
चैतन्य भट्ट
(जयलोक)। एक खबर आई है प्रदेश की संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर से कि वर्ष 2023 और 2024 के सात नामांतरण निरस्त कर दिये गये क्योंकि इन आदेशों के पीछे तहसीलदार महोदय की मनमानी और लापरवाही पाई गयी है।

बड़ी ही हैरानी की बात है कि राजस्व विभाग की फाइलों के समुद्र में कलेक्टर साब को डुबकी लगाने के बाद सिर्फ सात मोती मिले। अगर वे ईमानदारी से जरा गहराई तक गोता लगायें तो उनके हाथ मोतियों का खजाना लग सकता है। वैसे तो जनता की याददाश्त बेहद कमजोर होती हैं फिर भी शायद लोगों को याद हो सकता है कि कुछ बरस पहले उस वक्त के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की थी कि 1 अप्रैल 2014 से नामांतरण की प्रक्रिया ऑनलाइन हो जायेगी और जैसे ही कोई जमीन मकान या कृषि भूमि का विक्रय होगा, भूमिस्वामी के पक्ष में उसी समय नामांतरण दर्शा दिया जायेगा। इधर पूरे प्रदेश की जनता के चेहरों पर खुशी छा गयी।

लेकिन तहसीलदारों के चेहरे उतर गये। सुना जाता है कि तहसीलदारों ने सरकार से बड़ी मिन्नतें की कि उनके पेट पे लात न मारी जाये। अगर नामांतरण ही ऑटोमेटिक होने लगेगा तो वे क्या दफ्तर में मक्खियाँ मारेंगे? फिर उनके बीवी बच्चों का क्या होगा जिन्हें मुफ़्त की मलाई खाने की बुरी आदत पड़ चुकी है। सरकार तो बहुत संवेदनशील होती है, उसने इन गरीब और बेचारगी से भरे आंसू बहाते तहसीलदारों की व्यथा सुनकर ऑटोमेटिक नामांतरण मामला ही खत्म कर दिया। मामा जी के प्रस्ताव की फाइल ऐसी गायब हुई कि उसकी चर्चा होना ही बन्द हो गया। दरअसल सारे गड़बड़ घोटाले की शुरुआत शासन के एक पुराने तुगलकी आदेश से हुई जिसमें किसी भी प्रॉपर्टी के क्रय विक्रय के साथ उस प्रॉपर्टी का नामांतरण अनिवार्य कर दिया गया था।


