
चैतन्य भट्ट
(जय लोक)। पिछले महीने पूरे विश्व में ‘हार्ट डे’ मनाया गया। अख़बारों में हार्ट यानि ‘दिल’ के बारे में तरह तरह की जानकारियां छपी थीं। अनेक डाक्टरों ने दिल के बारे में नई-नई बातें बतलाई उन सबका लब्बोलुआब ये था कि दिल को संभाल कर रखना चाहिए, अब इन्हें कौन बतलाये कि दिल को संभालना किसी के बस की बात नहीं है, वो कब किस पर आ जाए, किसको देख कर धडक़ने लगे, किस पर न्योछावर हो जाए, कोई अपना दिल कब किसी और को दे बैठे कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। दिल का कोई भरोसा तो है नही इसलिए किसी गीतकार ने उसकी बेवफाई पर ये गीत ऐसे ही नहीं लिख दिया ‘दिल तो है दिल दिल का ऐतबार क्या कीजे, आ गया तो किसी पे प्यार तो क्या कीजे’ तो दूसरा गीतकार लिख रहा है ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिये’ अरे गीतकार महोदय दिल से ही तो जान है इधर दिल गया और उधर तुम टॉय बोले इसलिए कुछ सोच समझ कर गाने लिखा करो। अपने को तो ये मालूम था कि दिल सबसे ‘इंपॉर्टेंट ऑर्गन’होता है इसलिए अपन सोचते थे कि जो शरीर का सबसे इंपॉर्टेंट अंग है उसका आकार भारी भरकम होता होगा लेकिन अब पता लगा कि दिल जो हजारों लोगों की मोहब्बत का आइना होता है वो कुल जमा ‘चार सौ ग्राम’ से भी कम का होता है। लोगबाग़ ये भी कहते थे कि महिलाओं का दिल छोटा होता है पुरुषों की तुलना में, तो ये बात भी सच साबित हो गई, महिलाओं के दिल का वजन तो ‘तीन सौ ग्राम’ से भी कम का होता है। अक्सर बड़े बूढ़ों से उपदेश में ये भी सुना है कि अपना दिल बड़ा रखो, उनको शायद मालूम नहीं कि इधर दिल बड़ा किया उधर डाक्टर ने बतला दिया कि आपका हार्ट एंलार्ज हो गया है और आप जल्द ही ईश्वर को प्यारे हो सकते हो। वैसे दिल है बड़ी नाजुक चीज, कब टूट जाए कोई नहीं जानता, माशूका ने इधर शादी से इंकार किया और उधर दिल टूटकर बिखर गया इसलिए किसी ने ये गीत भी लिखा है ‘मेरे टूटे हुए दिल से कोई तो आज ये पूछे कि तेरा हाल क्या है’ दिल के नाम पर बॉलीवुड ने करोड़ों रूपये कमा लिए है किसी ने फिल्म बना ली ‘दिल दिया दर्द लिया’ तो किसी ने ‘दिल देके देखो’ सुपरहिट करवा ली, किसी ने अकेले ‘दिल’ नाम की फिल्म बनाकर दर्शकों को अपनी तरफ खींच लिया तो किसी ने दिल एक मंदिर है कह दिया तो किसी ने ‘दिल तेरा दीवाना’ बना डाली ‘दिले नादाँ’ ’दिल ही तो है’ ’दिल का क्या कसूर’ ’दिल है कि मानता नहीं’ ‘फिर वही दिल लाया हूँ’ ‘हम दिल दे चुके सनम’ ’दिल ही तेरा हम भी तेरे ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ कितने नाम गिनाएं इन निर्माताओं के उनके लिए ये दिल तो सचमुच सोने की खान साबित हो गया है अपना तो मानना है कि यदि डाक्टर साहेब लोग कह रहे है कि दिल को संभाल कर रखो तो उन्हें ये गाना सुना दो ‘दिल संभाले संभलता नहीं आज कल, पास आने की दे दो इजाजत हमें’
दारू खोरों को धन्यवाद दो
