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Home » दुनिया » काशी के इस मंदिर में भगवान हुए बीमार, अब 15 दिन लगेगा काढ़े का विशेष भोग, मंदिर में 200 सालों से चली आ रही ये परपंरा

काशी के इस मंदिर में भगवान हुए बीमार, अब 15 दिन लगेगा काढ़े का विशेष भोग, मंदिर में 200 सालों से चली आ रही ये परपंरा

वाराणसी (एजेंसी/जयलोक)। भगवान भोलेनाथ की नगरी काशी न केवल शिव की आराधना के लिए मशहूर है, बल्कि भगवान विष्णु के अवतार भगवान जगन्नाथ के भी कई प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर हैं। ऐसा ही एक मंदिर अस्सी मोहल्ले के केदारखंड में मौजूद है, जहां साल में 15 दिन भगवान को काढ़े का विशेष भोग लगता है। यह परंपरा बीते 200 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है।
भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाला काढ़ा सामान्य प्रसाद नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर औषधीय पेय है। काली मिर्च, लौंग, इलायची, कच्ची चीनी, जायफल, तुलसी, गुलाब जल, मुलेठी और अदरक जैसे तत्वों से काढ़ा तैयार होता है। काढ़े को पहले भगवान को अर्पित किया जाता है और फिर श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान को भक्तों द्वारा ठंडक पहुंचाने के लिए जल से स्नान कराया जाता है। दिनभर चलने वाली प्रक्रिया के बाद भगवान बीमार हो जाते हैं। इसके बाद 15 दिनों तक भगवान के कपाट बंद रहते हैं और उन्हें काढ़े का भोग चढ़ाया जाता है। यह मान्यता है कि इस दौरान जो भक्त काढ़े का प्रसाद ग्रहण करता है, वह पूरे वर्ष रोगों से सुरक्षित रहता है।
भगवान जगन्नाथ को शाम 4 बजे मंदिर के पुजारी द्वारा काढ़े का भोग गया और पुन: कपाट बंद हो जाता है। इस चमत्कारी काढ़े को प्रसाद स्वरूप लेने के लिए लोग मंदिर पहुंच रहें। मंदिर के पुजारी ने बताया कि 4 से 6 बजे तक प्रतिदिन यह काढ़ा भोग लगाने के बाद भक्तों को वितरित होता है। काढ़े को लेने मंदिर पहुंची महिला ने बताया कि यह भगवान को दिया जाता है जिससे भगवान ठीक हो जाते हैं, तब इसके सेवन से हम अवश्य ठीक हो जाएगें, यही विश्वास है कि हम 30 वर्षों से यहां लेने आते हैं। उन्होंने बताया कि इससे बुखार, खांसी में सेवन करने से काफी लाभ मिलता है।
पंद्रह दिन की इस बीमारी के बाद भगवान स्वस्थ होकर रथ यात्रा के रूप में भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुरी की रथ यात्रा होती है। काशी का यह मंदिर, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा की मूर्तियों के साथ, पुरातन श्रद्धा का केंद्र है।
1802 में हुआ था मंदिर का निर्माण
यह मंदिर सन 1802 में निर्मित हुआ था और इस काशी के चार धामों में एक माना जाता है। यहां सुबह 5 बजे मंगला आरती और रात 9 बजे शयन आरती होती है। इस मंदिर की परंपराएं और यहां की आस्था काशी की आध्यात्मिक धरोहर का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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