
(जयलोक)।। मध्यप्रदेश शासन की ट्रेजरी में ‘इफमिस यानी इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट इन्फॉर्मशन सिस्टम’ के जरिए 600 करोड़ का घोटाला पकड़ा गया है जिसमें से 220 करोड़ की रिकवरी हो चुकी है जबकि बाकी 380 करोड़ की रिकवरी की कोशिश जारी है। इधर जबलपुर के मेडिकल कॉलेज में बरसों से कुछ कैशियर मरीजों की पर्ची काटकर पैसा
जेब में रखते जा रहे थे। कुछ माह पहले ये भी चर्चा में था कि जिले के स्वास्थ्य अधिकारी महोदय ने कई फर्मों को लाखों का भुगतान कर दिया मगर दवाएं स्टोर तक पहुँची ही नहीं। खैर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बड़े विभागों में तो ये आम बात है लेकिन अब दूसरे विभागों में भी गबन और वित्तीय गड़बडिय़ों के कई मामले सामने आये हैं। भले ही मध्यप्रदेश पर बीमारू राज्य का लेबल लगा हो लेकिन मध्यप्रदेश सरकार कम्प्यूटर के उपयोग में काफी आगे रही है। अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश में ट्रेजरी का कम्प्यूटरीकरण बहुत साल पहले ही हो चुका है। कर्मचारियों का वेतन या पेंशन हो, वेतन निर्धारण हो, या बिल पेमेंट हों सभी का भुगतान इफमिस के माध्यम से ही किया जा रहा है। इसलिए पहले तो खरीदी और भर्ती में ही घपले किये जाते थे लेकिन अब इफमिस ने काम आसान कर दिया है। कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत हो तो पासवर्ड का आदान प्रदान करके जितनी राशि जिस खाते में भेजना हो, कम्प्यूटर के दो चार बटन दबाने से ही हो जाता है। न फाइलों की अफरा तफरी, न बड़े बाबू के दस्तखत और न ही न साहब की मंजूरी। आजकल छापों का दौर है और जब तब लोकायुक्त, सीबीआई या ईडी के छापों में सरकारी महकमों में करोड़ों के घोटाले पकड़े जा रहे हैं। ये सब जानते हैं कि हर सरकारी दफ्तर में समय समय पर ऑडिट की अनिवार्य परम्परा है मगर क्या वजह है कि ‘बाल की खाल’ निकालने वाली ऑडिट पार्टी दफ्तरों में जारी पैसों की हेरा फेरी पकडऩे में नाकाम रहती है। दरअसल किसी भी ऑडिट पार्टी का दौरा बहुत व्यस्त रहता है। ऑडिटर पहले से ही अफसरों को इत्तिला दे देते हैं कि हम आ रहे हैं हमारी खाने पीने से लेकर दान दक्षिणा तक की जिम्मेदारी तुम्हारी है। साथ ही ये ताकीद भी दे देते हैं कि स्वागत सत्कार जबरदस्त होना चाहिये वरना फिर समझ लेना और उसके बाद शुरू होता है असली खेल। अफसरों के खर्चे पर शानदार होटल में आराम, सुबह शाम बढिय़ा खाना, लोकल टूरिस्ट स्पॉट की सैर और मनपसंद खरीददारी वगैरह में इतना टाइम गुजर जाता है कि दफ्तरों के कागजात बारीकी से जांच करने का टाइम ही नहीं मिलता। अगर थोड़ी बहुत गड़बड़ी पर नजर पड़ भी जाए तो अफसर तुरन्त नकद नारायण से सेवा कर देता है और ऑडिटर ‘भूल चूक माफ’ की भावना से ओतप्रोत होकर गलतियां माफ करता चलता है। सालों साल ऑडिट होते रहते हैं और भूल चूक माफ होती रहती है। स्वागत सत्कार से ऑडिटर भी खुश, और बढिय़ा ऑडिट रिपोर्ट से अफसर भी खुश। इसीलिए ऑडिट भी बदस्तूर होते रहते हैं और पैसों की हेरा फेरी भी चलती रहती है। अगर सरकार को वाकई घपले घोटाले पकडऩे की चिन्ता है तो ऑडिटरों का ऑडिट करके देख ले, सारी पोल खुल जाएगी। अगर अफसरों के साथ ऑडिटरों को भी सजा होने लगे तो घोटालों का स्कोप ही खत्म हो जायेगा। लेकिन क्या ये संभव है इस बात पर उस गाने की पंक्तियां याद आ जाती हैं ‘नहीं नहीं कभी नहीं।