एक खबर आई है कि सरकार को जो रेवेन्यू मिलता है उसमें सबसे आगे आबकारी विभाग है जो आंकड़े आए हैं उसमें मात्र छह महीने में विभाग ने अपने टारगेट का 96 प्रतिशत पैसा कमा लिया। सरकार भारी खुश है कि आबकारी विभाग बड़ा बढिय़ा काम कर रहा है लेकिन सरकार को आबकारी विभाग को छोडक़र उन दारूखोरों का धन्यवाद अदा करना चाहिए जो बेचारे अपना सब कुछ लुटा कर दारु पीने में जुटे हुए हैं यदि ये रिंद ना होते तो आबकारी विभाग भला क्या कर लेता? जब लेने वाला ही नहीं होता तो देने वाला किसको देता? सरकार को मालूम है कि इन्हीं के दम पर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है इसके बावजूद भी बेचारे दारूखोरों को जब चाहे तब पुलिस अड़ी देती रहती है। अरे भाई जो भी पी रहे हैं जब आप दारू की दुकान खोल कर रखे हो तो वे पी रहे हैं, अगर शराब पीना इतना ही खराब मानती है सरकार तो दारू की दुकान बंद क्यों नहीं कर देती लेकिन सरकार भी जानती है कि जिस दिन दारू की दुकानें बंद हो जाएंगी वो भी दाने-दाने को मोहताज हो जाएगी सारे काम ठप हो जाएंगे इसलिए तो वह दारू की दुकान बंद नहीं करती भले ही पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती चिल्ला चिल्ला के शराबबंदी की बात करती रहीं लेकिन उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन अपने को एक बात समझ में नहीं आई कि जब उमा भारती जी को दारू से इतनी ही दिक्कत थी तो जब वे प्रदेश की मुख्यमंत्री थी उसी समय उन्होंने शराब बंदी क्यों नहीं कर दी। क्योंकि उनको भी मालूम था कि सारा रेवेन्यू तो इन्हीं के दम से आ रहा है। अब अपनी सरकार को एक सलाह है कि एक बड़ा विज्ञापन दे जिसमें पूरे प्रदेश के दारुखोरों का आभार व्यक्त करते हुए कहे कि आपके ही दम पर हमने अपना टारगेट छह महीने में ही पूरा कर लिया अगले छह महीने में ये टारगेट आप लोग दोगुना चौगुन कर दोगे इस बात की हमको पूरी आशा है।
मामा नाराज फूफा बन गए
प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह जी जिन्हें लोग ‘मामा’ के नाम से जानते हैं पिछले दिनों मामा का पद छोडक़र ‘नाराज फूफा’ बन गए।
हुआ यूं कि उनके ही विधानसभा क्षेत्र बुधनी के कोसमी गांव में कुछ आदिवासियों के मकान वन विभाग वालों ने उजाड़ दिए, जैसे ही मामा जी को यह खबर लगी उनका मुंह फूल गया, वे नाराज फूफा में तब्दील हो गए चिल्ला चिल्ला कर बोले कि घोर अत्याचार हुआ है इन्हीं के दम पर मोहन सरकार टिकी हुई है लेकिन ये इंतहा हो गई है इन आदिवासियों पर अत्याचारों की। इतना ही नहीं वे धरने तक में बैठ गए। मामा जी की खबर पहुंची डॉक्टर साहब के पास उन्होंने तुरंत कह दिया कि बहुत गहराई से जांच की जाएगी और जो भी दोषी होंगे उन्हें बख्शा नहीं जाएगा, वैसे ये जुमला हर उस नेता को रटाया जाता है जो भी सत्ता में आता है। जांच का क्या है जांच तो महीनों सालों चलती है और चलती रहती है जैसे किसी ने कहा है ‘जीवन चलने का नाम’ वैसे ही जांच चलने का नाम, लेकिन मामा जी के क्रोध की खबर ऊपर तक पहुंच गई और वहां से आदेश हुआ कि सब बैठकर मामला निपटाओ, तीन-चार बड़े नेता बैठे अब मामला निपटा या नहीं निपटा ये अपन नहीं बता सकते। लेकिन मामा जी ने जो नाराज फूफा का रोल अदा किया उससे सरकार में हडक़ंप जरूर मच गया यह कहना गलत ना होगा।
सुपर हिट ऑफ द वीक
‘सुनो जी, अगर आपके बाल इसी रफ्तार से झड़ते रहे तो मैं आपको तलाक़ दे दूँगी!! श्रीमती जी ने श्रीमान जी से कहा’
‘अरे पगली ये बात पहले ही बतला देती मैं बेबकूफ इनको बेवजह बचाने की कोशिश कर रहा था’ श्रीमान जी ने जोर से चिल्ला कर कहा।





