
चैतन्य भट्ट
पहले योग सिखाया। प्राण का नया आयाम बताया। समझाया कि लोग गलत तरीके से सांस लेते हैं। आक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड खेंच लेते हैं। फिर भी जिंदा हैं तो भगवत कृपा है। लोगों ने मान लिया चलो कोई बात नहीं। फिर कहा नाखून रगड़ो बाल काले हो जाएंगे। लोगों ने खूब नाखून रगड़े। उंगलियाँ झुलस कर काली हो गईं चिंगारियाँ तक निकलीं मगर बालों की सफेदी का बाल भी बांका नहीं हुआ।फिर बाबाजी को बेल रूपी पौधे की पत्तियों से प्यार हो गया। एड्स, कैंसर, सर्दी जुकाम कुछ भी हो, बाबाजी कहिन गिलोय का जूस पियो। लोगों को बदहजमी हुई पेट दुखा मगर बीमारी जहां की तहां रही। ऐसा ही सुलूक सब्जियों की फुआ सास लौकी के साथ हुआ। वैवाहिक संबंधों को तलाक की हद तक पहुँचाने वाली लौकी का बाबाजी ने ऐसा महिमा मंडन किया कि हर दूसरा आदमी लौकी ढूंढता नजऱ आया। एकाध तो इस चक्कर में इहलोक से उहलोक चला गया। यह सब प्रपंच बाबा ने प्राकृतिक चिकित्सा के नाम पर फैलाए। फिर अचानक दिव्य ज्ञान उतरा। बाबाजी प्राकृतिक चिकित्सा से छलांग लगाकर आयुर्वेद पर टूट पड़े। सोना, चांदी, पीतल, एल्युमिनियम,पारा, लोहा, लंगड़..पता नहीं कौन-कौन से तत्व घुसेड़ कर च्यवनप्राश बनाया और बाजार में उतार दिया। मंजन नाम का उत्पाद भी नहीं बचा। जड़ी बूटी, मसाले,लौंग, इलायची, कत्था, चूना, पिपरमेंट, मीठा पत्ता सब कुछ ऐसे समेटा कि पान की दुकानें बंद होने लगीं। ऐसा महिमा मंडन किया कि लगा, नाश्ते में यही मंजन एक दो चम्मच फांक लिया जाए, पेट भरा लगने लगेगा। व्यवसाय ऐसा फला-फूला कि मैगी, वैगी, घी, धतूरा, साबुन तेल शेम्पू धीरे से आंख मारते हुए सब चिपका दिए।बाबा ने सीधी राजनीति की राह भी पकड़ी थी। यहां मुकाबला भोले भाले लोगों से नहीं घाघ नेताओं से था सो बात जमी नहीं। समझ आ गया, प्रत्यक्ष राजनीति बस की नहीं। पीछे रहकर काम करना होगा। किस्मत अच्छी थी। विरोधी सत्ता से बाहर हो गए और जिन्हें अपना समझते थे, अंदर आ गए। सुना है सबसे ऊंचे संवैधानिक पद के लिए भी पांसा फेंका। सत्ता समझदार निकली। झांसे में नहीं आई। धर्म और धंधे के जोड़ ने बड़ा रंग जमाया। योग-वियोग सब भूलकर आजकल बाबा मज़े से धंधा चला रहे हैं। कायदा कानून की कोई हैसियत नहीं समझते सो जब तब अदालती डांट खाते रहते हैं। रवैया नहीं बदला तो हो सकता है दंड भी मिल जाए। खैर अपन को क्या। अभी अभी गुजरे विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर बस यही कहना है कि चिकित्सा विज्ञान पर भरोसा करें। इधर उधर ना झांको।