अभी करो इंतजार इलाज जारी है

राजधानी के ‘मारुति मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल’ में एक व्यक्ति का इलाज दो दिन तक लगातार चलता रहा आप बोलेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है अस्पताल में इलाज नहीं चलेगा तो क्या डांस होगा? लेकिन भाई साहब आपको ये नहीं मालूम कि जिस व्यक्ति का इलाज इस अस्पताल के डॉक्टर कर रहे थे उसकी मौत दो दिन पहले हो चुकी थी और वे मुर्दे का इलाज कर रहे थे सिर्फ इसलिए कि ‘आयुष्मान योजना’ के तहत मिलने वाला पैसा सरकार से वसूल कर सकें, लोग बाग कहते हैं कि डॉक्टर भगवान होते हैं शायद यही कारण था कि अस्पताल के डॉक्टर अपने आप को भगवान समझकर उस मुर्दे में जान फूंकने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि यह माना जाता है कि अगर ईश्वर चाहे तो मृत व्यक्ति भी जिंदा हो सकता है, बाद में जब इस घपलेबाजी की पोल खुली तो अस्पताल सील कर दिया गया, लेकिन अपना मानना है कि इस केस में ना तो अस्पताल का दोष है और ना ही डाक्टरों का, सारा दोष है तो उस मरीज का है जो आयुष्मान के भरपूर पैसे दिए बिना ही ईश्वर को प्यारा हो गया। अरे भाई कुछ दिन और रुक जाते तो ऐसा क्या गजब हो जाता, अस्पताल को भरपूर पैसा मिल जाता, फिर मर जाते, किसी को कोई चिंता नहीं होती लेकिन जब पूरा पैसा नहीं मिलेगा तो फिर मुर्दे का इलाज तो करना ही पड़ेगा और वो ही इस अस्पताल के डॉक्टर कर रहे थे। एक और खास बात पता लगी है कि एक व्यक्ति को ‘कब्ज’ की शिकायत थी, पेट साफ नहीं हो रहा था। उसने ना तो हरा पुदीना लिया, ना कायम चूर्ण की फक्की मारी, ना त्रिफ्ला घोलकर सुबह सुबह पिया, सीधा इसी अस्पताल में पहुंच गया और भाई को डाक्टरों ने भी उसे सीधा आईसीयू में भर्ती करवा दिया उनका मानना था कि बहुत ही खतरनाक बीमारी होती है कब्ज, पेट फूल सकता है, पेट फट सकता है, आँतें गड़बड़ा सकती हैं बड़ी आंत छोटी आंत के ऊपर चढ़ सकती है, लिवर डैमेज हो सकता है, किडनी में भी असर हो सकता है इसलिए आईसीयू में भर्ती करना बहुत जरूरी है। अब सरकार अस्पताल की जांच कर रही है और पता लगा रही है कि ऐसे ऐसे चमत्कार इस अस्पताल में और कब-कब हुए हैं।

नेता कब दोषी माने गए
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई लगभग 20 लोगों की मौत के बाद इस मामले की बड़ी गहराई से जांच शुरू की गई, काफी टाइम लग गया जांच में, क्योंकि एक-एक बिंदु की जांच करना जरूरी था और अब जांच रिपोर्ट आ चुकी है और इस जांच रिपोर्ट में तमाम जनप्रतिनिधियों को क्लीन चिट देकर ये बताया गया है कि सारी गलती अफसरों की थी। बेचारे जनप्रतिनिधियों को तो यह पता ही नहीं था कि यहां प्रदूषित पानी है। ये बात अलग है कि वहां के रहवासी तीन महीने से इस बात की शिकायत अफसरों और जनप्रतिनिधियों से कर रहे थे। लेकिन नेता तो नेता होता है ना उसका कोई दोष ना तो कभी था,ना कभी है और ना कभी होगा और फिर जांच करने वालों को भी मालूम है कि अपने को जब काम पड़ेगा तो नेता ही काम आएंगे। रही अफसरों की बात तो सचिवालय में अटैच कर दिए जाएंगे और दो-चार महीने में फिर बेहतरीन पोस्टिंग पाकर अपना काम शुरू कर देंगे यानी कि ‘साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी’ जांच की जांच हो गई कुछ लोग निर्दोष बरी हो गए। कुछ लोगों पर दोष मढ़ दिया गया लेकिन अपने को मालूम है कि जिन पर दोष मढ़ा गया है उनका भी कुछ नहीं बिगडऩे वाला और जिन पर दोष नहीं आया उनका तो वैसे ही कुछ नहीं बिगड़ रहा। हम भी खुश तुम भी खुश, जनता जाए भाड़ में और फिर जिनकी आ ही गई थी उनको कौन बचा सकता है जांचें इसी तरह की ‘फ्लिासफी’ पर काम करती है।
सुपर हिट ऑफ द वीक
‘प्यास लगी है, पानी लेके आओ’ श्रीमानजी ने श्रीमती जी से कहा
‘मैं तो सोच रही थी कि क्यों ना आज तुम्हें मटर पनीर और शाही पुलाव बनाकर खिलाऊं?’
‘वाह-वाह! सुनकर ही मुंह में पानी आ गया’ श्रीमानजी ने खुश होकर कहा
‘आ गया ना मुंह में पानी? बस, अब इसी से काम चला लो!’ श्रीमती जी ने उत्तर दिया।
भोपाल भाजपा की जिला टीम में 90 नए चेहरे, सुरेश पचौरी समेत 23 दिग्गज स्थायी आमंत्रित सदस्य
Author: Jai Lok





