
परितोष वर्मा
जबलपुर (जयलोक)। विगत दिनों किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन में लोकायुक्त में पदस्थ लोगों के द्वारा की गई रिश्वतखोरी के खिलाफ कार्रवाई के बाद उन आरोपियों को सजा से बचाने के लिए सजाई गई भ्रष्टाचार की बड़ी दुकान का खुलासा हुआ है। दुकान से ज्यादा यह कोई मार्केटिंग का स्टोर लग रहा था, एक सुपरवाइजर अपने से ऊपर वाले मैनेजर की ईमानदारी को नंगा कर मोल भाव के साथ बेचने का काम कर रहा था। इस स्टिंग ऑपरेशन के खुलासे के बाद पूरे प्रदेश में मध्य प्रदेश पुलिस की खासकर लोकायुक्त विभाग की काफी आलोचना हुई और थू-थू हुई। आनन फानन में पुलिस महानिदेशक लोकायुक्त योगेश देशमुख ने प्रधान आरक्षक यशवंत सिंह ठाकुर को सेवा से बर्खास्त कर दिया, संविदा वाहन चालक अमित विश्वकर्मा की सेवाएं भी तत्काल समाप्त कर दी गई। इसके अलावा लोकायुक्त एसपी भोपाल सहित तीन अफसरों के तबादला कर दिए गए।
लेकिन मूल विषय तो यह था कि भ्रष्टाचार को खत्म करने और भ्रष्टाचारियों को पकडऩे के लिए गठित किए गए इस विभाग का काम अपनी अवधारणा से भटक चुका है। यह संस्था राज्य प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से गठित की गई थी। लेकिन अब यह भी अपना विश्वास खो चुकी है। डीजी लोकायुक्त ने अपने आदेश में इस बात का उल्लेख भी किया है। जो कृत्य सामने आये हैं उसके कारण जनता का विश्वास कमजोर हुआ है। इसकी एक मुख्य वजह और नजर आ रही है कि लोकायुक्त और ईओडब्लू जैसे विभागों में एक बार पदस्थ होने के बाद वही अधिकारी -कर्मचारी बार बार इन विभागों में पदस्थ होना चाहते हैं और सेटिंग से हो भी जाते है। इन विभागों में चुनिंदा लोगों के बार बार तबादले किये जाने से ही व्यवस्था बिगड़ती है।

लोकायुक्त -ईओडब्लू में पदस्थ अधिकारी घूम फिरकर यही आते हैं
लंबे समय से यह भी देखने में आया है कि लोकायुक्त विभाग में निरीक्षक, डीएसपी या अन्य पदों पर रह चुके लोग सामान्य रूप से कुछ समय के लिए अपना तबादला दूसरे स्थान पर करवाते हैं और जैसे ही कागजों में अवधि का दायरा पूरा होता है वैसे ही वह वापस लोकायुक्त या ईओडब्लू विभाग के किसी भी अन्य स्थान पर अपना तबादला करवा लेते हैं। ऐसे कई लोग हैं जिनके नाम सार्वजनिक हैं जो लंबे अरसे से कहीं ना कहीं देश की मूल नौकरी छोड़ कर केवल लोकायुक्त में ही काम करने का मन बनाते हैं। 3 साल लगातार एक ही स्थान पर बने नहीं रहने का नियम लोकायुक्त संगठन पर भी लागू होता है। लेकिन इस नियम का पालन समय पर नहीं होता है।

इंटरनल विजिलेंस सेल गठित
खोते विश्वास को पुन: स्थापित करने के लिए मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन ने पहली बार अपने ही अधिकारी कर्मचारियों की निगरानी के लिए इंटरनल विजिलेंस सेल गठित की है डीआईजी स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में यह टीम काम करेगी और सीधे डीजी को रिपोर्ट करेगी। इसके साथ ही विभाग में किसी प्रकार का भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी ना हो पाए इस उद्देश्य से विवेचना अधिकारियों के कमरे में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाएंगे। अधिकारी कर्मचारियों की प्रॉपर्टी रिटर्न की भी जांच की जाएगी। लोकायुक्त मुख्यालय समेत सभी 7 जोनल कार्यालय में यह कार्य किए जाएंगे और यहां के अधिकारी और कर्मचारियों पर नजर रखी जाएगी। कार्यालय में आने जाने वाले लोगों का लेखा जोखा भी रखा जाएगा कि किस अधिकारी से मिलने कौन आया था और कब आया था।बड़ा सवाल तो यह भी खड़ा हो रहा है कि लोकायुक्त संगठन की कार्यवाही के दायरे में मंत्री से लेकर बड़े अफसर सब इसकी जद में आते हैं लेकिन लोकायुक्त की कार्यवाही सालों से 100 में से 98 कार्यवाहियों में अधिकांश कलेक्ट्रेट के बाबू, राजस्व विभाग के आर आई, पटवारी, पुलिस विभाग के सिपाही, हवलदार, एसआई के ऊपर के लोग कम नजर आते हैं। अब ऐसा तो नहीं है कि ऊपर के पदों पर बैठे लोग ईमानदारी की मिसाल पेश कर रहे हैं और किसी से भी पैसे नहीं ले रहे हैं या भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है। यह बात तो सबको पता है और माननीय न्यायालय में बैठे न्यायाधीश भी कई बार कोर्ट की सुनवाई के दौरान कई बार इस बारे में तीखी टिप्पणियां भी अभिव्यक्त कर चुके हैं।


Author: Jai Lok