चतुर खिलाड़ी
‘नीतीश कुमार’ ने फिर साबित कर दिया कि वे राजनीति के कितने चतुर खिलाड़ी हैं। बिहार में भाजपा का नया मुख्यमंत्री बना भी और नहीं भी। चचा जाते-जाते भाजपा और संघ को ऐसा ‘रिटर्न गिफ्ट’ दे गए हैं, जिसकी टीस नागपुर तक महसूस की जा रही है। अगर इस दर्द की गहराई नापनी हो, तो बिहार के कांटी भाजपाइयों के चेहरों पर पसरी कड़वाहट और तेजस्वी यादव की मुस्कुराहट देखिए। क्या गजब हुआ है इसकी चर्चा संघ के स्वयंसेवक और भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता बंद कमरों में ‘कोहनी मार-मार’ कर एक-दूसरे से कर रहे हैं। विडंबना देखिए, संघ अपनी स्थापना का 101वां साल मना रहा है। बिहार में पहली बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का सपना साकार हुआ है, लेकिन जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा वह न कभी शाखा गया न उसने कभी ‘नमस्ते सदा वत्सले’ का पाठ किया। न ही वह कभी भाजपा का प्राथमिक सदस्य रहा।नीतीश चचा जाते-जाते ऐसा ‘दुल्हा’ थमा गए जो बारात की विचारधारा से ही मेल नहीं खाता! तेजस्वी यादव का तंज एकदम सटीक है, आखिर मुख्यमंत्री जी भी तो उसी ‘समाजवादी पाठशाला’ के ग्रेजुएट हैं जिसके हेडमास्टर लालू प्रसाद यादव हैं। संघ और भाजपा के ‘चाणक्य’ देखते रह गए और बाजी वह मार ले गया जिसने कभी भगवा झंडा उठाने की ट्रेनिंग ही नहीं ली।

उस पर विडंबना यह कि यह सारा ‘खेला’ बी.एल. संतोष जैसे कडक़ संगठन मंत्री और शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में हुआ। नितीश चचा शीर्ष भाजपा नेतृत्व की आश्चर्यचकित करने और प्रदेशों में सशक्त नेतृत्व न उभरने देने की कमजोरी का फायदा उठाने में सफल रहे। अनुशासन की बात करने वाली पार्टी आज एक ऐसे नेतृत्व को ढोने पर मजबूर है, जिसकी जड़ें कहीं और हैं। नीतीश कुमार ने साबित कर दिया कि वह राजनीति के वो ‘इंजीनियर’ हैं जो पुल भले ही कच्चा बनाएँ, लेकिन विरोधियों के अरमानों पर पानी फेरने वाला बांध एकदम पक्का बनाते हैं। बिहार के खांटी भाजपाइयों के लिए स्थिति अब वैसी ही है ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम वफा करके भी तन्हा रह गए’।
उमा जी का दर्द- प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ‘सुश्री उमा भारती’ का दर्द आए दिन झलकने लगता है, लंबे अरसे से राजनीति के मैदान में चर्चित फायर ब्रांड नेता के रूप में पहचानी जाने वाली उमा भारती को अब कोई पूछ नहीं रहा सो बीच-बीच में कुछ ना कुछ ऐसा करती है जिससे वे चर्चा में आ जाए अब देखो ना पिछले दिनों जब शहर में अतिक्रमण हटाया जा रहा था तो वे जलेबी और पोहा बेचने वाले ठेले पर पहुंच गई उनका कहना था कि इनको हटाने के पहले उनकी व्यवस्था की जाए, अरे भाई हर शहर में अतिक्रमण फैला हुआ है किस किस को जगह देगी सरकार। आपके चक्कर में शिवराज सिंह जी ने शराब के अहाते बंद कर दिए थे अब हर शराब की दुकान के सामने की सडक़ ‘खुला अहाता’ बन गई है खुलेआम सडक़ों पर लोग दारु पी रहे हैं और कोई कुछ नहीं कर पा रहा। उमा जी ये बीजेपी है आप तो बहुत अच्छे से जानती होगी यहां कब कौन हाशिए पर चला जाए और कब कौन मुख्यपृष्ठ पर अपना चेहरा चमका ले जाए कहना बहुत मुश्किल है फिर भी कोशिश करते रहिए हो सकता है कभी दिन ग्रह नक्षत्र साथ दे जाएं।

सुपर हिट ऑफ द वीक
‘आपके पति पागल कैसे हो गए’ डाक्टर ने श्रीमान जी को चेक करते हुए श्रीमती जी से पूछा‘दरअसल वो जनरल बोगी में यात्रा करते थे’
‘तो इससे क्या रिश्ता है पागलपन का’ डाक्टर ने पूछा ‘पास बैठे यात्री बोलते थे थोड़ा खिसको, थोड़ा खिसको थोड़ा खिसको उसके बाद से ही वे परमानेंट खिसक गए’ श्रीमती जी ने जवाब दिया।
Author: Jai Lok






