
हमारे बुजुर्गों ने यूनिवर्सिटी का ख्वाब देखा था, हमने शादी-हाल बना दिया
मोहम्मद इदरीस राईन
जबलपुर (जयलोक)। जब कोई इदारा 150 साल का होता है तो वह जश्न नहीं, तारीख बनाता है। वह सिर्फ इमारत नहीं रहता, वह एक सभ्यता बन जाता है। आज अंजुमन इस्लामिया 150 साल की हो गई है। शहर के दिल में, सिविक सेंटर के ठीक सामने, जहाँ एक इंच जमीन के लिए लोग तरसते हैं, वहां हमारी 150 साल पुरानी विरासत खड़ी है। इतना विशाल कैंपस, इतनी बड़ी इमारत, 400 से भी ज्यादा दुकानें और किराएदार… लेकिन अफसोस, जब हम अंदर झांकते हैं तो दिल बैठ जाता है।
विरासत मिली थी, हमने क्या बनाया?
आज अंजुमन सिर्फ एक स्कूल बनकर रह गया है और वह स्कूल भी ऐसा स्कूल जिसके मैदान में दिन में बच्चे कम और रात में शादी की प्लेटें ज्यादा दिखती हैं। जहाँ क्लासरूम से ज्यादा टेंट-हाउस की आवाजें गूंजती हैं। दिन-भर लोडिंग गाडिय़ों के शोर- शराबे से मानों सब कुछ गुम हो जाता है। जहाँ तालीम की खुशबू से ज्यादा बिरयानी की महक आती है। हमें सोचना होगा। हमें किसी ने ज़मीन नहीं दी थी, हमें विरासत मिली थी। बनी-बनाई विरासत। हमारे बुजुगोज़्ं ने खून-पसीने से, कौम के चंदे से, अल्लाह के नाम पर ये इदारा बनाया था। उन्होंने सोचा था कि यहां से डॉक्टर निकलेंगे, इंजीनियर निकलेंगे, जज निकलेंगे, हमारी कौम का नाम रोशन होगा। लेकिन हमने क्या किया? 150 साल में हमने क्या बनाया?
जरा दूसरों को देखिए और शर्मिंदा होइए:
सिंधी समाज: 1947 में विभाजन के बाद सिंधी समाज खाली हाथ आया था। न जमीन थी, न घर, न विरासत। सब कुछ पाकिस्तान में छोडक़र आए थे। लेकिन आज देखिए। उन्होंने रोने में वक्त बर्बाद नहीं किया। एकजुट हुए। जबलपुर में ही देख लीजिए – सिंधी समाज ने स्कूल बनाया, फिर कॉलेज बनाया, फिर एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स, धर्मशाला, अस्पताल। उन्होंने उर्स और मेले में पैसा नहीं फूंका, उन्होंने तालीम पर लगाया। आज उनका बच्चा-बच्चा बिजनेस और एजुकेशन में आगे है।
सिख समुदाय: उनके पास भी कोई विरासत नहीं थी। लेकिन उन्होंने खालसा स्कूल से शुरू करके खालसा कॉलेज, लॉ कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज तक की चेन खड़ी कर दी। उनका गुरुद्वारा सिर्फ इबादतगाह नहीं, लंगर के साथ-साथ करियर काउंसलिंग सेंटर भी है।
जैन समुदाय: छोटा सा समुदाय, लेकिन एकता देखिए। उन्होंने जमीन खरीदी, कॉलेज बनाए, हॉस्पिटल बनाए। उनका एक मंदिर के साथ एक स्कूल या कॉलेज जरूर है।
ईसाई समुदाय: उनके पास देखिए – सेंट अलॉयसियस, क्राइस्ट चर्च, सेंट जोसेफ एक छोटा सा चर्च भी होगा तो उसके साथ एक शानदार कॉन्वेंट स्कूल जरूर होगा।हमारे पास सब कुछ था। ज़मीन थी, इमारत थी, शहर के बीचों-बीच लोकेशन थी, रजिस्टर्ड सोसाइटी थी, 150 साल का नाम था। लेकिन आज हमारे पास क्या है? एक खस्ताहाल स्कूल, जहाँ कोई अच्छा परिवार अपने बच्चे को दाखिला दिलाने से पहले 100 बार सोचता है।
तालीमगाह- इबादतगाह है, शादी घर नहीं
कभी अंजुमन के मैदान में जाइए। देखिए उस मैदान को। उस मैदान ने कितने बच्चों को खिलाया होगा। आज उसी मैदान की हालत देखिए। हफ्ते में 4 दिन वहां शादी का स्टेज लगा होता है। टेंट के शोर- शराबे की आवाज में बच्चों की पढ़ाई दब जाती है। रात में बारात, दिन में स्कूल। क्या यही तालीम का माहौल है? क्या किसी क्रिश्चियन, खालसा या जैन स्कूल में आपने ऐसा देखा है कि स्कूल के मैदान को किराए पर दिया जा रहा हो? नहीं देखा होगा। क्योंकि वे जानते हैं कि तालीमगाह इबादतगाह है, शादी-घर नहीं।
यूनिवर्सिटी का ऐलान होना था और सबसे बड़ा दर्द तो हमारी खामोशी है।
हम सब जानते हैं कि क्या हो रहा है। लेकिन कोई बोलने को तैयार नहीं। हमारे बड़े, हमारे सरमायेदार, हमारे पढ़े-लिखे नौजवान सब खामोश हैं। 150 साल का जश्न तो हम मना रहे हैं। मुशायरा होगा, तकरीरें होंगी, फोटो सेशन होगा, मगर क्या किसी ने सोचा है कि इस जश्न में हम अपनी आने वाली नस्ल को क्या देंगे?
