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कुलगुरु की हठधार्मिता से रादुविवि बना अधिकारियों की प्रयोगशाला

कुलगुरु प्रो. वर्मा के कार्यकाल में 12 कुलसचिव बदले, प्रशासनिक अस्थिरता, कुलगुरु के साथ कार्य नहीं करना चाहता कोई कुलसचिव, छात्रों के भविष्य का संकट भी गहराया

जबलपुर (जयलोक)। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास में शायद वर्तमान कुलगुरु की हठ धार्मिता के कारण सबसे अधिक कलंकित करने वाली घटनाओं का साक्षी बन रहा है। ऐसी घटनाओं के शोर में ना तो विवि में पढ़ाई और शैक्षणिक गतिविधियां ठीक से संचालित हो पा रही हैं ना ही सुचारू कामकाज हो पा रहा है। कुलगुरु राजेश वर्मा के कार्यकाल में चर्चा है तो बस प्रशासनिक उठापटक, अधिकारियों के लगातार बदलाव और विवादों की। कर्मचारियों का आरोप है कि कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा के कार्यकाल में विश्वविद्यालय विकास की दिशा में आगे बढऩे के बजाय प्रशासनिक अस्थिरता की ओर बढ़ता जा रहा है। प्रवेश से परीक्षा, परीक्षा से परिणाम, पदोन्नति से पेंशन और अनुकम्पा नियुक्ति तक लगभग हर मोर्चे पर कर्मचारी और विद्यार्थी परेशान हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि महिला द्वारा लगाए गए अभद्रता के गंभीर आरोप, लगातार शिकायतों, न्यायालयीन प्रकरणों और प्रशासनिक विवादों के बावजूद कुलगुरु को आखिर इतना लंबा ‘अभयदान’ किसके संरक्षण में मिल रहा है?
कुलगुरु के कार्यकाल में करीब एक दर्जन कुलसचिवों का बदलना अपने आप में विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। कर्मचारियों का आरोप है कि कुलसचिवों के साथ ही लगभग आधा दर्जन सहायक कुलसचिव भी स्थानांतरण करा चुके हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इतने अधिकारी एक ही कार्यकाल में क्यों बदले? क्या सभी अधिकारी अक्षम थे? इन सवालों के जवाब में सर्वाधिक चर्चा इसी बात की है कि वर्तमान कुलगुरु प्रोफेसर राजेश वर्मा के द्वारा विश्वविद्यालय को डुबोने की दिशा में किए जा रहे कार्य में कोई भी कुल सचिव इस शैक्षणिक पाप और भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं बनना चाहता।
सबसे बड़ा सवाल तो यह उठ रहा है कि एक कुलगुरु के कार्यकाल में एक दर्जन से अधिक कुल सचिव का बदला जाना इस ओर इशारा कर रहा है कि विश्वविद्यालय में उन्हें काम करने का वातावरण नहीं मिला? कुलसचिव विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और  छात्रों के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन का समन्वय बैठाकर छात्र हित में काम करने की जिम्मेदारी के साथ पदस्थ होते हैं। लेकिन तुगलकी फरमानों और मनमानी के चल रहे दौर में वे अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने में असमर्थ होने पर तबादला करवा लेना ही उचित समझते हैं। विभागीय सूत्रों का दावा है कि एक दर्जन से अधिक कुल सचिवों में से अधिकांश ने स्वयं ही उच्च स्तर पर अपने तबादले की इच्छा व्यक्त की। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित इतिहास में कुलगुरु राजेश वर्मा का कार्यकाल काले अक्षरों से शर्मनाक घटनाओं के साथ अंकित हो रहा है।
दो कुलसचिव और  फिर नया प्रभार!
हालिया घटनाक्रम ने विवाद को और हवा दे दी है। आरोप है कि विश्वविद्यालय में दो कुलसचिवों की स्थिति और एक कुलसचिव के अवकाश पर होने के बावजूद, पूर्व अधिकारियों को विधिवत प्रभार से मुक्त किए बिना प्रो. संधू को कुलसचिव का प्रभार सौंप दिया गया। यदि लगाये जा रहे आरोपों के यह तथ्य सही हैं तो सवाल बेहद गंभीर है। इसका जवाब कुलगुरु को देना चाहिए कि एक ही पद के लिए दो व्यवस्थाएं कैसे चल सकती हैं? प्रभार परिवर्तन की प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, और यदि प्रक्रिया में कोई कमी थी तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? विश्वविद्यालय कि इस दुर्दशा के जिम्मेदार कुलगुरु प्रोफेसर राजेश वर्मा की चुप्पी इन सवालों को और गंभीर बना रही है।
