेक्ट्रो-ऑप्टिक पेलोड, एवियोनिक्स, मेनफ्रेम, वॉरहेड और अन्य प्रमुख घटक स्वदेशी हों या समय के साथ देश में ही विकसित किए जा सकें।
Author: Jai Lok