हकीकत तो ये थी कि 150 साल पूरे होने पर यहां एक यूनिवर्सिटी का ऐलान होना चाहिए था। एक एजुकेशन समिट होनी चाहिए थी। देश के बड़े मुस्लिम स्कॉलर, डॉक्टर, इंजीनियर आते। हमारे बच्चों को बताते कि आगे कैसे बढऩा है। एक विजन डॉक्यूमेंट जारी होता। लेकिन हो क्या रहा है? वही पुराना ढर्रा। वही मुशायरा, वही कव्वाली, वही चंदा। और अगले दिन फिर वही सन्नाटा।
अंजुमन सिर्फ इमारत नहीं, अमानत है
अंजुमन इस्लामिया कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है। ये वक्फ है। ये कौम की अमानत है। हमारे बुजुर्गों ने इसे इसलिए नहीं बनाया था कि हम इसकी जमीन को किराए पर देकर अपनी जेब भरें। उन्होंने इसे इसलिए बनाया था कि यहां से गरीब का बच्चा पढक़र बड़ा आदमी बनेगा। आज उन बुजुर्गों की रूह रोती होगी। कि हमने उनकी दी हुई अमानत का क्या हाल कर दिया।
वक्त आ गया है हिसाब मांगने का
अब वक्त आ गया है कि हम मुशायरे और कव्वाली से बाहर निकलें और हिसाब की बात करें।
1. 150 साल में अंजुमन ने कितने कॉलेज बनाए?
2. स्कूल की बिल्डिंग का ऑडिट कब हुआ?
3. मैदान के किराए का पैसा कहाँ जाता है? उसका हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं है?
4. स्कूल का रिजल्ट पिछले 10 साल में क्यों गिरा?
5. जब हमारे पास इतनी जमीन है तो हम इंजीनियरिंग कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज, लॉ कॉलेज क्यों नहीं बना सके?
ये सवाल हमें अंजुमन की कमेटी से नहीं, खुद से पूछने हैं। क्योंकि खामोश रहकर हमने भी इस गुनाह में हिस्सेदारी की है।
आखिरी उम्मीद- अभी भी वक्त है तारीख बदलने का
अभी भी वक्त है। अंजुमन के पास अभी भी वह ताकत है जो किसी के पास नहीं। शहर के बीचो-बीच इतनी बड़ी जमीन। अगर नियत साफ हो जाए तो यहां 2 साल में एक बेहतरीन यूनिवर्सिटी खड़ी हो सकती है। जरूरत है तो सिर्फ एक ईमानदार और जज्बे वाली टीम की। जो इस इदारे को अपनी जागीर नहीं, कौम की अमानत समझे। जो शादी-पार्टी के किराए से नहीं, तालीम के मिशन से इसे चलाए।150 साल का जश्न मुबारक हो। लेकिन इस जश्न के साथ एक वादा भी करिए कि अगले 150 साल का इतिहास जब लिखा जाए तो ये न लिखा हो कि ‘उनके पास सब कुछ था फिर भी वे कुछ न कर सके’, बल्कि ये लिखा हो कि ‘150 साल पर वे जागे और उन्होंने तारीख बदल दी’।वरना आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी। वो कहेंगी कि तुम्हारे सामने तुम्हारी विरासत लुटती रही और तुम मुशायरा- कव्वाली में मस्त रहे।





