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मध्यप्रदेश में कर्ज का बोझ बढ़ा, सरकार का हवाई शौक महँगा!

350 करोड़ के जेट और 225 करोड़ के हेलीकॉप्टर पर उठे सवाल
575 करोड़ रुपये के हवाई इंतजामों का हिसाब कौन देगा?
शुरुआती कीमत से अंतिम लागत तक पारदर्शिता की मांग, वित्तीय प्राथमिकताओं पर बहस
भोपाल (जयलोक)। प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर कर्ज का दबाव, बजट में बढ़ता राजकोषीय घाटा और दूसरी ओर करोड़ों रुपये के सरकारी हवाई इंतजाम! मध्य प्रदेश में विमान और हेलीकॉप्टर की खरीद को लेकर उठे सवाल अब केवल सरकारी सुविधा तक सीमित नहीं हैं। मामला सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं से जुड़ गया है।
विपक्ष की ओर से सामने आए आरोपों के मुताबिक, सरकारी जेट की कीमत लगभग 234 करोड़ रुपये से बढक़र 350 करोड़ रुपये और हेलीकॉप्टर की कीमत 125 करोड़ रुपये से बढक़र 225 करोड़ रुपये बताई गई है। इन दोनों आंकड़ों को जोड़ें तो कुल राशि 575 करोड़ रुपये होती है। ये आंकड़े अंतिम खरीद लागत के रूप में आधिकारिक दस्तावेजों से प्रमाणित होते हैं, तो सरकार को प्रत्येक मद का पूरा हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—कीमत में वृद्धि क्यों हुई, किसकी सहमति से हुई और जनता के खजाने पर इसका वास्तविक बोझ कितना पड़ा?सरकारी खरीद में विमान की मूल कीमत और उसकी अंतिम लागत अलग-अलग हो सकती है। इसमें तकनीकी उपकरण, संचार प्रणाली, सुरक्षा संबंधी बदलाव, इंटीरियर, रखरखाव और अन्य सुविधाओं का खर्च शामिल हो सकता है। लेकिन यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता सबसे ज्यादा जरूरी हो जाती है।
यदि जेट की शुरुआती कीमत 234 करोड़ रुपये थी और अंतिम कीमत 350 करोड़ रुपये तक पहुंची, तो लगभग 116 करोड़ रुपये की वृद्धि का मदवार विवरण सामने आना चाहिए। इसी तरह हेलीकॉप्टर की कीमत 125 करोड़ रुपये से बढक़र 225 करोड़ रुपये बताई जा रही है, तो लगभग 100 करोड़ रुपये की वृद्धि का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।
क्या ये शुरुआती अनुमान थे या स्वीकृत निविदा की कीमत? क्या अतिरिक्त सुविधाओं के कारण लागत बढ़ी? क्या खरीद के दौरान शर्तों में बदलाव हुआ? क्या सरकार ने स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन कराया? इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निविदा, अनुबंध और भुगतान संबंधी दस्तावेजों से मिलना चाहिए।
मध्य प्रदेश की वित्तीय स्थिति इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाती है। वर्ष 2026-27 के बजट विश्लेषण में मार्च 2027 के अंत तक राज्य की बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद के 32.5 प्रतिशत तक रहने का अनुमान है। इसी बजट में 71,458 करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा और 34,437 करोड़ रुपये पुराने कर्ज के मूलधन की अदायगी के लिए प्रस्तावित हैं। ये आंकड़े अपने आप में विमान खरीद को गलत साबित नहीं करते, लेकिन इतने बड़े खर्च के औचित्य की जांच को जरूरी जरूर बनाते हैं। सरकार को बताना चाहिए कि विमान खरीदने की जरूरत का आकलन कैसे किया गया और क्या खरीदने, किराये पर लेने अथवा अन्य उपलब्ध विकल्पों की लागत की तुलना की गई थी।जब शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, किसानों की जरूरतों और रोजगार के लिए बजट में संसाधनों का संतुलन बनाना पड़ता है, तब हर बड़े सरकारी खर्च की उपयोगिता और अवसर लागत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल यह है कि जेट और हेलीकॉप्टर की स्वीकृत शुरुआती तथा अंतिम कीमत क्या है?कीमत में वृद्धि किन मदों के कारण हुई और उसका अनुमोदन किस स्तर पर हुआ?निविदा, खरीद अनुबंध, तकनीकी मूल्यांकन और भुगतान का पूरा विवरण क्या है?विमान खरीदने की तुलना में किराये या अन्य विकल्पों की लागत कितनी आती?सालाना ईंधन, चालक दल, बीमा, रखरखाव और हैंगर का अनुमानित खर्च कितना होगा?इन सवालों के बीच कहना मुश्किल होगा कि खरीद वास्तविक प्रशासनिक जरूरत के अनुरूप है या सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
सरकारी विमान का उपयोग आपात परिस्थितियों, प्रशासनिक दौरों और महत्वपूर्ण सरकारी कार्यों में हो सकता है। इसलिए केवल विमान खरीदने के आधार पर किसी अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन सुविधा के नाम पर खर्च की गई सार्वजनिक राशि का पूरा हिसाब देना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
यह मामला किसी एक विमान या हेलीकॉप्टर का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें हर बड़े सरकारी निर्णय के साथ लागत, उपयोगिता और जवाबदेही भी जुड़ी होनी चाहिए।यदि सरकारी विमान और हेलीकॉप्टर पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो सरकार जनता को यह बताने में संकोच क्यों करे कि खरीद की जरूरत क्या थी, कीमत कैसे तय हुई और प्रदेश को इससे क्या ठोस लाभ मिलेगा?कर्ज जनता की जिम्मेदारी बनता है, इसलिए खर्च का हिसाब देना भी जनता के प्रति सरकार की जिम्मेदारी है।

 

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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