इसके पालन के लिये कोई मोहलत नहीं दी गई और इसे तत्काल लागू कर दिया गया। सरकार की मंशा ठीक थी लेकिन आदेश का तत्काल लागू किया जाना तहसीलदारों के लिये लॉटरी साबित हुआ। किसी के बाप दादों ने पचासों साल पहले जमीनें खरीदी थीं जिनके बेचने वाले और खरीदने वाले सब स्वर्ग सिधार चुके थे।
पट्टे के अलावा कोई कागजात ही नहीं थे क्योंकि लोग यही सोचते थे कि तीन चार पीढ़ी से रह रहे हैं तो कागजों की क्या फिक्र। मगर जब बेचने की बारी आयी तो नामांतरण के लिये तहसीलदारों ने ऐसे ऐसे सबूत मांगे कि लोगों को चक्कर आने लग यहां तक की स्वर्ग में बैठे उनके पुरखे तक बेचैन हो गए। बस, उसके बाद से पटवारियों और तहसीलदारों के दोनों हाथों में लड्डू आ गए नामांतरण के नाम पर लूट मच गयी। अब इस अफरा तफरी में बेचारे तहसीलदारों से थोड़ी बहुत गलती हो गयी तो क्या मुश्किल है। इतने बड़े देश में जब चारों तरफ घपले घोटाले हो रहे हैं फिर तहसीलदारों ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिये तो ऐसा कौन सा पाप कर दिया। अपना मानना तो ये है कि इस बेहद छोटी सी लापरवाही के लिये बेचारे तहसीलदारों पर कार्रवाई करना एकदम नाजायज़ है।
सारे ही डिप्टी सीएम बना दो
\सुना है कि हाल ही में कर्नाटक में सिद्धारमैया जी की जगह डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बना दिया गया है। बड़े कशमकश के बाद ये मामला सेटल हो पाया, कहा तो यह भी गया था कि दोनों को ढाई ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। लेकिन सत्ता की कुर्सी में जो अदृश्य फेविकोल रहता है वह उसे बैठने वाला को इतना कस के जकड़ लेता है कि ना तो वो उठना चाहता है और ना ही वो फेविकोल उसे उस कुर्सी से उठने की इजाजत देता है। बेचारे शिवकुमार लगातार कांग्रेस की हाई कमान से गुजारिश कर रहे थे कि उनको भी तो मौका दिया जाए, खैर जब समय आता है तभी काम होता है सो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया गया। सिद्धारमैया जी को दिल्ली बुलाने की पूरी स्कीम कांग्रेस की बना ली थी कि उन्हें राज्यसभा भेज दिया जाएगा। लेकिन वे भी पुराने खिलाड़ी हैं राजनीति के, तो इस स्कीम को फेल कर हाई कमान से साफ साफ कह दिया नहीं मैं तो यहीं रहूंगा यानी शिवकुमार जी को चैन से बैठने नहीं दूंगा। पता लगा है कि चार-चार उपमुख्यमंत्री कनाज़्टक में बनाए जाने वाले हैं वैसे तो उपमुख्यमंत्री का कोई पद संवैधानिक रूप से होता नहीं है लेकिन राजनीति में लोगों को एडजस्ट करना भी तो बड़ा कठिन काम है। जो मुख्यमंत्री के दौड़ में शामिल होता है और नहीं बन पाता उसको उपमुख्यमंत्री बना दिया जाता है। अभी तक तो अपने को ये पता था कि जो ज्यादा दमदार होता है और मुख्यमंत्री को अलसेट देने में सक्षम होता है उसको उपमुख्यमंत्री का पद देकर शांत करने की कोशिश की जाती है। एक या दो उपमुख्यमंत्री बना दिये जाते हैं लेकिन कर्नाटक तो चार-चार उपमुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार बैठ गया है। अपने को तो लगता है की कुछ समय बाद मंत्रियों की पोस्ट ही खत्म हो जाएगी और सारे मंत्री उपमुख्यमंत्री कहलाने लगेंगे। क्योंकि यदि आपने चार बनाए तो चार और भी तो हैं जो कभी भी दम दे सकते हैं। हो सकता है जैसे उन चार को भी एडजस्ट किया जा रहा हो और ऐसे चार-चार करके पता लगा चालीस की फौज खड़ी हो गई। भले ही अधिकार मंत्री जैसा ही हो लेकिन कहने को तो रहेगा कि हम उपमुख्यमंत्री हैं ये कोई कम बात है क्या? देखना ये है कि कनाज़्टक की देखादेखी अब दूसरे प्रदेशों में भी चार, छह, या आठ उप मुख्यमंत्री ना बनाए जाने लगें।
किसी में चैन नहीं
ये इंसान भी बड़ा विचित्र जीव है उसे किसी भी चीज में चैन नहीं है, अब देखो गर्मी आई है तो मौसम के हिसाब से गर्मी तो पड़ेगी ना, लेकिन नहीं, गर्मी से परेशान हैं, हाय कितनी गर्मी है, ये साला तापमान कहां जा रहा है, 45 डिग्री में आदमी करे तो करें क्या, जैसे जुमले आप किसी के भी मुंह से सुन लो। अरे भैया जब प्रकृति ने तीन मौसम बनाए हैं गर्मी, सर्दी, बरसात तो गर्मी में गर्मी नहीं तो क्या ठंड पड़ेगी? ऐसा ही हाल ठंड में होता है जब ठंड पड़ती है तो गर्मी की याद आ जाती है बाप रे कितनी ठंड पड़ रही है यार, हाथ पैर अकड़ गए हैं, रजाई पर रजाईओढ़े पड़ा है इंसान, ये ठंड कब खत्म होगी, भारी परेशान हो गए हैं इस ठंड से और जब बरसात हुई तो उसमें भी चैन नहीं। इस बरसात ने तो कहीं आना-जाना मुहाल कर दिया है, जगह-जगह गढ्ढों में पानी भरा है, कीचड़ से जूते सन रहे हैं, कहीं आने-जाने में कितनी परेशानी हो रही है। यानी कि ना उसे गर्मी में चैन है, ना बरसात में, ना ठंड में। दरअसल उसकी फितरत ही ऐसी है जो उसके सामने है उससे उसको परेशानी है और जो नहीं है उसको लेकर सुखद यादों में खोया हुआ है और जब वही सुखद यादें सामने आती हैं तो फिर पुराने अतीत में लौट जाता है। भगवान भी कहता है कि तुम बेचैन ही रहो, चैन से रहोगे तो कुछ ना कुछ उल्टा सीधा जरूर करोगे। बेचैन रहोगे तो उसी में अपना समय लगाते रहो। इसी बेचैनी में अपना समय काट दोगे। वैसे इन बेचैन आत्माओं को एक ढाढस बंधा देते हैं कि कुछ समय रुक जाओ इस गर्मी से निजात मिलने वाली है। बरसात आने वाली है। लेकिन फिर वही बात इधर बरसात शुरू हुई और इधर इंसानों का रोना शुरू।
सुपर हिट ऑफ द वीक
शादीशुदा पुरुष की सबसे बड़ी बेइज्जती कब होती है श्रीमान जी के मित्र ने उनसे पूछा।‘जब वो भरी दुकान में कुछ ले रहा हो और उसके बच्चे जोर से चिल्लाकर बोलते हैं पापा ये मत लो मम्मी डांटेगी श्रीमान जी ने उत्तर दिया।
बहोरीपार में अवैध रेत खनन पर एसडीएम का छापा, वापस नदी में मिलाई रेत
Author: Jai Lok






