
स्थानांतरित होकर आए पाँच निरीक्षक, पूर्व से आठ पुलिस लाईन में मौजूद
जबलपुर (जयलोक)। शहर में 25 शहरी थाने, 14 देहात के थाने, 3 यातायात के थाने, 15 पुलिस चौकियाँ, क्राइम विभाग, पुलिस लाइन सहित अन्य विभागों में आधा सैंकड़ा से अधिक थाना प्रभारी मौजूद हैं। इनमें से पांच थाना प्रभारी अभी हाल ही में अन्य स्थानों से स्थानांतरित होकर जबलपुर में अपनी आमद दे चुके हैं। शहर के 25 शहरी थानों में और 14 ग्रामीण थानों में पूर्व से ही थाना प्रभारियों की नियुक्तियां हैं। सूत्रों के अनुसार लगभग 8 थाना प्रभारी पुलिस लाइन में मौजूद हैं। पांच की आमद और दर्ज हो गई है। मतलब सीधा सा है कि फिर से मैदान में बने रहने के लिए और थाने की कमान अपने हांथ में लेने के लिए जोर आजमाइश का दौर शुरू हो गया है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार इस प्रक्रिया के अंतर्गत मौजूदा थाना प्रभारी की कमियाँ निकालकर और अपने अपने स्तर पर पहुंच लगाकर इस कार्य में सफलता पाने के प्रयास किए जाने का क्रम शुरू हो चुका है। बनी बात है राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना यह पूरी तरीके से संभव नहीं हो पाता है। जबलपुर में राजनीति के बहुत सारे ताकतवर केंद्र मौजूद हैं। इसके अलावा कुछ निरीक्षक अपने पुराने संबंधों का इस्तेमाल करने में भी पीछे नहीं हटेंगे। भोपाल और इंदौर के पुराने संपर्क का उपयोगकर थाने में पदस्थापना के पूरे प्रयास जारी रहेंगे।

जबलपुर जिले की कमान संभाल रहे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय सामान्य रूप से विभागीय कार्यवाही में बहुत अधिक राजनीतिक हस्तक्षेप को स्थान देना पसंद नहीं करते। पूर्व में भी कई प्रकार के किस्से हैं जब जनप्रतिनिधि को तरह-तरह के जतन कर अपने पसंद के लोगों को अपने प्रभाव के क्षेत्र में पदस्थ करने के लिए पापड़ बेलने पड़े थे। एक बार फिर वही समय आता नजर आ रहा है।
पुराने किस्सों में सबसे ज्यादा प्रचलित वह किस्सा है जिसमें एक विवादित सब इंस्पेक्टर को उसकी मनपसंद पदस्थापना के लिए एक विधायक के आगे लगभग नतमस्तक होने का और उस जनप्रतिनिधि के द्वारा कप्तान के सामने अगली बार सिफारिश न करने की बात कहते हुए इस बार अनुशंसा स्वीकार करने का निवेदन स्वीकार हुआ था।

पूरे विभाग को पता था कि इस प्रकार की पद स्थापना भले व्यवस्था को बनाए रखने के उद्देश्य से पुलिस अधीक्षक स्वीकार कर लेते हैं लेकिन इस प्रकार के अधिकारियों की उतनी अधिक छवि शेष रह नहीं जाती। उनकी गतिविधियों पर और उनके चाल चलन पर वरिष्ठ अधिकारियों का विशेष रूप से ध्यान केंद्रित हो जाता है और भी इस बात की रडार में आ जाते हैं कि अनुशंसा की दम पर मैदान में तैनाती पाने वाले गलती करते ही वापस लाइन में बैठा दिये जाएंगे। कार्य करने वालों को अगला मौका मिले इसके लिए पुलिस अधीक्षक के पास कार्य करने वालों की अपनी विशेष सूची है। जिन निरीक्षकों को कार्य का अनुभव है कार्य के प्रति उनका समर्पण है उन्हें थाने की कमान सौंपने में जरा भी देरी नहीं की जाती।
