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आया समय बड़ा बेढंगा नाच रहा नर होकर नंगा

अमित चतुर्वेदी

(जयलोक)।कुछ पंक्तियाँ ऐसी होती हैं जो किसी एक दौर के लिए नहीं लिखी जातीं। वे समय के माथे पर लिखी जाती हैं। पीढिय़ाँ बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, सत्ता बदलती है, तकनीक बदलती है, लेकिन वे पंक्तियाँ हर युग में उतनी ही सच्ची लगती हैं जितनी अपने जन्म के दिन थीं।कवि प्रदीप ने जब लिखा—कितना बदल गया इंसान!—तो शायद वे केवल अपने समय का शोक नहीं लिख रहे थे। वे मनुष्य की उस यात्रा को देख रहे थे जिसमें हर पीढ़ी अपने समय को सबसे कठिन और सबसे बुरा मान बैठती है। यही कारण है कि आज, सात दशक से भी अधिक समय बाद, जब हम इस गीत को सुनते हैं तो लगता है जैसे यह हमारे ही समय का आईना हो।हम अक्सर कहते हैं कि आज के लोग पहले जैसे नहीं रहे। रिश्तों में अपनापन नहीं रहा। भरोसा कम हो गया। सच बोलने वाले कम हो गए। इंसानियत खो गई। लेकिन यही बातें 1954 में भी कही जा रही थीं। उससे पहले भी कही गई होंगी। शायद आने वाले पचास वर्षों बाद भी कोई यही कहेगा कि समय बहुत खराब आ गया है।तब सवाल यह नहीं रह जाता कि समय खराब हुआ या नहीं। सवाल यह हो जाता है कि आखिर हर दौर का मनुष्य अपने समय को देखकर यही पीड़ा क्यों महसूस करता है?शायद इसलिए कि समय कभी खराब नहीं होता। समय तो वैसा ही बहता है जैसे नदी बहती है। उसमें न अच्छाई होती है, न बुराई। अच्छाई और बुराई तो मनुष्य अपने भीतर लेकर चलता है। जब भीतर का उजाला थोड़ा कम होने लगता है, तब बाहर का अँधेरा ज्यादा दिखाई देने लगता है।

कवि प्रदीप ने अपने समय में दंगे देखे थे, विभाजन का दर्द देखा था, टूटते हुए परिवार देखे थे, धर्म के नाम पर बँटते हुए लोग देखे थे। उन्होंने देखा था कि भगवान का नाम लेने वाले भी इंसानियत भूल सकते हैं। उन्होंने देखा था कि ईमान बिक भी सकता है। इसलिए उनके शब्दों में शिकायत नहीं थी, करुणा थी। वे किसी एक व्यक्ति पर आरोप नहीं लगा रहे थे। वे पूरी मानवता के लिए दुखी थे।आज जब हम चारों ओर देखते हैं तो दृश्य अलग हैं, लेकिन पीड़ा वही है। पहले तलवारें थीं, आज शब्द हैं। पहले अफवाहें गलियों में फैलती थीं, आज मोबाइल की स्क्रीन पर दौड़ती हैं। पहले दूरी गाँवों और शहरों के बीच थी, आज एक ही घर के दो कमरों के बीच है। साधन बदल गए, लेकिन मनुष्य के भीतर का संघर्ष आज भी वैसा ही है।हमने चाँद पर कदम रख दिए, लेकिन कई बार अपने ही घर के बुज़ुर्गों के पास बैठने का समय नहीं निकाल पाए। हमने दुनिया को हथेली पर ला दिया, लेकिन अपने ही बच्चों की आँखों में झाँकना भूल गए। हमने ऊँची-ऊँची इमारतें बना लीं, लेकिन दिलों के दरवाज़े छोटे होते चले गए।फिर भी यह कहना कि इंसान पूरी तरह बदल गया है, शायद पूरी सच्चाई नहीं होगी।अगर इंसान पूरी तरह बदल गया होता तो आज भी किसी अनजान की मदद करने वाले लोग दिखाई नहीं देते।

