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मदहोश विभाग का मदहोश आदेश बना किरकिरी

सोम डिस्टिलरीज लायसेंस निलंबन मामले में सांसद तन्खा ने उठाए गंभीर सवाल

जबलपुर (जय लोक)। मदहोश विभाग के मदहोश अधिकारियों ने नकली शराब और अवैध शराब परिवहन के मामलें में सोम डिस्टिलरीज के कर्ताधर्ताओं को दो साल तक अभयदान दिया। इसमें जबलपुर में पदस्थ सहायक आबकारी आयुक्त भी विवादों और जांच के घेरे में हैं। बताया गया है कि इस मामलें में आरोपियों को सजा होने के बाद हाईकोर्ट में अपील की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट के न्यायाधीश विशाल मिश्रा ने खुद को केस से अलग करते हुए मामला दूसरी बेंच को भेज दिया।

दरअसल मामला दो साल पुराना है। सोम डिस्टिलरीज पर आरोप था कि उनका दो साल पहले अवैध शराब परिवहन करते एक ट्रक पकड़ा गया था। इस मामलें में बनाए गए अभियुक्तों को सेशन कोर्ट से सजा भी हो गई। आश्चर्य की बात यह कि इतना सब होने के बाद सोम डिस्टिलरीज का लायसेंस रिन्यू होता रहा। इस पर सीनियर विधिवेता और राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी और उन्होंने लिखा कि आबकारी आयुक्त अभिजीत अग्रवाल (आईएएस)  ने सोम डिस्टिलरीज को फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर ढील दी गई। यह ढील थी या डील इस पर मुख्य सचिव संज्ञान लें। मुख्य सचिव के संज्ञान लेने के बाद मामले में नया मोड़ आया  और आबकारी आयुक्त पद से श्री अग्रवाल को हटा दिया गया। उसके पूर्व सोम डिस्टिलरीज का लायसेंस निलंबित करने पर तन्खा ने ट्वीट किया। उन्होंने कहा कि यह लापरवाही है या आदेश को जानबूझकर कमजोर किया गया। आबकारी आयुक्त द्वारा सोम कंपनी को नोटिस देने के बाद दो वर्ष तक मामले को क्यों दबाकर रखा गया, और अचानक  ऐसी क्या मजबूरी रही कि लायसेंस निलंबित किया गया। क्या कुबेर को कोठी से पोषण सप्लाई बंद होने के बाद निर्णय लिया गया। इसके बाद सीएम ने संज्ञान लिया और श्री अग्रवाल को आबकारी आयुक्त पद से हटा दिया गया। इस मामलें में आश्चर्य की बात यह है कि वर्तमान में जबलपुर में पदस्थ सहायक आबकारी आयुक्त संजीव दुबे उस वक्त अपनी निलंबन अवधि के दौरान सेंट्रल आफिस में पदस्थ थे और 2024 में उन्हीं के द्वारा सोम डिस्टिलरीज को शोकॉज नोटिस जारी किया गया था और दो साल बाद तक कार्रवाई ठप्प रही। सेशन कोर्ट से सजा पडऩे के बाद 4 फरवरी को सोम डिस्टिलरीज का लायसेंस दो साल बाद निलंबित किया गया। इसमें विलंब का कारण बताया गया कि महाधिवक्ता कार्यालय से अभिमत मांगा गया था लेकिन अभिमत नहीं मिलने के बाद  आदेश में विलंब हुआ, इस पर भी  श्री तन्खा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार को राय देना महाधिवक्ता का संवैधानिक दायित्व है। यद्यपि इसको आदेश का हिस्सा बनाया जाता है तो कोर्ट में एजी इस मामलें की पैरवी कैसे करेंगे। विभाग ने लगभग दो साल तक कार्रवाई नहीं की केवल अभिमत का इंतजार किया, यह कानूनी और प्रशासनिक दृष्टि से गंभीर लापरवाही है।

इस मामले में तन्खा ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि महाधिवक्ता का हवाला देकर आदेश जारी नहीं करना था। बहरहाल इस मामलें में उस वक्त नया मोड़ आ गया जब 6 फरवरी को हाईकोर्ट के जज विशाल मिश्रा ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर दिया और मामला दूसरी बेंच को भेज दिया। आबकारी इतिहास की यह पहली और सबसे बड़ी घटना है।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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