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लगा जैसे हार्ट अटैक है .. लेकिन फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में जम गए थे खून के थक्के,बचाई जान

फेफड़ों की मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी पद्धति से किया ऑपरेशन

जबलपुर (जय लोक)। अपने पति के साथ शाम को मंदिर जा रही एक बुजुर्ग महिला को अचानक सीने और आसपास तेज दर्द उठा और सांस लेने में तकलीफ होने लगी उनके पति को लगा की है हार्ट अटैक है और भी तत्काल उसे लेकर समीप भी स्थिति बड़ेरिया मेट्रो हार्ट ले गए जब यहां के अनुभवी डॉक्टरों ने महिला मरीज का परीक्षण किया तो पाया कि है हार्ट अटैक नहीं है बल्कि महिला के फेफड़े की रक्त वाहिकाओं में खून के थक्के जम गए थे।

मरीज़ का नाम श्रीमती सुमन लता उपाध्याय है उनके पति रमेश प्रसाद उपाध्याय को लगा की हार्ट अटेक जैसा है वो तुरंत लेकर अस्पताल पहुँचे जहाँ जाँच में पता चला की मरीज़ को पल्मोनरी एंबोलिजम है।पल्मोनरी एम्बोलिज़्म जीवन के खतरे वाली बीमारी होती है, जिसमें फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में खून के थक्के जम जाते हैं, जिससे मरीज सांस नहीं ले पा रहे थे। इस गंभीर स्थिति में मरीज की सबसे आधुनिक चिकित्सा पद्धति, मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी जिसमें सबसे कम चीरा फाड़ी होती है कर मरीज का जीवन बचाया गया। मेट्रो हार्ट के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ प्राची शर्मा द्वारा ‘मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी प्रक्रिया द्वारा फेफड़े की नसों में जमा खून के थक्के को तुरंत निकाल दिया गया।

क्या है मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी मैकेनिकल थ्रॉम्बेक्टॉमी वास्तव में चिकित्सा विज्ञान की एक बेहद आधुनिक और न्यूनतम चीर-फाड़ वाली तकनीक है। यह मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए एक जीवनरक्षक प्रणाली की तरह काम करती है, जिन्हें तीव्र इस्केमिक स्ट्रोक या धमनियों में खून के बड़े थक्के जमने की गंभीर समस्या होती है। इस प्रक्रिया में, सर्जन मरीज के पैर (जांघ) या हाथ की एक छोटी सी नस के जरिए एक बेहद बारीक और लचीली नली, जिसे कैथेटर  कहा जाता है, को शरीर के भीतर डालते हैं।

इमेजिंग तकनीकों (जैसे एक्स-रे या एंजियोग्राफी) की मदद से इस कैथेटर को सीधे उस प्रभावित रक्त वाहिनी तक पहुँचाया जाता है जहाँ थक्का जमा होता है। वहाँ पहुँचकर, कैथेटर के आगे लगे विशेष उपकरणों (जैसे स्टेंट रिट्रीवर या सक्शन डिवाइस) की मदद से उस खून के थक्के को पकडक़र या खींचकर शरीर से सुरक्षित रूप से बाहर निकाल दिया जाता है। पारंपरिक ओपन-सर्जरी के विपरीत, इसमें किसी भी तरह का बड़ा कट या चीरा नहीं लगाया जाता है, जिससे मरीज को कम दर्द होता है, खून बहने का खतरा बेहद कम रहता है, और वे बहुत तेजी से रिकवर होकर अपने सामान्य जीवन में लौट पाते हैं। स्ट्रोक के शुरुआती कुछ घंटों के भीतर यह तकनीक मस्तिष्क की कोशिकाओं को हमेशा के लिए नष्ट होने से बचाने में सबसे प्रभावी साबित होती है।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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