राजनीतिक प्रभाव वालों का गिर जाता है कद
वर्तमान में जिले की पुलिस व्यवस्था का एक पक्ष यह भी है कि राजनीतिक संबंधों और प्रभाव के आधार पर अगर कोई अधिकारी अपनी तैनाती करने में सफल हो जाता है, तो विभागीय स्तर पर उसका कद गिर जाता है। काबिलियत के आधार पर पद पाना हर विभाग में गर्व की बात समझा जाता है। इस प्रकार की हरकतों में माहिर लोग अपने बैच के अन्य अधिकारियों से भी मनमुटाव पाल लेते हैं।
त्योहार से पहले जुगाड़ जमाने का प्रयास
विभागीय गलियारे में इस बात की चर्चा भी जोरों पर है कि त्योहार प्रारंभ हो चुके हैं। लूप लाइन में बैठे निरीक्षकों में से कुछ को थाना प्रभारी बनने की काफी जल्दी है और इस दिशा में उनके प्रयास भी प्रारंभ हो चुके हैं। कोई सिविल लाइन के चक्कर काट रहा है तो कोई मदन महल की रोड पर दस्तक देता नजर आ रहा है। हालांकि किसका जुगाड़ कितना चल पाएगा और पहले से जो बैठे हैं वह लोग भी अपना गणित जमा कर बैठे हैं। इसीलिए स्थानांतरण और नई पदस्थापना का यह घटनाक्रम बहुत आसान नहीं है। संस्कारधानी में अब संवेदनशील समय प्रारंभ हो चुका है। त्योहारों के दौर खत्म होते होते तक चुनाव की दस्तक शुरू हो जाएगी। कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए थाने की कमान बहुत ही अनुभवी और मजबूत हाथों में होना आवश्यक माना जा रहा है। पूर्व के कई निरीक्षक थाना प्रभारी तो बन गए थे लेकिन पुलिस अधीक्षक की मंशा और क्षेत्र की मांग के अनुरूप कार्य नहीं कर पा रहे थे। स्वार्थ सिद्धि में लगे लोग जल्दी लाइन में लौट आए। कुछ चेतावनी मिली-कुछ समय मिला। कार्यप्रणाली नहीं सुधरी तो लाइन में बैठा दिया गया।
अब रस्साकशी का दौरा जारी है बदलाव होगा या नहीं थाना प्रभारियों की जिम्मेदारी बदलेगी कि नहीं यह निकट भविष्य में ही स्पष्ट हो जाएगा। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय का पूरे जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों की भौगोलिक स्थितियों और जरूरत का अपना अलग अध्ययन है। सभी जरूरतों को देखते हुए जो कानून व्यवस्था, बेहतर पब्लिक पुलिसिंग करने में सक्षम नजर आएगा वही मैदान में बना रहेगा।
वर्तमान तैनात निरीक्षक भी रमें हुए खिलाड़ी
वर्तमान समय में शहरी क्षेत्र के 25 थानों और 14 देहात के थानों में कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी के निरीक्षक पुराने रमें हुए खिलाड़ी के रूप में नजर आते हैं। इनमें से कुछ का राजनीतिक संपर्क बहुत अच्छा है। कुछ की पोलिसिंग बहुत अच्छी है। कुछ निरीक्षको का मुखबिर तंत्र बहुत अच्छा है। कुछ विभाग के लिए बड़े उपयोगी हैं। तो कुछ ऐसे भी हैं जो थाने के मेजर और सब इंस्पेक्टर तक की पेट पर लात मार कर सीधे पुलिस की रीतिनीतियों का निर्वहन कर रहे हैं। जो जमे हुए खिलाड़ी है उनको हटा पाना आसान नहीं है लेकिन जो कच्ची गोटिया हैं वह मैदान में आए खिलाडिय़ों के निशाने पर है।
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