किसी अस्पताल में रात भर किसी मरीज के लिए रक्त देने वाला व्यक्ति नहीं मिलता। किसी बाढ़ में अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों को बचाने वाले लोग नहीं मिलते। किसी माँ की ममता, किसी पिता का त्याग, किसी दोस्त की सच्ची चिंता और किसी बच्चे की मासूम मुस्कान आज भी हमें यह भरोसा नहीं दिलाती कि दुनिया अभी पूरी तरह उजड़ नहीं गई है।असल बात यह है कि बुराई हमेशा शोर करती है और अच्छाई हमेशा चुप रहती है। इसलिए हमें बुराई ज्यादा दिखाई देती है। समाचारों में धोखा बिकता है, विश्वास नहीं। हिंसा दिखाई जाती है, करुणा नहीं। छल की चर्चा होती है, सादगी की नहीं। धीरे-धीरे हमें लगने लगता है कि दुनिया में बस यही सब बचा है।लेकिन इतिहास गवाह है कि हर अँधेरे समय में कुछ दीपक भी जलते रहे हैं। शायद इन्हीं दीपकों के कारण दुनिया अब तक बची हुई है।कवि प्रदीप का गीत हमें केवल यह नहीं बताता कि इंसान कितना बदल गया। वह हमें यह भी पूछता है कि हम खुद कितने बदल गए हैं? क्योंकि दुनिया हमेशा दूसरों से नहीं बनती। दुनिया हमसे भी बनती है। जिस ईमान के बिकने की शिकायत हम करते हैं, क्या हमने उसे हर छोटी सुविधा के बदले कभी गिरवी नहीं रखा? जिस संवेदना के मरने का दुख हमें है, क्या हमने किसी अनजान के दर्द को सचमुच महसूस करने की कोशिश की?शायद हर पीढ़ी को यह भ्रम होता है कि पतन अभी शुरू हुआ है। जबकि सच्चाई यह है कि मनुष्य के भीतर अच्छाई और बुराई का यह संघर्ष उतना ही पुराना है जितनी उसकी सभ्यता। हर युग में कुछ लोग जोड़ते हैं और कुछ तोड़ते हैं। कुछ लोग नफरत बोते हैं और कुछ प्रेम उगाते हैं। कुछ लोग विश्वास बेचते हैं और कुछ विश्वास बन जाते हैं।इसलिए यह गीत केवल निराशा का गीत नहीं है। यह चेतना का गीत है। यह हमें जगाता है। यह हमें आईना दिखाता है। आईना इसलिए नहीं होता कि हम उससे नाराज़ हो जाएँ।

आईना इसलिए होता है कि हम अपने चेहरे पर लगी धूल देख सकें।आज जब हम इस गीत को सुनते हैं तो लगता है कि कवि प्रदीप हमारे समय को देख रहे थे। लेकिन सच तो यह है कि वे मनुष्य के स्वभाव को देख रहे थे। यही कारण है कि उनके शब्द बूढ़े नहीं हुए। वे आज भी उतने ही नए हैं जितने उस दिन थे जब पहली बार लिखे गए थे।शायद दुनिया को बदलने का सपना बहुत बड़ा है। लेकिन अपने भीतर थोड़ा-सा उजाला बचाए रखना उतना कठिन भी नहीं। किसी का भरोसा न तोडऩा, किसी की विवशता का लाभ न उठाना, किसी की पीड़ा को देखकर ठहर जाना, किसी की आँखों के आँसू पोंछ देना—यही वे छोटे-छोटे काम हैं जिनसे हर युग में इंसान बचा है।हो सकता है आने वाली पीढिय़ाँ भी यही कहें—कितना बदल गया इंसान! लेकिन अगर हम अपने हिस्से की इंसानियत बचाकर रख सके, तो शायद उस समय कोई यह भी कह सकेगा कि नहीं, सब कुछ नहीं बदला था। कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कठिन समय में भी मनुष्य होने का अर्थ नहीं छोड़ा।शायद यही इस गीत की सबसे बड़ी ताकत है। यह हमें दूसरों की ओर उँगली उठाना नहीं सिखाता, बल्कि चुपचाप अपने भीतर झाँकने की हिम्मत देता है। और जब मनुष्य अपने भीतर उतरने लगता है, तभी समाज बदलने की शुरुआत होती है।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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