सिर्फ  7 महीने का कार्यकाल बाकी, फिर भी नियुक्ति पर सवाल
इसी बीच राज्य शासन से श्री डी.के. बग्गा की कुलसचिव पद पर पदस्थापना ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि उनकी सेवा अवधि में लगभग सात माह ही शेष हैं। इन परिस्थितियों में कर्मचारी संगठन ने भी यह सवाल उठाया है कि जब विश्वविद्यालय पहले ही लगातार प्रशासनिक बदलाव से जूझ रहा है, तब अल्प अवधि के लिए नया कुलसचिव क्यों? सेवा अवधि के शेष बचे 7 महीनों में आधा समय तो उन्हें विश्वविद्यालय की व्यवस्थाएं, छात्रों और प्रशासनिक कर्मचारियों की परेशानियों को समझने में निकल जाएगा और बचे कुछ समय में समस्याओं का निराकरण नहीं कर सकते तो फिर ऐसी पदस्थापना का क्या अर्थ है केवल विश्वविद्यालय और छात्र-छात्राओं का अमूल्य समय नष्ट होगा।
रादुविवि बन गया अधिकारियों की प्रयोगशाला
इससे पहले भी कुलसचिव पद को लेकर हुए घटनाक्रम सवालों के घेरे में रहे हैं। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के अनुसार डॉ. दीपेश मिश्रा के बाद डॉ. आर.के. बघेल को कुलसचिव की जिम्मेदारी दी गई थी। उनकी सेवानिवृत्ति में लगभग छह माह शेष बताए जा रहे थे। लेकिन आज भी इसी बात की चर्चा बनी हुई है कि करीब एक माह बाद ही डॉ. बघेल ने इनकी अवैधानिक कार्यप्रणाली से क्षुब्ध होकर किनारा कर लिया था। कुलसचिव पद पर सेवाएं देने के लिए सक्षम अधिकारी मौजूद हैं लेकिन इसके बाद भी कुलगुरु से कार्य की पटरी नहीं बैठ पाने के कारण अधिकारी लगातार बदलते रहे तो विश्वविद्यालय की नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों में निरंतरता बना पाने की बात तो दूर की कौड़ी लग रही है।
अधिकारी टिक नहीं रहे, व्यवस्था कैसे टिकेगी?
विश्वविद्यालय से जुड़े कर्मचारियों का आरोप है कि अधिकारियों के लगातार स्थानांतरण और पदस्थापना ने प्रशासनिक निरंतरता को प्रभावित किया है। कुलगुरु के कार्यकाल के दौरान ही छोटे से अंतराल में कुलसचिव बदले। सहायक कुलसचिव बदले। प्रभार बदले। बहुत सारी व्यवस्थाएं बदलीं। लेकिन कर्मचारियों की समस्याएं वहीं की वहीं हैं। छात्र-छात्राओं की परेशानियां भी वैसे ही बनी हुई है।
पदोन्नति के मामले लंबित, सेवानिवृत्त कर्मचारियों के भुगतान और पेंशन के लिए इंतजार, मृत कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकम्पा नियुक्ति के लिए परेशान और दूसरी ओर विश्वविद्यालय में लगातार प्रशासनिक फेरबदल होने से परीक्षाएं और उनके परिणाम भी समय पर नहीं आ रहे इसके कारण विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे बच्चों का भविष्य भी प्रभावित हो रहा है। छात्र संगठन कर्मचारी संगठन लगातार कुलगुरु की मनमानी और तुगलकी अव्यवस्थित कार्यप्रणाली के खिलाफ  मोर्चा खोले हुए हैं लेकिन उच्च स्तर पर बैठे अधिकारी इस बात का संज्ञान नहीं ले रहे हैं।
कुलगुरु की शिकायतें, न्यायालयीन मामले और फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?
कुलगुरु की कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न शिकायतें शासन और अन्य स्तरों पर पहुंचने का दावा कर्मचारी संगठनों के द्वारा किया जाता रहा है। नियुक्ति एवं कार्यप्रणाली से जुड़े न्यायालयीन मामले भी लंबित बताए जा रहे हैं। महिला अधिकारी द्वारा लगाए गए आरोप तथा कुछ मामलों में न्यायालय के समक्ष उठे प्रश्नों का भी हवाला दिया जा रहा है।
कर्मचारी संघ लगातार इस बात की मांग उठा रहे हैं कि कुलगुरु के खिलाफ  शिकायतें इतनी गंभीर हैं तो शासन तत्काल स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच क्यों नहीं करवा रहा है। यदि शिकायतें निराधार हैं तो जांच कराकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जाती।

 

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Jai Lok
Author: Jai Lok

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